पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 24 / 50
उत्पत्ति 24
1इब्राहीम अब वृद्ध हो गया था और उसकी आयु बहुत थी। और यहोवा ने उसे हर प्रकार से आशीषित किया था।
2इब्राहीम ने अपने घर के सबसे पुराने सेवक से जो उसकी समस्त सम्पत्ति का भण्डारी था कहा, “अपना हाथ मेरी जांघ के नीचे रख,
3और मैं तुझे यहोवा अर्थात् स्वर्ग और पृथ्वी के परमेश्वर की शपथ दिलाता हूं कि जिन कनानियों के मध्य मैं रहता हूं, उनकी बेटियों में से मेरे बेटे के लिए तू कोई पत्नी नहीं चुनेगा।
4पर तू मेरे देश में मेरे ही कुटुम्बियों में जाकर मेरे पुत्र इसहाक के लिए पत्नी ले आयेगा।”
5तब उस सेवक ने उससे कहा, “कदाचित् वह स्त्री इस देश में मेरे पीछे न आना चाहे तो क्या मुझे तेरे पुत्र को उस देश में वापस ले जाना पड़ेगा जहां से तू आया था।”
6इब्राहीम ने उससे कहा, “सावधान, तू मेरे पुत्र को वहां वापस न ले जाना!
7यहोवा, स्वर्ग का परमेश्वर जिसने मुझे मेरे पिता के घर और मेरी जन्मभूमि में से निकाला, और जिसने शपथ खाकर मुझसे कहा, ‘मैं यह देश तेरे वंश को दूंगा,’ वही अपना दूत तेरे आगे भेजेगा, और तू वहां से मेरे पुत्र के लिए पत्नी लाना।
8परन्तु यदि वह स्त्री तेरे पीछे आना न चाहे, तो तू मेरी इस शपथ से छूट जाएगा, परन्तु मेरे पुत्र को वहां कदापि वापस न ले जाना।”
9अतएव उस सेवक ने अपना हाथ अपने स्वामी इब्राहीम की जांघ के नीचे रखकर इस बात की उससे शपथ खाई।
10तब उस सेवक ने अपने स्वामी के ऊंटों में से दस ऊंट लिए तथा अपने स्वामी की सर्वोत्तम वस्तुओं में से विभिन्न वस्तुएं लेकर प्रस्थान किया, और वह उठकर मेसोपोटामिया में नाहोर के नगर को गया
11उसने ऊंटों को नगर के बाहर एक कुएं के पास बैठाया। वह संध्या का समय था जब स्त्रियां जल भरने को आती थी।
12उसने कहा, “हे यहोवा, मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर, आज मेरा कार्य सफल कर, और मेरे स्वामी इब्राहीम पर कृपा-दृष्टि कर।
13देख, मैं जल के सोते के पास खड़ा हूं, और नगर-वासियों की पुत्रियां जल भरने को आ रही है।
14अब ऐसा हो कि जिस कन्या से मैं कहूं, ‘अपना घड़ा उतार कि मैं पानी पी सकूं,’ और वह यह उत्तर दे, ‘ले पी ले और बाद में मैं तेरे ऊंटों को भी पिलाऊंगी,’ यह वही हो जिसे तूने अपने सेवक इसहाक के लिए ठहराया है, और इसी से मैं जान लूंगा कि तूने मेरे स्वामी पर कृपा-दृष्टि की है।”
15और ऐसा हुआ कि वह यह कह ही रहा था, तभी इब्राहीम के भाई नाहोर से उत्पन्न मिल्का के पुत्र बतूएल की पुत्री रिबका अपने कांधे पर घड़ा लिए हुए वहां आ गई।
16वह अति सुन्दर और कुंवारी थी और किसी पुरुष ने उसको नहीं जाना था। वह नीचे उतरी और सोते में अपना घड़ा भरकर ऊपर आई।
17तब वह दास उससे मिलने के लिए दौड़ा और कहने लगा, “मुझे अपने घड़े में से थोड़ा पानी पिला दे।”
18और वह बोली, “हे मेरे स्वामी, पी ले,” और उसने फुर्ती से अपने हाथ पर घड़ा उतार कर उसे पीने को दिया।
19जब वह उसे पानी पिला चुकी तो उसने कहा, “मैं तेरे ऊंटों के लिए भी तब तक पानी भरती रहूंगी जब तक वे पी न चुके।”
20तब वह फुर्ती से अपने घड़े को पानी की होदी में खाली करके पानी भरने के लिए कुंए के पास दौड़ पड़ी, और उसने उसके सब ऊंटों के लिए भी पानी भरा।
21इसी बीच वह पुरुष यह जानने के लिए कि यहोवा ने मेरी यात्रा को सफल किया है कि नहीं, चुपचाप उसकी ओर देखता रहा।
22फिर ऐसा हुआ कि जब ऊंट पानी पी चुके तो उस पुरुष ने आधे शेकेल वज़न के सोने का एक नथ और दस शेकेल वजन के सोने के दो कंगन उसके हाथों के लिए निकाले,
23और कहा, “तू किसकी पुत्री है? मुझे बता क्या तेरे पिता के घर में हमारे ठहरने के लिए जगह है?”
