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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 31 / 50

उत्पत्ति 31

1याकूब ने सुना कि लाबान के पुत्र ये बातें कह रहे हैं, “याकूब ने हमारे पिता का सब कुछ हड़प लिया है, और जो कुछ हमारे पिता का था उससे ही उसने यह सब सम्पत्ति बनाई है।”

2याकूब ने लाबान का मुख देखकर ताड़ लिया कि वह मेरे प्रति पहले जैसा नहीं है।

3तब यहोवा ने याकूब से कहा, “अपने पूर्वजों के देश और अपने सम्बन्धियों के पास लौट जा और मैं तेरे साथ रहूंगा।”

4अतः याकूब ने राहेल और लिआ को उस मैदान में बुलवा भेजा जहां उसकी भेड़-बकरियां थीं,

5और उसने कहा, “मैं देखता हूं कि तुम्हारे पिता का व्यवहार मेरे प्रति पहले जैसा नहीं है, परन्तु मेरे पिता का परमेश्वर मेरे साथ रहता आया है।

6तुम तो जानती हो कि मैंने तुम्हारे पिता की सेवा शक्ति भर की है।

7पर तुम्हारे पिता ने मेरे साथ धोखा किया और मेरी मजदूरी को दस बार बदल दिया, फिर भी यहोवा ने उसे मेरी हानि नहीं करने दी।

8जब उसने कहा, ‘चित्तीदार तेरी मजदूरी होंगे,’ तब सब भेड़-बकरियों ने चित्तीदार बच्चों को ही जन्म दिया। और जब उसने ऐसा कहा, ‘धारीदार तेरी मजदूरी होंगे, तब सब भेड़-बकरीयों ने धारीदार बच्चे जन्मे।

9इस प्रकार परमेश्वर ने तुम्हारे पिता के पशु लेकर मुझको दे दिए।

10भेड़-बकरियों के गाभिन होने के समय जब मैंने अपनी आंखें ऊपर उठाईं तो स्वप्न में क्या देखा कि बकरियों पर चढ़ने वाले बकरे धारीदार, चित्तीदार ओर चितकबरे है।

11तब परमेश्वर के स्वर्गदूत ने स्वप्न में मुझसे कहा, ‘हे याकूब,’ और मैंने कहा, ‘मैं यहां हू।’

12उसने कहा, ‘आंखें उठाकर उन सब बकरों को देख जो बकरियों पर चढ़ रहे है; वे धारीदार चित्तीदार और चितकबरे हैं; क्योंकि लाबान तेरे साथ जो कुछ करता आया है वह सब मैंने देखा है।

13मैं उस बेत-एल का परमेश्वर हूं जहां तूने एक खम्भे पर तेल डाल कर उसका अभिषेक किया था और मेरी मन्नत मानी थी। अब उठ, इस देश को छोड़कर अपनी जन्मभूमि को लौट जा’।”

14तब राहेल और लिआ ने उसे उत्तर दिया, “क्या हमारे पिता के घर में हमारे लिए अब भी कुछ भाग या मीरास है?

15क्या वह हमें पराया नहीं समझता? क्योंकि उसने तो हमें बेच दिया है और उस रकम को पूरी तरह से खा बैठा है।

16अवश्य ही वह सब धन जिसे परमेश्वर ने हमारे पिता से ले लिया है हमारा और हमारे बच्चों का है, अतः अब जो परमेश्वर ने तुझ से कहा है वही कर।”

17तब याकूब ने उठकर अपने बच्चों और पत्नियों को ऊंटों पर बैठाया और

18पद्दन-अराम में इकट्ठे किए हुए अपने सब पशुओं और सम्पत्ति अर्जित किए हुए जानवरों के झुंड को लेकर वह कनान देश में अपने पिता इसहाक के पास जाने के लिए चल पड़ा।

19जब लाबान अपनी भेड़ों का ऊन कतरने को गया हुआ था तो राहेल ने अपने पिता के गृह-देवताओं को चुरा लिया।

