पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 42 / 50
उत्पत्ति 42
1जब याकूब ने सुना कि मिस्र में अन्न है तब याकूब ने अपने पुत्रों से कहा, “तुम एक दूसरे का मुंह क्यों ताकते हो?”
2और उसने कहा, “देखो, मैंने सुना है कि मिस्र में अन्न है, तुम वहां जाकर हमारे लिए अन्न मोल ले आओ जिससे कि हम जीवित रह सकें और मर न जाए।”
3तब यूसुफ के दस भाई अन्न मोल लेने के लिए मिस्र को गए।
4परन्तु याकूब ने यूसुफ के भाई बिन्यामीन को उसके भाइयों के साथ नहीं भेजा, क्योंकि उसने कहा, “कहीं उस पर कोई विपत्ति न आ पड़े।”
5अतः अन्न मोल लेने आने वालों में इस्राएल के पुत्र भी थे, क्योंकि कनान देश में भी अकाल पड़ा था।
6यूसुफ उस देश का शासक था, वही उस देश के सब लोगों को अन्न बेचता था। और यूसुफ के भाई आए और उन्होंने भूमि पर झुककर उसे दण्डवत् किया।
7जब यूसुफ ने अपने भाइयों को देखा तो उनको पहचान गया, परन्तु उनके सामने अनजान बन कर उनसे कठोरता से बोला। और उसने उनसे कहा, “तुम कहां से आए हो?” उन्होंने उत्तर दिया, “हम तो कनान देश से अन्न मोल लेने को आए है।”
8परन्तु यूसुफ ने तो अपने भाइयों को पहचान लिया था, यघपि उन्होंने उसे न पहचाना।
9तब यूसुफ ने उन स्वप्नों को स्मरण करके जो उसने उनके विषय में देखे थे, उनसे कहा, “तुम जासूस हो। तुम हमारे देश की दुर्दशा को देखने आए हो।”
10तब उन्होंने उससे कहा, “नहीं, हे स्वामी, तेरे दास तो अन्न मोल लेने आए है।
11हम सब तो एक ही पुरुष के पुत्र है। हम तो ईमानदार मनुष्य हैं, तेरे दास जासूस नहीं है।”
12फिर भी उसने उनसे कहा, “नहीं, तुम तो हमारे देश की दुर्दशा देखने आए हो।”
13परन्तु उन्होंने कहा, “हम तेरे दास बारह भाई हैं और कनान देशवासी एक ही पुरुष के पुत्र है। और देख, सबसे छोटा इस समय हमारे पिता के पास है और एक जाता रहा।”
14यूसुफ ने उनसे कहा, “मैंने तुमसे ठीक ही कहा, तुम जासूस हो।
15तुम इस प्रकार जांचे जाओगेः फि़रौन के जीवन की शपथ, जब तक तुम्हारा सबसे छोटा भाई यहां न आ जाए तुम इस स्थान से न जाने पाओगे।
16अपने में से एक को भेजो कि वह जाकर तुम्हारे भाई को ले आए, और तुम कैद में रहोगे जिससे तुम्हारे कथन की जांच हो सके कि तुम में सच्चाई है कि नही। परन्तु यदि नहीं, तो फि़रौन के जीवन की शपथ, तुम निश्चय ही जासूस ठहरोगे।”
17अतः उसने उन्हें तीन दिन तक बन्दीगृह में डाल रखा।
18तब तीसरे दिन यूसुफ ने उनसे कहा, “एक काम करो तभी जीवित रहोगे, क्योंकि मैं परमेश्वर का भय मानता हूं:
19यदि तुम सच्चे मनुष्य हो, तो तुममें से एक भाई बन्दीगृह में रहे; शेष तुम सब अपने घर वालों की भूख मिटाने के लिए अन्न ले जाओ,
20और अपने सबसे छोटे भाई को मेरे पास ले आओ, जिससे तुम्हारी बातें सच प्रमाणित हों और तुम मार डाले न जाओ।” और उन्होंने ऐसा ही किया।
21तब उन्होंने आपस में कहा, “निःसन्देह हम अपने भाई के विषय में दोषी हैं, क्योंकि जब उसने हमसे गिड़गिड़ाकर विनती की और हमने उसकी मानसिक पीड़ा को देखा, फिर भी उसकी न सुनी, इसीलिए यह संकट हम पर आ पड़ा है।”
