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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 33 / 50

उत्पत्ति 33

1जब याकूब ने अपनी आंखें उठाकर देखा कि एसाव चार सौ पुरुष साथ लिए चला आ रहा है, तब उसने लिआ और राहेल तथा दोनों दासियों के बीच बच्चों को बांट दिया।

2तब उसने दासियों और उनके बच्चों को तो सबसे आगे, फिर लिआ और उसके बच्चों को, और सबसे पीछे राहेल और यूसुफ को रखा।

3परन्तु वह स्वयं उनसे आगे निकल गया और जब तक अपने भाई के निकट न पहुंचा, उसने सात बार भूमि पर गिरकर उसे दण्डवत् किया।

4तब एसाव उससे भेंट करने दौड़ पड़ा और उसे छाती से लगाया और गले से लिपटकर उसे चूमा और वे रो पड़े

5और उसने अपनी आंखें उठाकर स्त्रियों और बच्चों को देखा और पूछा, “ये तेरे साथ कौन हैं?” उसने कहा, “ये तेरे दास के बच्चे हैं जिन्हें परमेश्वर ने अनुग्रह करके दिया है।”

6तब दासियां अपने बच्चों सहित निकट आईं और उन्होंने दण्डवत् किया।

7इसी प्रकार लिआ भी अपने बच्चों के साथ निकट पहुंची और उन्होंने भी दण्डवत् किया। अन्त में यूसुफ और राहेल ने भी निकट पहुंचकर दण्डवत् किया।

8और उसने कहा, “इस बड़े दल से जो मुझे मिला तेरा क्या प्रयोजन है?” उसने कहा, “यह कि मेरे प्रभु की कृपादृष्टि मुझ पर बनी रहे।”

9परन्तु एसाव ने कहा, “हे मेरे भाई, मेरे पास तो बहुत है, जो तेरा है वह तेरा ही बना रहे।”

10तब याकूब ने कहा, “नहीं, नहीं, यदि तेरी कृपादृष्टि मुझ पर हुई है तो मेरे हाथ से यह भेंट स्वीकार कर। मैंने तो तेरा मुख ऐसे देखा है मानो परमेश्वर का मुख क्योंकि तूने मुझे ग्रहण किया है।

11इसलिए अब मेरी उस भेंट को ग्रहण कर जो तेरे सम्मुख लाई गई है, क्योंकि परमेश्वर ने मुझ पर अनुग्रह किया है और मेरे पास बहुत है।” इस प्रकार उसने उससे आग्रह किया और उसने भेंट ले ली।

12तब एसाव ने कहा, “आओ, अब चलें! मैं तेरे आगे-आगे चलूंगा।”

13परन्तु उसने उससे कहा, “मेरा स्वामी तो जानता है कि बच्चे सुकुमार हैं और दूध पिलाने वाली भेड़-बकरियां और गायें हैं जिनका बोझ मुझ पर ही है। यदि वे एक दिन भी अधिक हांके जाएं तो सब भेंड़-बकरियां मर जाएंगी।

14इसीलिए मेरा प्रभु अपने दास के आगे बढ़ जाए। और मैं अपने पशुओं की चाल के अनुसार जो मेरे सामने हैं और बाल-बच्चों की चाल के अनुसार धीरे-धीरे चलता हुआ अपने प्रभु से सेईर में आ मिलूंगा।”

15तब एसाव ने कहा, “तो ऐसा होने दे कि मैं अपने साथ के लोगों में से कुछ लोगों को तेरे साथ छोड़ जाऊ।” परन्तु उसने कहा, “इसकी क्या आवश्यकता है? यही बहुत होगा कि मेरे स्वामी की कृपादृष्टि मुझ पर बनी रहे।”

16और उसी दिन एसाव सेईर के मार्ग पर लौट गया।

17याकूब ने सुक्कोत तक यात्रा की और वहां अपने लिए एक घर बनाया तथा अपने पशुओं के लिए झोपड़ें खड़े किए। इसी कारण उस स्थान का नाम सुक्कोत पड़ा।

18जब याकूब पद्दन-अराम से चला तो कनान देश के शकेम नगर में सुरक्षित पहुंचा और उसने नगर के सामने डेरे खड़े किए।

19और भूमि के जिस भाग पर उसने अपना तम्बू खड़ा किया था, उसे उसने शकेम के पिता हमोर के पुत्रों के हाथ से एक सौ कसीताह देकर मोल लिया।

20तब उसने वहां एक वेदी बनाई और उसका नाम एल-एलोहे-इस्राएल रखा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)