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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 30 / 50

उत्पत्ति 30

1जब राहेल ने देखा कि उससे याकूब के लिए कोई सन्तान उत्पन्न नहीं हुई, तब वह अपनी बहन से ईर्ष्या करने लगी और उसने याकूब से कहा, “मुझे भी सन्तान दे, नहीं तो मैं मर जाऊंगी।”

2तब राहेल के प्रति याकूब का क्रोध भड़क उठा और उसने कहा, “क्या मैं परमेश्वर के स्थान पर हूं जिसने तुझे गर्भ के फल से वंचित रखा है?”

3राहेल ने कहा, “यहां मेरी सेविका बिल्हा है। तू उसके पास जा कि वह मेरे घुटनों पर जने और उसके जनने से मैं भी सन्तान वाली बनू।”

4अतः उसने उसे अपनी सेविका बिल्हा को उसकी पत्नी होने के लिए दे दिया, और याकूब उसके पास गया।

5बिल्हा गर्भवती हुई और याकूब का उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ।

6तब राहेल ने कहा, “परमेश्वर ने मेरा न्याय किया है और मेरी पुकार सुनकर मुझे एक पुत्र दिया है।” इसलिए उसने उसका नाम दान रखा।

7तब राहेल की सेविका बिल्हा पुनः गर्भवती हुई और उसने याकूब के दूसरे पुत्र को जन्म दिया।

8अतः राहेल ने कहा, “मैंने बड़े सामर्थ्य से अपनी बहन से मल्लयुद्ध करके विजय प्राप्त की है।” और उसने उसका नाम नप्ताली रखा।

9जब लिआ ने देखा कि मुझको सन्तान उत्पन्न होना बन्द हो गयी है, तो उसने अपनी सेविका जिल्पा को लेकर याकूब की पत्नी होने के लिए दिया।

10लिआ की सेविका जिल्पा ने याकूब के लिए एक पुत्र को जन्म दिया।

11तब लिआ ने कहा, “धन्य भाग मेरे!” अतः उसने उसका नाम गाद रखा।

12लिआ की सेविका ने याकूब के दूसरे पुत्र को जन्म दिया।

13तब लिआ ने कहा, “मैं कितनी धन्य हू। स्त्रियां तो मुझे धन्य कहेंगी।” अतः उसने उसका नाम आशेर रखा।

14गेहूं की कटनी के दिनों में रूबेन खेत में गया और वहां उसे दूदाफल मिले। वह उन्हें अपनी माता लिआ के पास लाया। तब राहेल ने लिआ से कहा, “कृपया, अपने पुत्र के दूदाफलों में से कुछ मुझे दे।”

15परन्तु उसने कहा, “तूने जो मेरे पति को ले लिया है क्या यह छोटी बात है? और अब तू मेरे पुत्र के दूदाफलों को भी ले लेना चाहती है?” अतः राहेल ने कहा, “अच्छा तो तेरे पुत्र के दूदाफलों के बदले आज रात्रि में वह तेरे साथ सो सकता है।”

16संध्या समय जब याकूब खेत से आया तो लिआ ने उससे भेंट करने को निकल कर कहा, “तुझे मेरे पास आना ही होगा, क्योंकि मैंने सचमुच तुझे अपने पुत्र के दूदाफलों के बदले में किराए पर लिया है।” अतः उस रात वह उसके साथ सोया।

17परमेश्वर ने लिआ की सुधि ली और वह गर्भवती हुई तथा उसने याकूब के पांचवे पुत्र को जन्म दिया।

18तब लिआ ने कहा, “मैंने तो अपनी सेविका अपने पति को दी थी अतः परमेश्वर ने मुझे मेरी मजदूरी दी है।” इसलिए उसने उसका नाम इस्ससाकार रखा।

19लिआ पुनः गर्भवती हुई और उसने याकूब के छठवें पुत्र को जन्म दिया।

20तब लिआ ने कहा, “परमेश्वर ने मुझे उत्तम वरदान से सम्पन्न किया है; अब मेरा पति मेरे साथ ही रहेगा क्योंकि मेंने उसके छः पुत्रों को जन्म दिया है।” अतः उसने उसका नाम जबूलून रखा।

21इसके पश्चात् उसने एक पुत्री को जन्म दिया और उसका नाम दीना रखा।

22तब परमेश्वर ने राहेल को स्मरण किया और उसकी सुधि लेकर उसके गर्भ को खोला।

23अतः वह गर्भवती हुई और उसने एक पुत्र को जन्म देकर कहा, “परमेश्वर ने मेरी निन्दा को दूर कर दिया है।”

24और उसने यह कहकर उसका नाम यूसुफ रखा, “यहोवा मुझे एक और पुत्र प्रदान करे।”