22तब रूबेन ने उत्तर दिया, “क्या मैंने तुमसे न कहा था, ‘इस लड़के के विरुद्ध पाप न करो’ परन्तु तुमने न सुना? अब उसके खून का पलटा हमसे लिया जा रहा है।”
23वे तो नहीं जानते थे कि यूसुफ ने हमारी बातें समझ ली हैं, क्योंकि उनके बीच में एक दुभाषिया था।
24और वह उनके पास से हट गया और रोया। परन्तु जब वह उनके पास लौटा तो उनसे बातचीत करके उनमें से शमौन को अलग किया और उनकी आंखों के सामने उसे बन्दी बना दिया।
25तब यूसुफ ने आदेश दिया कि उनके बोरे अन्न से भर दिए जाएं और उनमें से प्रत्येक का रुपया उसी के बोरे में रख दिया जाए और उनकी यात्रा के लिए भोजन-वस्तु भी दी जाएं और उनके लिए ऐसा ही किया गया।
26इस प्रकार उन्होंने अपना अन्न अपने गदहों पर लादा और वे वहां से चल दिए।
27सराय में जब एक ने अपने गदहे को चारा देने के लिए अपना बोरा खोला, तो उसने अपना रुपया देखा, और देखो, रुपया उसके बोरे में मुंह पर ही रखा था।
28तब उसने अपने भाइयों से कहा, “मेरा रुपया लौटा दिया गया है, और देखो वह तो मेरे बोरे में ही है।” तब उनके जी में जी न रहा, और वे भयभीत होकर एक दूसरे को ताकने और कहने लगे, “यह क्या है जो परमेश्वर ने हमारे साथ किया है?”
29जब वे कनान देश में अपने पिता याकूब के पास आए, तो जो कुछ उनके साथ हुआ था वह सब कह सुनाया। उन्होंने कहा,
30“जो पुरुष उस देश का स्वामी है, उसने हमसे कठोरता से बातें कीं और हमें जासूस समझा।
31परन्तु हमने उससे कहा, ‘हम तो सच्चे मनुष्य हैं, हम जासूस नही।
32हम बारह भाई एक ही पिता के पुत्र हैं जिनमें से एक नहीं रहा और सबसे छोटा इस समय कनान देश में हमारे पिता के पास है।’
33और उस पुरुष ने जो उस देश का स्वामी है, हमसे कहा, ‘मैं इससे जान लूंगा कि तुम सच्चे मुनष्य होः कि तुम अपने एक भाई को मेरे पास छोड़ दो और अपने घर वालों की भूख मिटाने के लिए अन्न ले जाओ।
34परन्तु अपने सबसे छोटे भाई को मेरे पास ले आओ कि मैं जान सकूं कि तुम जासूस नहीं, परन्तु सच्चे मनुष्य हो। मैं तुम्हारे भाई को तुम्हें लौटा दूंगा और तुम इस देश में लेन-देन कर सकोगे’।”
35तब ऐसा हुआ कि जब वे अपने-अपने बोरे खाली कर रहे थे तो क्या देखा कि प्रत्येक जन के रुपये की थैली उसी के बोरे में रखी है; और जब उन्होंने और उनके पिता ने रुपयों की थैलियां देखीं तो वे अत्यन्त डर गए।
36और उनके पिता याकूब ने उनसे कहा, “तुमने मेरे बच्चों से वंचित कर दियाः यूसुफ नहीं रहा, और शमौन भी नहीं रहा, और अब तुम बिन्यामीन को भी ले जाओगे। ये सब विपत्तियां मुझ पर आ पड़ी है।”
37तब रूबेन ने अपने पिता से यह कहा, “यदि मैं उसे तेरे पास वापस लौटा न ले आऊं तो तू मेरे दोनों पुत्रों को मार डालना। उसे मेरे हाथ में सौंप दे और मैं उसे फिर तुझे लौटा दूंगा।”
38परन्तु याकूब ने कहा, “मेरा पुत्र तुम्हारे साथ न जाएगा, क्योंकि उसका भाई मर गया है, और अब वह अकेला ही बचा है। यदि तुम्हारी यात्रा में उस पर कोई विपत्ति आ पड़े, तब तो तुम मुझ पके बाल वाले को शोक के साथ अधोलोक में उतार दोगे।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)