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पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 43 / 50

उत्पत्ति 43

1देश में अकाल भयंकर होता गया।

2और ऐसा हुआ कि जब वह अन्न जिसे वे मिस्र से लाए थे समाप्त हो गया तो उनके पिता ने उनसे कहा, “फिर से जाकर हमारे लिए कुछ भोजन-वस्तु मोल ले आओ।”

3तब यहूदा ने उससे कहा, “उस पुरुष ने हमें दृढ़तापूर्वक चेतावनी दी, ‘यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे साथ न आए तो तुम मेरा मुंह देखने न पाओगे।’

4यदि तू हमारे भाई को हमारे साथ भेजे, तब तो हम जाकर तेरे लिए भोजन-वस्तु मोल ले आएंगे।

5परन्तु यदि तू उसको न भेजे तो हम न जाएंगे, क्योंकि उस पुरुष ने हमसे कहा, ‘यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे साथ न आए तो तुम मेरा मुंह देखने न पाओगे’।”

6तब इस्राएल ने कहा, “तुमने उस पुरुष को यह बताकर कि हमारा एक और भाई है, मुझसे ऐसा बुरा बर्ताव क्यों किया?”

7परन्तु उन्होंने कहा, “उस पुरुष ने विशेष रूप से हमारे और हमारे सम्बन्धियों के बारे में यह कहकर पूछा, ‘क्या तुम्हारा पिता अब तक जीवित है? क्या तुम्हारा और भी कोई भाई है?” तब हमने उसके प्रश्नों का उत्तर दिया। तब क्या हम जानते थे कि वह कहेगा, अपने भाई को यहां ले आओ’?”

8फिर यहूदा ने अपने पिता इस्राएल से कहा, “उस लड़के को मेरे साथ भेज दे, कि हम चले जाएं जिससे कि हम और तू तथा हमारे बाल-बच्चे जीवित रहें और न मरे।

9मैं स्वयं उसका जामिन हूं; उसके लिए तू मुझे ही उत्तरदायी ठहराना। यदि मैं उसे वापस लाकर तेरे पास न खड़ा करूं, तो मैं सदा के लिए तेरा अपराधी ठहरूंगा।

10यदि हम लोग विलम्ब न करते तो अब तक दूसरी बार लौट आते।”

11तब उनके पिता इस्राएल ने उनसे कहा, “यदि ऐसा ही करना है तो यह करो कि उस पुरुष के लिए अपने-अपने बोरों में इस देश की कुछ उत्तम वस्तुओं में से अर्थात् थोड़ा बलसान, थोड़ा मधु, सुगन्ध-द्रव्य और गन्धरस, पिस्ते और बादाम भेंट में ले जाओ।

12और अपने साथ दूना रुपया ले जाओ और जो रुपया तुम्हारे बोरों के मुंह पर रख कर फेर दिया गया था, उसको भी लेते जाओ, कदाचित् ऐसा भूल से हुआ हो।

13अपने भाई को भी साथ लो और उठकर उस पुरुष के पास फिर जाओ।

14काश, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर उस पुरुष की दृष्टि में तुम्हारे प्रति दया उत्पन्न करे जिससे कि वह तुम्हारे दूसरे भाई को और बिन्यामीन को छोड़ दे, और यदि मैं निर्वंश हुआ तो होने दो!”

15तब उन लोगों ने वह भेंट और दूना रुपया हाथ में लिया और बिन्यामीन को साथ लेकर चले और मिस्र में पहुंच कर यूसुफ के सामने खड़े हुए।

16जब यूसुफ ने उनके साथ बिन्यामीन को देखा तो अपने घर के अधिकारी से कहा, “उन मनुष्यों को घर में पहुंचा दो, और एक पशु काट कर भोजन तैयार करो; क्योंकि वे लोग दोपहर को मेरे साथ भोजन करेंगे।”

17तब उस पुरुष ने यूसुफ के कहने के अनुसार किया और वह उन लोगों को यूसुफ के घर में ले गया।