20याकूब ने अरामी लाबान को धोखा दिया और यह न बताया कि मैं भागा जाता हूं,

21और जो कुछ उसके पास था उसे लेकर वह भाग गया; फिर उसने आगे बढ़ कर फ़रात नदी को पार किया और अपना मुंह गिलाद के पहाड़ी देश की ओर किया।

22जब तीसरे दिन लाबान को यह बताया गया कि याकूब भाग गया है,

23तो उसने अपने सम्बन्धियों को साथ लेकर सात दिन तक यात्रा करके उसका पीछा किया और गिलाद के पहाड़ी देश में उसको जा पकड़ा।

24और परमेश्वर ने लाबान अरामी को स्वप्न में दर्शन देकर उससे कहा, “सावधान रह, तू याकूब से न तो भला और न बुरा कहना।”

25जब लाबान, याकूब के पास पहुंचा तो याकूब अपना तम्बू पहाड़ी देश में खड़ा किए हुए था और लाबान तथा उसके सम्बन्धियों ने भी गिलाद के पहाड़ी देश में अपने तम्बू खड़े किए।

26तब लाबान ने याकूब से कहा, “तूने यह क्या किया कि मुझे धोखा देकर मेरी बेटियों को तलवार के बल से बनाए गए युद्ध-बन्दियों के समान भगा लाया?

27तूने चुपके से भाग कर मुझे क्यों धोखा दिया और मुझे क्यों नहीं बताया? अन्यथा मैं तुझे आनन्द के साथ मृदंग और वीणा बजवाते और गीत गवाते विदा करता।

28तूने मेरे बेटे और बेटियों को चूमने भी नहीं दिया। तूने तो मूर्खता की है।

29तुम लोगों की हानि करने का सामर्थ्य तो मुझमें है, परन्तु तुम्हारे पिता के परमेश्वर ने रात में मुझसे कहा, ‘सावधान रह! तू याकूब से न तो कुछ भला और न बुरा कहना।’

30अब तू चला आया तो अच्छा किया क्योंकि तू अपने पिता के घर का बड़ा अभिलाषी है परन्तु तूने मेरे देवताओं को क्यों चुराया?”

31तब याकूब ने लाबान को उत्तर दिया, “मैं यह सोचकर डर गया था कि कहीं तू अपनी बेटियों को मुझसे छीन न ले।

32जिसके पास तू अपने देवताओं को पाए वह जीवित न बचेगा। हमारे सम्बन्धियों के सामने मेरे सामान में तेरा जो कुछ निकले उसे बता और ले ले।” क्योंकि याकूब नहीं जानता था कि राहेल ने उन्हें चुराया है।

33अतः लाबान, याकूब और लिआ तथा उन दोनों दासियों के तम्बुओं में गया परन्तु उसे कुछ न मिला। तब वह लिआ के तम्बू में से निकल कर राहेल के तम्बू में गया।

34राहेल तो गृह-देवताओं को ऊंट की काठी में रखकर उन पर बैठी थी और लाबान ने सारे तम्बू को टटोला परन्तु कुछ न पाया।

35और उसने अपने पिता से कहा, “मेरा प्रभु क्रोधित न हो कि मैं तेरे सामने न उठ सकी क्योंकि मैं स्त्री-धर्म से हू।” अतः खोजने पर भी उसे गृह-देवता नहीं मिले।

36तब याकूब क्रोधित हुआ और लाबान से झगड़ने लगा; और याकूब ने लाबान को उत्तर दिया, “मेरा अपराध क्या है? मेरा पाप क्या है कि तूने इतना क्रोधित होकर मेरा पीछा किया?

