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नया नियम · गलातियों · अध्याय 3 / 6

गलातियों 3

1अरे निर्बुद्धि गलातियों, किसने तुम्हे मोह लिया? तुम्हारी आंखों के सामने यीशु मसीह तो क्रूस पर चढ़ाया हुआ प्रदर्शित किया गया था।

2मैं तुम से केवल इतना ही जानना चाहता हूं कि तुम ने आत्मा को क्या व्यवस्था के कामों से पाया, अथवा सुसमाचार को विश्वास सहित सुनने से?

3क्या तुम इतने निर्बुद्धि हो कि आत्मा से आरम्भ करके अब देह की विधि द्वारा पूर्णता तक पहुंचोगे?

4क्या तुम ने इतने कष्ट व्यर्थ ही उठाए? क्या वे सचमुच व्यर्थ थे?

5जो तुम्हें आत्मा प्रदान करता है और तुम में सामर्थ के काम करता है, वह क्या इसलिए करता है कि तुमने व्यवस्था के काम किए अथवा इसलिए कि तुम ने सुसमाचार पर विश्वास किया?

6इसी प्रकार इब्राहीम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिए धार्मिकता गिनी गई।

7अतः यह समझ लो कि विश्वास करने वाले ही इब्राहीम की सन्तान है।

8और पवित्रशास्त्र ने आरम्भ से यह जान कर कि परमेश्वर विश्वास के द्वारा गै़रयहूदियों को धर्मी ठराएगा, पहिले से ही इब्राहीम को सुसमाचार सुना दियाः ‘‘समस्त जातियां तुझ में आशिज पाएंगी।’’

9इसलिए जो विश्वास करते हैं, वे विश्वासी इब्राहीम के साथ आशिज पाते है।

10परन्तु जो लोग व्यवस्था के कामों पर निर्भर हैं, वे शाप के अधीन हैं, क्योंकि लिखा है, ‘‘जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी सभी बातों का पालन नहीं करता, वह -शापित है।’’

11इसलिए यह स्पष्ट है कि व्यवस्था द्वारा परमेश्वर की दृष्टि में कोई धर्मी नहीं ठहरता, क्योंकि ‘‘धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा।’’

12परन्तु विश्वास से व्यवस्था का कोई सम्बन्ध नही। इसके विपरीत, ‘‘जो उसकी बातों का पालन करेगा वह उनके कारण जीवित रहेगा।’’

13मसीह ने व्यवस्था के शाप से हमें मूल्य चुका कर छुड़ाया, और स्वयं हमारे लिए -शापित बना, क्योंकि लिखा है, ‘‘जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह -शापित है।’’

14यह इसलिए हुआ कि इब्राहीम की आशिज मसीह यीशु में गैरयहूदियों तक पहुंचे और हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें जिसकी प्रतिज्ञा की गई है।

15भाइयो, मैं मानवीय सम्बन्धों की रीति पर कहता हूं: मनुष्य का वसीयतनामा भी जब एक बार निशिचत हो जाता है तो उसे कोई रद्द नहीं करता और न उसमें कुछ जोड़ता है।

16अतः प्रतिज्ञाएं इब्राहीम और उसके वंशज से की गई थी। शास्त्र नहीं कहता, ‘‘और वंशजों से’’ जैसे बहुतों की ओर संकेत कर रहा हो, परन्तु इसके बदले एक ही की ओर, ‘‘और तेरे वंशज से” जो मसीह है।

17मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जिस वाचा को परमेश्वर ने पहिले से निशिचत कर दिया, उसको वह व्यवस्था जो चार सौ तीस वर्ष पश्चात् दी गई, रद्द नहीं कर सकती और न उसकी प्रतिज्ञा को व्यर्थ ठहरा सकती है।

18क्योंकि यदि उत्तराधिकार व्यवस्था पर आधारित है तो प्रतिज्ञा पर आधारित नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर ने इब्राहीम को यह उत्तराधिकार प्रतिज्ञा द्वारा दिया।

19तो फिर व्यवस्था कि क्या आवश्यकता रही? वह अपराधों के कारण बाद में दी गई कि उस वंशज के आने तक रहे जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी। और वह स्वर्गदूतों द्वारा एक मध्यस्थ के हाथ ठहराई गई।

20मध्यस्थ कम से कम दो के बीच होता है, परन्तु परमेश्वर तो एक ही है।

21तो क्या व्यवस्था परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के विरफ़द्ध है? कदापि नही। यदि ऐसी व्यवस्था दी गई होती जो जीवन प्रदान कर सकती थी तो वास्तव में धार्मिकता व्यवस्था-पालन पर निर्भर होती,

22परन्तु पवित्रशास्त्र ने सब को पाप के अधीन ठहरा दिया है जिससे कि वह प्रतिज्ञा, जो विश्वास द्वारा यीशु मसीह में है, विश्वास करने वालों के लिए पूर्ण हो।

23परन्तु विश्वास के आने से पूर्व हम व्यवस्था के संरक्षण में बन्दी थे और विश्वास के प्रकट होने तक हम उसी के नियंत्रण में रहे।

24इस प्रकार मसीह तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था हमारी शिक्षक बन गई है जिस से हम विश्वास द्वारा धर्मी गिने जाए।

25परन्तु जब विश्वास आ चुका है तो अब हम शिक्षक के अधीन नहीं रहे।

26क्योंकि तुम सब उस विश्वास के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो।

27तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहिन लिया है।

28अब न कोई यहूदी है और न यूनानी, न दास है और न स्वतन्त्र, न पुरफ़ज है और न स्त्री, क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।

29और यदि तुम मसीह के हो तो इब्राहीम की सन्तान और प्रतिज्ञा के अनुसार उत्तराधिकारी भी हो।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)