पुराना नियम · यहेजकेल · अध्याय 44 / 48
यहेजकेल 44
1तब वह मुझे पवित्रस्थान के बाहरी फाटक से जिसका मुख पूर्व की ओर है वापस लाया; और वह बन्द था।
2तब यहोवा ने मुझसे कहा, “यह फाटक बन्द रहे। यह खोला न जाए और इससे कोई प्रवेश न करे, क्योंकि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा ने इससे प्रवेश किया है। अतः यह बन्द रहे।
3प्रधान ही, प्रधान होने के कारण उसमें बैठकर यहोवा के सामने भोजन करे। वह प्रवेश-द्वार के ओसारे से होकर प्रवेश करे और इसी मार्ग से बाहर जाए।”
4तब वह मुझे उत्तरी फाटक से भवन के सामने लाया; फिर मैंने दृष्टि की, और देखो, यहोवा के तेज से यहोवा का भवन भर गया, और मैं मुंह के बल गिर गया।
5तब यहोवा ने मुझसे कहा, “हे मनुष्य की सन्तान, ध्यान दे और अपनी आंखों से देख, और जो कुछ मैं तुझसे यहोवा के भवन की सब विधियों तथा नियमों के विषय में कहूं उसे अपने कानों से सुन। भवन के प्रवेश तथा पवित्रस्थान के सब निकास द्वारों को ध्यान से देख।
6और तू उन विद्रोहियों से अर्थात् इस्राएल के घराने से कह, “प्रभु यहोवा यों कहता हैः हे इस्राएल के घराने, तुम्हारे सब घृणित कार्य अब बहुत हो चुके।
7जब तुम मेरा भोजन अर्थात् चर्बी और लहू चढ़ाते थे तब परदेशियों को जो तन और मन दोनों से ख़तनारहित थे मेरे पवित्रस्थान, हां, मेरे भवन में लाकर तुमने उसे अपवित्र कर दिया और तुम्हारे सब घृणित कार्यों से बढ़कर उन्होंने मेरी वाचा को तोड़ दिया।
8और तुमने स्वयं मेरी पवित्र वस्तुओं की देखरेख नहीं की, परन्तु मेरे पवित्रस्थान को दूसरों की देखरेख में सौंप दिया है।”
9प्रभु यहोवा यों कहता हैः इस्राएलियों के मध्य जितने परदेशी हैं जो तन और मन दोनों के ख़तनारहित हैं उनमें से कोई मेरे पवित्रस्थान में प्रवेश न करे।
10परन्तु इस्राएल के भटक जाने के समय जो लेवीय मुझसे दूर हट गए अर्थात् मुझे छोड़कर अपनी मूर्तियों के पीछे हो लिए, वे अपने अधर्म का दण्ड भोगेंगे।
11फिर भी वे मेरे पवित्रस्थान में सेवक हों, वे भवन के द्वारों की चौकसी करें, और भवन में सेवा-टहल करें, और लोगों के लिए होमबलि और मेलबलि के पशु का वध करें और उनकी सेवा करने के लिए उनके समक्ष खड़े हुआ करे।
12परन्तु इसलिए कि उन्होंने अपनी मूर्तियों के सामने उनकी सेवा की और इसा्रएल के घराने के लिए ठोकर और अधर्म में फंसने का कारण हो गए, इस कारण मैंने उनके विरुद्ध शपथ खाई कि वे अपने अधर्म का दण्ड भोगें, यहोवा की यही वाणी है।
13वे मेरे समक्ष याजकीय सेवा करने न आएं और न मेरी किसी पवित्र वस्तु या परमपवित्र वस्तुओं के समीप आएं, परन्तु अपनी लज्जा सहें और अपने घृणित कार्यों का दण्ड उठाए।
14फिर भी मैं उन्हें भवन की देखरेख और उसकी सेवा के लिए, और जो कुछ वहां किया जाए उसके लिए नियुक्त करूंगा।
