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पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 33 / 48

यहेजकेल 33

1फिर यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा,

2“हे मनुष्य की सन्तान, अपनी प्रजा के लोगों से बातें कर और उनसे कह, ‘यदि मैं किसी देश पर तलवार चलवाऊं और उस देश के लोग अपने लोगों में से किसी को लेकर अपना पहरुआ नियुक्त करें,

3और वह देश पर तलवार को आती हुई देखकर नरसिंगा फूंके और लोगों को सावधान कर दे,

4तब वह जो नरसिंगे की चेतावनी सुनकर भी सावधान न हो और तलवार आकर उसे घात करे, तो उसका खून उसी के सिर पर पड़ेगा।

5उसने तो नरसिंगे की आवाज सुनी परन्तु सावधान न हुआ, उसका खून उसी के सिर पर पड़ेगा। परन्तु यदि उसने चेतावनी पर ध्यान दिया होता तो वह अपना प्राण बचा लेता।

6परन्तु यदि पहरुआ तलवार को आते देखे और नरसिंगा फूंक कर लोगों को सचेत न करे और तलवार चलकर उनमें से किसी को घात करे, तब वह तो अपने अधर्म में पड़ा हुआ मारा ही जाएगा, परन्तु मैं उसके खून का लेखा पहरुए से लूंगा।’

7“हे मनुष्य की सन्तान, मैंने तुझे इस्राएल के घराने पर पहरुआ ठहराया है, अतः तू मेरे मुख से संदेश सुनकर उन्हें मेरी ओर से चेतावनी दे।

8जब मैं दुष्ट से कहूं, ‘हे दुष्ट, तू अवश्य मरेगा’, और तू दुष्ट को उसके मार्ग के विषय में चेतावनी न दे, तो वह दुष्ट तो अपनी दुष्टता में मरेगा ही, परन्तु उसके खून का लेखा मैं तुझी से लूंगा।

9परन्तु यदि तू दुष्ट को उसके मार्ग से फिरने के लिए चेतावनी दे, और वह अपने मार्ग से न फिरे, तो वह अपने अधर्म में मरेगा, पर तू अपना प्राण बचा लेगा।

10“इसलिए हे मनुष्य की सन्तान, इस्राएल के घराने से कहः तुमने ऐसा कहा कि निश्चय हमारे अपराध और हमारे पाप हमारे ही ऊपर हैं और हम उन्हीं में सड़ते जाते है। अब हम कैसे जीवित रहेंगे?

11उनसे कह कि प्रभु यहोवा यों कहता हैः मेरे जीवन की सौगन्ध! मुझे दुष्ट की मृत्यु से कोई प्रसन्नता नहीं होती, परन्तु इससे कि दुष्ट अपने मार्ग से फिरे और जीवित रहे। हे इस्राएल के घराने, अपनी दुष्टता के मार्ग से फिर जाओ, फिर जाओ! तुम क्यों मरो?

12और हे मनुष्य की सन्तान, तू अपने लोगाें से कह कि जिस दिन धर्मीजन अपराध करे तो उसकी धार्मिकता उसे न बचा सकेगी, और दुष्ट की जो भी दुष्टता हो यदि वह उससे फिरे तो वह उसके कारण न गिरेगा, जबकि धर्मीजन जिस दिन वह पाप करे तो अपनी धार्मिकता के कारण जीवित न रह सकेगा।

13जब मैं धर्मी से कहूं कि तू निश्चय जीवित रहेगा और वह अपनी धार्मिकता पर ऐसा भरोसा करे कि वह अधर्म करे तो उसके कोई भी धार्मिकता के कार्य स्मरण न किए जाएंगे, पर अपने उसी अधर्म के कारण जो उसने किया वह मरेगा।

14परन्तु जब मैं दुष्ट से कहूं, ‘तू अवश्य मरेगा,’ और वह अपने पाप से फिर कर न्याय और धार्मिकता के कार्य करने लगे,

15अर्थात् यदि दुष्ट व्यक्ति गिरवी लौटा दे, और जो कुछ उसने लूटकर ले लिया उसे लौटा दे, तथा बिना कुटिल कार्य किए जीवनदायी विधियों पर चले, तो वह निश्चय ही जीवित रहेगा, वह मरेगा नही।