24उसने उससे कहा, “मैं नाहोर द्वारा उत्पन्न मिल्का के पुत्र बतूएल की पुत्री हू।”
25फिर उसने उससे कहा, “हमारे पास बहुत घास-फूस व चारा और ठहरने के लिए जगह है।”
26तब उस पुरुष ने सिर झुका कर प्रभु यहोवा को दण्डवत् किया।
27उसने कहा, “मेरे स्वामी इब्राहीम का परमेश्वर प्रभु यहोवा धन्य है, जिसने मेरे स्वामी के प्रति अपनी कृपा-दृष्टि व सच्चाई को त्याग नहीं दिया है; मार्ग में मेरी अगुवाई भी करके यहोवा ने मुझे मेरे स्वामी के भाइयों के घर पहुंचा दिया है।”
28तब उस कन्या ने दौड़कर अपनी माता के घराने को ये बातें कह सुनाईं।
29रिबका का एक भाई था जिसका नाम लाबान था। लाबान सोते पर उस पुरुष के पास दौड़ा-
30उसने तो उस नथ को और अपनी बहन की कलाइयों में कंगनों को देखा था, और अपनी बहन रिबका की इन बातों को सुना था कि उस पुरुष ने मुझसे यह सब बातें कहीं हैं, तो वह उस पुरुष के पास गया; और देखो, वह सोते के समीप ऊंटों के पास खड़ा था।
31और उसने कहा, “हे यहोवा के धन्य पुरुष, भीतर आ! तू क्यों बाहर खड़ा है? मैंने तो तेरे लिए घर और ऊंटों के लिए स्थान तैयार कर रखा है।”
32तब वह पुरुष घर के भीतर गया। लाबान ने ऊंटों की काठियां खोलकर उन्हें चारा व भूसा दिया तथा उस पुरुष और उन लोगों के लिए जो उसके साथ थे पैर धोने के लिए जल दिया।
33पर जब उसके सम्मुख भोजन परोसा गया तो उसने कहा, “मैं भोजन नहीं करूंगा जब तक कि मैं अपने अभिप्राय को न बता दू।” उसने उससे कहा, “कहे जा।”
34तब उसने कहा, “मैं इब्राहीम का सेवक हू।
35यहोवा ने मेरे स्वामी को बहुतायत से आशीष दी है जिससे कि वह धनवान हो गया है; उसने उसे भेड़-बकरियां, पशु, सोना-चांदी, दास-दासियां और बहुत-से ऊंट व गदहे दिए है।
36मेरे स्वामी की पत्नी सारा के बुढ़ापे में एक पुत्र हुआ है, और मेरे स्वामी ने उसे अपना सब कुछ दे दिया है।
37मेरे स्वामी ने मुझसे यह कह कर शपथ दिलाई है, ‘मैं तो कनानियों के देश में रहता हू। तू उनकी पुत्रियों में से मेरे पुत्र के लिए पत्नी न लाना।
38परन्तु तू मेरे पिता के घर जाकर, मेरे कुटुम्बियों में से मेरे पुत्र के लिए वधु ले आना।’
39और मैंने अपने स्वामी से कहा, ‘कदाचित् वह स्त्री मेरे पीछे न आना चाहे।’
40तब उसने मुझसे कहा, ‘यहोवा जिसके सम्मुख मैं चलता आया हूं अपना दूत तेरे साथ भेजेगा कि तेरी यात्रा सफल बनाए और तू मेरे पिता के घर से मेरे ही कुटुम्बियों में से मेरे पुत्र के लिए वधु ले आएगा;
41तू मेरी शपथ से तब ही छूटेगा जब तू मेरे कुटुम्बियों के पास जाएगा। और यदि वे उसे तुझे न दें, तब ही तू मेरी शपथ से छूट जाएगा।’
42इसलिए आज मैं इस सोते के पास आकर कहने लगा, ‘हे प्रभु यहोवा, मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर, यदि अब तू मेरी यात्रा को जिसमें मैं जा रहा हूं सफल करे,
43तो देख, मैं इस सोते के समीप खड़ा हूं और ऐसा हो कि जो कन्या पानी भरने को निकल आए और जिससे मैं कहूं, “अपने घड़े में से मुझे थोड़ा-सा पानी पिला दे”
44और यदि वह मुझसे कहे, “ले पी, और मैं तेरे ऊंटों के लिए भी पानी भरूंगी,” तो यह वही स्त्री हो जिसे यहोवा ने मेरे स्वामी के पुत्र के लिए ठहराया है।’
45जब मैं अपने मन में यह कह ही रहा था, तो देखो, रिबका अपने कांधे पर घड़ा लिए हुए आई, और सोते के पास नीचे जाकर पानी भर लाई, और मैंने उससे कहा, ‘जरा मुझे पानी पिला दे।’
