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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 32 / 50

उत्पत्ति 32

1याकूब अपने मार्ग पर आगे बढ़ा और परमेश्वर के दूत उससे मिले।

2और याकूब ने उन्हें देखकर कहा, “यह तो परमेश्वर का दल है।” अतः उसने उस स्थान का नाम महनैम रखा।

3तब याकूब ने अपने भाई एसाव के पास सेईर प्रदेश में अर्थात् एदोम में अपने आगे दूत भेजे।

4उसने उन्हें यह आज्ञा दी, “तुम मेरे स्वामी एसाव से कहनाः ‘तेरा दास याकूब यह कहता है कि मैं लाबान के पास प्रवासी होकर अब तक रहा;

5और मेरे पास गाय-बैल, गदहे, भेड़-बकरियां और दास-दासियां हैं: और मैंने अपने स्वामी के पास इसलिए समाचार भेजा है कि तेरी कृपादृष्टि मुझ पर हो’।”

6और दूतों ने याकूब के पास लौट कर कहा, “हम तेरे भाई एसाव के पास गए थे और वह भी तुझसे भेंट करने को आ रहा है, और उसके साथ चार सौ पुरुष है।”

7तब याकूब बहुत डरा और घबरा गया; और उसने उन लोगों को जो उसके साथ थे और भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और ऊंटों को दो दलों में बांट दिया,

8क्योंकि उसने कहा, “यदि एसाव आकर एक दल पर आक्रमण करे तो दूसरा दल भाग कर बच जाएगा।”

9याकूब ने कहा, “हे परमेश्वर, मेरे दादा इब्राहीम और मेरे पिता इसहाक के परमेश्वर; हे यहोवा, तूने तो मुझसे कहा था कि अपने देश में अपने सम्बन्धियों के पास लौट जा और मैं तुझे सम्पन्न करूंगा।

10मैं तो तेरी सब करुणा और सब सच्चाई के उन कामों के योग्य नहीं हूं जो तूने अपने दास पर प्रकट किए क्योंकि मैं तो केवल अपनी लाठी लेकर यरदन के पार गया था और अब तो मेरे पास दो दल हो गए है।

11मैं विनती करता हूं कि मुझे मेरे भाई एसाव के हाथ से छुड़ा; क्योंकि मैं उससे डरता हूं, कहीं ऐसा न हो कि वह आकर मुझ पर आक्रमण करे और माताओं को बच्चों सहित मार डाले।

12तूने तो कहा था, ‘मैं निश्चय तुझे सम्पन्न करूंगा और तेरे वंश को समुद्र की बालू के कणों के समान बढ़ाऊंगा जिनकी गिनती नहीं हो सकती’।”

13अतः उसने रात वहीं बिताई, और जो कुछ उसके पास था उसमें से उसने अपने भाई एसाव को भेंट देने के लिए चुन कर निकालाः

14दो सौ बकरियां, बीस बकरे, दो सौ भेड़ें और बीस मेढ़े,

15दूध देने वाली तीस ऊंटनियां और उनके बच्चे, चालीस गायें, दस सांड़, बीस गदहियां और दस गदहे।

16उसने इन्हें अलग-अलग झुंडों में करके अपने दासों को देकर भेजा और अपने दासों से कहा, “मेरे आगे बढ़ जाओ और झुंडों के बीच में अन्तर रखो।”

17और उसने आगे के झुंड वालों को यह आज्ञा दी, “जब मेरा भाई एसाव तुमसे मिलकर पूछे, कि तू किस का दास है और कहां जा रहा है और तेरे आगे ये पशु किसके हैं,

18तब तू कहना, कि ये तेरे दास याकूब के हैं जो मेरे स्वामी एसाव के लिए भेजी गई भेंट है, और देख, वह भी हमारे पीछे-पीछे आ रहा है।”

19फिर उसने दूसरे और तीसरे को और उन सबको जो झुंड़ों के पीछे-पीछे आ रहे थे आज्ञा दी, कि जब तुम एसाव से मिलो तो इसी प्रकार कहना,

20“देख, तेरा सेवक याकूब भी हमारे पीछे है।” क्योंकि उसने सोचा, कि मैं अपने आगे उसके लिए भेंट भेजकर उसे प्रसन्न करूंगा और फिर उसके दर्शन करूंगा। हो सकता है कि वह मुझे ग्रहण कर ले।

21अतः भेंट उससे पहले पार उतर गई और उस रात वह स्वयं तम्बू में रहा।

22वह फिर उसी रात को उठ कर अपनी दोनों पत्नियों और दोनों दासियों और ग्यारह पुत्रों को लेकर, यब्बोक नदी के घाट से पार उतर गया।

23उसने उन्हें नदी के पार उतार दिया और अपना सब कुछ पार भेज दिया।

24तब याकूब अकेला रह गया और एक पुरुष आकर पौ फटने तक उससे कुश्ती लड़ता रहा।

25और जब उसने देखा कि मैं उस पर प्रबल नहीं होता तो उसने उसकी जांघ की नस को छुआ इसलिए याकूब की जांघ की नस कुश्ती लड़ते समय जोड़ से उखड़ गई।

26तब उसने कहा, “मुझे जाने दे क्योंकि भोर होने वाला है।” परन्तु याकूब ने कहा, “जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, मैं तुझे न जाने दूंगा।”

27तब उसने पूछा, “तेरा नाम क्या है?” और उसने कहा, “याकूब।”

28तब उसने कहा, “अब से तेरा नाम याकूब नहीं परन्तु इस्राएली होगा, क्योंकि तू परमेश्वर से और मनुष्यों से लड़कर प्रबल हुआ है।”

29तब याकूब ने उससे कहा, “कृपा करके मुझे अपना नाम बता।” परन्तु उसने कहा, “तू मेरा नाम क्यों पूछता है?” फिर उसने उसे वहीं आशीर्वाद दिया।

30इसलिए याकूब ने उस स्थान का नाम पनीएल रखा, क्योंकि उसने कहा, “परमेश्वर को आमने-सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।”

31पनीएल से उसके निकलते-निकलते सूर्योदय हो गया, और वह जांघ से लंगड़ा रहा था।

32इसलिए इस्राएल आज भी जांघ को जोड़ने वाली कूल्हे की नस को नहीं खाते, क्योंकि उस पुरुष ने याकूब की जांघ की जोड़ पर कूल्हे की नस को छुआ था।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)