16उसका किया हुआ कोई भी पाप स्मरण नहीं किया जाएगा। उसने न्याय और धार्मिकता का आचरण किया है, वह निश्चतरूप से जीवित रहेगा।

17“फिर भी तेरे लोग कहते हैं कि प्रभु का व्यवहार ठीक नहीं, जबकि उन्हीं का व्यवहार ठीक नहीं है।

18जब धर्मीजन अपनी धार्मिकता से हटकर अधर्म करने लगे तो वह उसी में मरेगा।

19पर जब दुष्ट अपनी दुष्टता से फिर कर न्याय और धार्मिकता का आचरण करने लगे तब उनके द्वारा जीवित रहेगा।

20फिर भी तुम कहते हो, ‘प्रभु का व्यवहार ठीक नहीं ’, हे इस्राएल के घराने, मैं तुम में से हर एक का न्याय उसके आचरण के अनुसार करूंगा।”

21अब हमारी बन्धुवाई के बारहवें वर्ष के दसवें महीने के पांचवे दिन ऐसा हुआ कि यरूशलेम से भागे हुए एक शरणार्थी ने आकर मुझसे कहा, “नगर ले लिया गया है।”

22उस शरणार्थी के आने से पूर्व संध्या को यहोवा का हाथ मुझ पर बना हुआ था। सुबह जब वह मेरे पास आया तब, यहोवा ने मेरा मुंह खोल दिया और मेरा मुंह खुल गया और फिर मैं गूंगा न रहा।

23फिर यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुंचा,

24“हे मनुष्य की सन्तान, इस्राएल देश के इन खंडहरों में रहने वाले यह कह रहे हैं कि इब्राहीम तो अकेला था फिर भी उसने देश पर अधिकार कर लियाः परन्तु हम तो बहुत हैं, अतः देश हमारे अधिकार में दे दिया गया है।

25इसलिए उनसे कह कि प्रभु यहोवा यों कहता हैः तुम लोग मांस को लहू सहित खाते हो, और मूर्तियों की ओर आंख उठाते हुए हत्या करते हो। फिर क्या तुम देश के अधिकारी होगे?

26तुम अपनी तलवार पर भरोसा करते हो, तुम घृणित कार्य करते हो और तुम में से हर एक अपने पड़ोसी की पत्नी को भ्रष्ट करता है। क्या तुम फिर भी देश के अधिकारी होगे?

27अतः तू उनसे कहना कि प्रभु यहोवा याें कहता है; मेरे जीवन की सौगन्ध, खंडहर, में रहने वाले निश्चय ही तलवार से घात होंगे, और जो कोई खुले मैदान में रहता है, उसे मैं पशुओं का आहार कर दूंगा, और जो गढ़ों और गुफाओं में रहते हैं वे महामारी से मरेंगे।

28मैं देश को उजाड़ और खंडहर कर दूंगा और उनकी शक्ति का घमंड जाता रहेगा, और इस्राएल के पर्वत उजाड़ हो जाएंगे जिससे कोई उन पर होकर न चलेगा।

29जब मैं उनके किए हुए घृणित कार्यों के कारण देश को उजाड़ और निर्जन कर दूंगा, तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा हू।

30“पर हे मनुष्य की सन्तान, तेरे लोग दीवारों के पास और घर के द्वारों पर अपने अपने भाई-बन्धुओं के साथ तेरे विषय में यह कहकर बात करते हैं, ‘आकर सुनो कि यहोवा की ओर से कौन-सा संदेश निकलता है।’

31वे प्रजा के समान तेरे पास आते हैं और मेरे निज लोगों के सदृश तेरे सामने बैठकर तेरे वचन सुनते हैं, परन्तु उन पर चलते नही। अपने मुख से तो वे बहुत प्रेम दर्शाते हैं, परन्तु उनके हृदय में लालच है।

32और देख, तू उनके लिए मानो मधुर स्वर में प्रेम-गीत गाने वाले और कुशलतापूर्वक बाजा बजाने वाले के समान है, क्योंकि वे तेरा वचन सुनते तो हैं पर उन पर चलते नही।

33अतः जब यह बात घटित हो, और निःसंदेह यह होगा, तब वे जान लेंगे कि उनके बीच नबी रहा है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)