15परन्तु सादोक-वंशीय लेवीय याजक जिन्होंने उस समय मेरे पवित्रस्थान की देखरेख की जब इस्राएली मुझसे भटक गए थे, वे मेरे समीप आए और मेरी सेवा करे। वे मुझे चर्बी और लहू चढ़ाने के लिए मेरे सम्मुख खड़े हुआ करें, प्रभु यहोवा की यही वाणी है।
16वे मेरे पवित्रस्थान में प्रवेश करें, वे मेरी सेवा करने और मेरे कार्य की देखरेख करने के लिए मेरी मेज के समीप आए।
17ऐसा हो कि जब वे भीतरी आंगन के द्वार से प्रवेश करें तब मलमल पहने हुए हो। जब वे भवन के भीतरी द्वार और भीतरी आंगन में सेवा करें तब उनके शरीर पर कोई ऊनी वस्त्र न हो।
18वे अपने सिर पर मलमल की पगड़ियां बाँधे और कमर में मलमल की जांघियां पहने। वे ऐसा कुछ कमर में न बांधे जिससे पसीना आए।
19जब वे बाहरी आंगन में अर्थात् लोगों के पास बाहरी आंगन में आएं तो उन वस्त्रों को जिन्हें पहनकर वे सेवा कर रहे थे, उतार कर पवित्र कोठरियों में रख दें और दूसरे वस्त्र पहन लें जिससे कि लोग उनके उन वस्त्रों के कारण पवित्र न हो जाए।
20वे न तो अपने सिर को मुड़ाएं और न बाल लम्बे रखे। वे केवल अपने सिर के बालों को छटवाए।
21और न कोई याजक भीतरी आंगन में प्रवेश करते समय मघपान करे।
22वे विधवा अथवा तलाक शुदा स्त्री से विवाह न करें, परन्तु इस्राएल के घराने में से किसी कुंवारी से अथवा उस विधवा से जो किसी याजक की विधवा हो विवाह करे।
23इसके अतिरिक्त वे मेरे लोगों को पवित्र और अपवित्र का अन्तर बताएं और उनसे शुद्ध और अशुद्ध की पहचान कराए।
24और जब कोई झगड़ा खड़ा हो तो वे न्यायी का स्थान लें, वे मेरी विधियों के अनुसार उसका न्याय करे। वे मेरे ठहराए हुए पर्वों में मेरे नियमों और विधियों का भी पालन करें और मेरे सब्त के दिनों को पवित्र माने।
25वे किसी शव के पास जाकर अपने आपको अशुद्ध न करें, परन्तु अपने पिता, माता, पुत्र, पुत्री, भाई, अथवा कुंवारी बहन के लिए वे अपने आप को अशुद्ध कर सकते हैं
26और किसी मनुष्य के शुद्ध होने के बाद सात दिन बीतने दिए जाए।
27जिस दिन वह पवित्रस्थान में अर्थात् पवित्रस्थान में, सेवा करने के लिए भीतरी आंगन में जाए तो वह अपने लिए पापबलि चढ़ाए। प्रभु यहोवा की यही वाणी है।
28“और उनकी मीरास के सम्बन्ध में यह कि मैं ही उनकी मीरास हूं, तुम इस्राएल में उन्हें कोई भाग न देना क्योंकि मैं ही उनका निज भाग हूँ।
29वे अन्नबलि, पापबलि और दोषबलि खाया करें तथा इस्राएल में जो वस्तुएं अर्पित की जाएं वे सब उन्हें मिले।
30और सब प्रकार की प्रथम उपज तथा सब प्रकार की भेंटों में से प्रथम फल याजकों का होगा और आटे में से पहला भाग भी याजकों को देना जिससे तुम्हारे घराने पर आशीष बनी रहे।
31अपने आप से मरे हुए पक्षी अथवा पशु का मांस या फाड़े हुए पशु का मांस याजक लोग न खाए।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)