18वे लोग तो डर गए क्योंकि उन्हें यूसुफ के घर में पहुंचाया गया था, और उन्होंने कहा, “जो रुपया पहली बार हमारे बोरों में लौटा दिया गया था, उसी के कारण हम भीतर लाए गए हैं, जिससे कि उसे हमारे विरुद्ध अवसर मिले और वह हम पर टूट पड़े और हमारे गदहों समेत हमें दास बना ले।”

19तब वे यूसुफ के घर के अधिकारी के पास आए और घर के द्वार पर उससे बातें कीं,

20और कहा, “हे हमारे प्रभु, सचमुच, जब हम पहली बार अन्न मोल लेने आए थे

21तो ऐसा हुआ कि जब हम सराय में पहुंचे और अपने बोरे खोले तो देखा कि प्रत्येक जन का पूरा-पूरा रुपया उसके बोरे के मुंह पर ही रखा था, इसलिए हम उसको अपने साथ लेते आए है।

22हम भोजन-वस्तु मोल लेने के लिए और भी रुपया लाए है। हम नहीं जानते कि हमारा रुपया हमारे बोरों में किसने रख दिया था।”

23और उसने कहा, “घबराओ मत, डरो नहीं! तुम्हारे परमेश्वर और तुम्हारे पिता के परमेश्वर ने तुम्हारे बोरों में तुम्हें धन दिया है। मुझे तो तुम्हारा रुपया मिल चुका है।” फिर वह शमौन को निकालकर उनके पास ले आया।

24तब उस व्यक्ति ने उन लोगों को यूसुफ के घर में ले जाकर पानी दिया, और उन्होंने अपने पैर धोए; और उसने उनके गदहों को चारा दिया।

25इसलिए उन्होंने दोपहर तक अर्थात् यूसुफ के आने के समय तक उस भेंट को तैयार किया, क्योंकि उन्होंने सुना था कि वहीं भोजन करना है।

26जब यूसुफ घर आया तो वे उस भेंट को जो उनके हाथ में थी उसके पास घर में लाए और भूमि पर झुककर उसे दण्डवत् किया।

27तब उसने उनका कुशल-क्षेम पूछा और कहा, “क्या तुम्हारा वृद्ध पिता जिसकी चर्चा तुमने की थी कुशल से है? क्या वह अब तक जीवित है?”

28और उन्होंने कहा, “तेरा दास, हमारा पिता कुशल से है, वह अब तक जीवित है।” और उन्होंने सिर झुकाकर दण्डवत् किया।

29तब उसने आंखें उठाकर अपने सगे भाई बिन्यामीन को देखा, और पूछा, “क्या यही तुम्हारा वह छोटा भाई है जिसकी चर्चा तुमने मुझसे की थी?” फिर उसने कहा, “हे मेरे पुत्र, परमेश्वर तुझ पर अनुग्रह करे।”

30तब अपने भाई को देखकर उसका मन भर आया और यूसुफ रोने के लिए स्थान ढूंढ़ने लगा और शीघ्रता से अपनी कोठरी में जाकर रो पड़ा।

31फिर वह अपना मुंह धोकर बाहर निकल आया और अपने आपको संयत करके कहा, “भोजन परोसो।”

32तब उन्होंने उसके लिए तो अलग, और उन भाइयों के लिए अलग, और उन मिस्रियों के लिए अलग भोजन परोसा जो उसके साथ खाते थे, इसलिए कि मिस्री लोग इब्रियों के साथ भोजन नहीं कर सकते थे, क्योंकि यह मिस्रियों के लिए घृणास्पद था।

33वे उसके सामने बड़े से लेकर छोटे तक, अपनी आयु के अनुसार क्रम में बैठाए गए थे और वे लोग विस्मित होकर एक दूसरे की ओर देखने लगे।

34और उसने अपने सामने की भोजन वस्तुएं उन्हें दीं, परन्तु बिन्यामीन का हिस्सा उसके भाइयों से पांच गुना अधिक मिला। इस प्र्रकार उन्होंने उसके संग मनमाना खाया-पिया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)