25जब राहेल से यूसुफ उत्पन्न हुआ तब याकूब ने लाबान से कहा, “मुझे विदा कर कि मैं अपने स्थान और अपने देश को जाऊ।

26मेरी पत्नियां और मेरे बच्चे मुझे दे जिनके लिए मैंने तेरी सेवा की है, और मुझे जाने दे; क्योंकि जो सेवा मैंने तेरी की है उसे तू भली-भांति जानता है।”

27परन्तु लाबान ने उससे कहा, “यदि तुझे यह अच्छा लगे तो यहीं मेरे साथ रह जा; मैंने अनुभव से जान लिया है कि तेरे कारण यहोवा ने मुझे आशीष दी है।”

28फिर उसने आगे कहा, “मुझे अपनी मजदूरी बता और मैं उसे दूंगा।”

29परन्तु उसने उससे कहा, “तू स्वयं जानता है कि मैंने तेरी किस प्रकार सेवा की और तेरेे पशु मेरे पास किस प्रकार से रहे।

30क्योंकि मेरे आने से पहले तेरे पास थोड़े ही थे और अब वे कितने अधिक हो गये हैं, और जहां कहीं मेरे पैर पड़े वहां यहोवा ने तुझे आशीष दी है। परन्तु मैं अपने घर-बार के लिए कब कार्य करने पाऊंगा?”

31अतः उसने कहा, “मैं तुझे क्या दूं?” याकूब ने कहा, “तू मुझे कुछ न दे। यदि तू मेरे लिए यह एक काम करे तो मैं फिर तेरी भेड़-बकरियों को चराऊंगा और उनकी देखभाल करूंगाः

32आज मुझे अपनी सब भेड़-बकरियों के बीच में से होकर जाने दे कि मैं प्रत्येक चित्तीदार और चित्तकबरे भेड़ और मेमनों में से प्रत्येक काले रंग के तथा बकरों में से चितकबरे व चित्तीदार को अलग करूं, और ये ही मेरी मजदूरी ठहरेंगे।

33अतः आगे को जब मेरी मजदूरी की चर्चा चले तो मेरी सच्चाई ही मेरे लिए साक्षी ठहरेगी। आगे को यदि मेरे पास चित्तीदार और चितकबरे बकरों और काली भेड़ों को छोड़ और कुछ पाया जाए तो वह चोरी का ठहरेगा।”

34लाबान ने कहा, “ठीक है, तेरे कहने के अनुसार हो।”

35उसी दिन उसने धारीदार चितकबरी बकरियों को, जिन पर सफेद धब्बे थे और भेड़ों में से सब काले रंग की भेड़ों को अलग करके अपने पुत्रों के हाथों में सौंप दिया।

36और उसने अपने और याकूब के बीच तीन दिन के मार्ग का अन्तर रखा और याकूब लाबान की शेष भेड़-बकरियों को चराने लगा।

37तब याकूब ने चिनार, बादाम और अर्मोन के वृक्षों की हरी छड़ियां लीं और उनको कहीं-कहीं छीलकर छड़ियों की भीतरी सफेदी को सफेद धारीवाला बना दिया।

38उसने उन छीली हुई छड़ियों को भेड़-बकरियों के सामने उनके पानी पीने की नालियों में यहां तक कि नांदों में जहां भेड़-बकरियां पानी पीने आती थीं खड़ा कर दिया, और जब वे पानी पीने आईं तो गाभिन हो गईं।

39इसलिए कि भेड़-बकरियां छड़ियों के सामने गाभिन हुई थीं उन्होंने धारीदार, चित्तीदार और चितकबरे बच्चों को जन्म दिया।

40याकूब ने मेमनों को अलग किया और लाबान की भेड़-बकरियों के मुंह को धारीदार और सब काले झुंड की ओर कर दिया, उसने अपने झुंड को अलग रखा और उन्हें लाबान की भेड़- बकरियों में मिलने न दिया।

41यही नहीं जब -जब मोटी-ताज़ी भेड़-बकरियां गाभिन होतीं तब-तब याकूब उनकी आंखों के सामने नांदों में छड़ियों को खड़ा कर देता जिससे कि वे उन्हें देखकर गाभिन हों,

42परन्तु जब निर्बल भेड़-बकरियां गाभिन होतीं तो वह ऐसा नहीं करता; अतः निर्बल लाबान की रहीं और मोटी-ताज़ी याकूब की हो गईं।

43इस प्रकार वह मनुष्य अत्यधिक सम्पन्न हो गया। उसके पास बहुत सी भेड़-बकरियां, सेवक-सेविकाएं, ऊंट और गदहे हो गए।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)