46और उसने झट से घड़े को अपने कांधे से उतारा ओर कहा, ‘ले, पी ले, इसके बाद मैं तेरे ऊंटों को भी पिलाऊंगी,’ अतः मैंने पिया और उसने ऊंटो को भी पिलाया।
47तब मैंने उससे पूछा, ‘तू किसकी पुत्री है?’ उसने उत्तर दिया, ‘नाहोर द्वारा मिल्का से उत्पन्न बतूएल की बेटी हूं,’ और तब मैंने उसकी नाक में नथ और कलाइयों में कंगन पहना दिए।
48फिर मैंने झुककर यहोवा को दण्डवत् किया और अपने स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर यहोवा को धन्य कहा जिसने ठीक मार्ग पर मेरी अगुवाई की कि मैं अपने स्वामी के कुटुम्बी भाई की बेटी को उसके पुत्र के लिए ले आऊ।
49अब यदि तुम मेरे स्वामी के साथ कृपा और सच्चाई का व्यवहार करो तो मुझे बता दो; यदि नहीं फिर भी बता दो जिससे कि मैं दाहिनी या बाईं ओर जा सकू।”
50तब लाबान और बतूएल ने यह उत्तर दिया, “यह बात तो यहोवा की ओर से हुई है, इसलिए हम तुझसे न भला कह सकते हैं न बुरा।
51देख, रिबका तेरे सामने है, उसे ले जा और जैसा कि यहोवा ने कहा है, वह तेरे स्वामी के पुत्र की पत्नी हो।”
52और ऐसा हुआ कि जब इब्राहीम के सेवक ने उनकी बातें सुनीं तो उसने यहोवा के सम्मुख भूमि पर झुककर दण्डवत् किया।
53और उस सेवक ने सोने-चांदी के गहने तथा वस्त्र निकालकर रिबका को दिए, उसने उसके भाई और उसकी मां को भी बहुमूल्य वस्तुएं दी।
54तब उस सेवक और उसके साथ आए हुए लोगों ने खाया-पिया और वहीं रात बिताई। जब वे सुबह उठे तो उसने कहा, “मेरे स्वामी के पास जाने के लिए मुझे विदा कर।”
55पर रिबका के भाई और माता ने कहा, “कन्या को हमारे साथ थोड़े दिन अर्थात् दस दिन और रहने दे, इसके पश्चात् वह जा सकती है।”
56उसने उनसे कहा, “मुझे न रोको, इसलिए कि यहोवा ने मेरी यात्रा को सफल किया है। मुझे विदा करो कि मैं अपने स्वामी के पास जाऊ।”
57तब उन्होंने कहा, “हम कन्या को बुलाकर पूछेंगे कि उसकी क्या इच्छा है।”
58इस पर उन्होंने रिबका को बुलाकर उससे पूछा, “क्या तू इस पुरुष के साथ जाएगी?” और उसने कहा, “हां, मैं जाऊंगी।”
59इस प्रकार उन्होंने अपनी बहन रिबका और उसकी धाय को इब्राहीम के सेवक और उसके साथियों के साथ विदा किया।
60और उन्होंने यह कहकर रिबका को आशीर्वाद दिया, “हे हमारी बहन, तू हज़ारों और लाखों की आदिमाता हो, और तेरा वंश अपने बैरियों के नगरों का अधिकारी हो।”
61तब रिबका अपनी सहेलियों के साथ उठी, और ऊंटों पर सवार होकर उस पुरुष के पीछे हो ली। अतः वह सेवक रिबका को लेकर चल दिया।
62इसहाक जो दक्खिन देश में रहता था बेर-लहै-रोई नाम के कुएं से होकर चला आ रहा था।
63संध्या के समय इसहाक मैदान में ध्यान करने गया; उसने आंखें उठाकर देखा कि ऊंट चले आ रहे है।
64रिबका ने भी आंखें उठाईं और जब उसने इसहाक को देखा तो वह ऊंट पर से उतर गई।
65उसने सेवक से पूछा, “यह पुरुष कौन है जो हमसे मिलने के लिए मैदान में चला आ रहा है?” सेवक ने उससे कहा, “यह मेरा स्वामी है।” तब उसने घूंघट खींचकर अपने मुंह को ढांप लिया।
66तब सेवक ने जो कुछ किया था वह सब इसहाक को कह सुनाया।
67इसहाक रिबका को अपनी माता सारा के तम्बू में ले आया और उसने उसे ब्याह कर अपनी पत्नी बनाया और उससे प्रेम किया। इस प्रकार माता की मृत्यु के पश्चात् इसहाक को शांति मिली।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)