37तूने तो मेरा सारा सामान टटोल-टटोल कर देखा, पर तुझे अपने घर के सारे सामान में से क्या मिला? उसे मेरे और अपने सम्बन्धियों के सामने रख दे कि वे हम दोनों के बीच निर्णय करे।

38इन बीस वर्षों तक मैं तेरे साथ रहा। इनमें न तो तेरी भेड़-बकरियों के गर्भ गिरे न ही मैंने कभी तेरे मेढ़ों का मांस खाया है।

39जिसे जंगली जानवरों ने फाड़ा उसे मैं तेरे पास न लाया, उसकी हानि मैंने ही उठाई। चाहे दिन को चुराया जाता चाहे रात को, तू तो मुझ ही से ले लेता था।

40मेरी दशा ऐसी थी कि दिन को तो धूप और रात को पाला मुझे खा जाता था और नींद मेरी आंखों से भाग जाती थी।

41बीस वर्ष तक मैं तेरे घर में रहा, चौदह वर्ष तक तो तेरी दो बेटियों के लिए और छः वर्ष तेरी भेड़-बकरियों के लिए मैंने तेरी सेवा की और तूने मेरी मजदूरी को दस बार बदला।

42यदि मेरे पिता का परमेश्वर अर्थात् इब्राहीम का परमेश्वर, जिसका भय इसहाक भी मानता है मेरी ओर न होता तो तू निश्चय ही अब मुझे खाली हाथ भगा देता। परमेश्वर ने मेरे दुख और मेरे हाथों के परिश्रम को देखा है इसलिए उसने कल रात में तुझे झिड़का।”

43तब लाबान ने उत्तर दिया और याकूब से कहा, “ये बेटियां तो मेरी ही बेटियां है। ये बच्चे भी मेरे ही बच्चे है। ये भेड़-बकरियां भी मेरी ही हैं और जो कुछ तू देखता है वह सब मेरा ही है। परन्तु आज मैं अपनी इन बेटियों व इनसे उत्पन्न बच्चों से क्या कर सकता हूं?

44अब आ, मैं और तू एक वाचा बांधें जो मेरे और तेरे बीच साक्षी ठहरे।”

45तब याकूब ने एक पत्थर लिया और उसे खम्भे के समान खड़ा किया।

46तब याकूब ने अपने कुटुम्बियों से कहा “पत्थर इकट्ठा करो अतः उन्होंने पत्थर इकट्ठा करके एक ढेर लगाया और उन्होंने वहीं ढेर के पास भोजन किया।

47लाबान ने तो इसका नाम यज्र-सहादुथा, पर याकूब ने गालएद रखा

48और लाबान ने कहा, “यह ढेर आज मेरे और तेरे बीच साक्षी है।” अतः उसका नाम गालएद रखा गया,

49और मिस्पा भी, क्योंकि उसने कहा, “जब हम एक दूसरे से अलग रहें तब यहोवा मेरी और तेरी चौकसी करता रहे।

50यदि तू मेरी बेटियों के साथ दुर्व्यवहार करे या मेरी बेटियों के अतिरिक्त और स्त्रियां ब्याह ले तो यघपि हमारे साथ कोई मनुष्य न रहेगा पर देख, परमेश्वर मेरे और तेरे बीच साक्षी रहेगा।”

51और लाबान ने याकूब से कहा, “इस ढेर को और इस खम्भे को देख जिन्हें मैंने अपने और तेरे बीच में खड़ा किया है।

52यह ढेर साक्षी है और यह खम्भा भी साक्षी है कि मैं हानि पहुंचाने के लिए इस ढेर को पार करके तेरे पास न आऊंगा, और न तू मुझे हानि पहुंचाने के लिए इस ढेर और इस खम्भे को पार करके मेरे पास आएगा।

53इब्राहीम का परमेश्वर और नाहोर का परमेश्वर, और उनके पिता का परमेश्वर हमारे बीच न्याय करे।” तब याकूब ने उसकी शपथ खाई जिसका भय उसका पिता इसहाक मानता था।

54और याकूब ने उस पहाड़ पर मेलबलि चढ़ाई और अपने कुटुम्बियों को भोज में बुलाया; तब उन्होंने भोजन करके पहाड़ पर रात बिताई।

55और लाबान ने बड़ी भोर को उठकर अपने बेटे-बेटियों को चूमा और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब लाबान उनसे विदा होकर अपने स्थान को लौट गया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)