पुराना नियम · उत्पत्ति · अध्याय 45 / 50
उत्पत्ति 45
1यूसुफ उन सब लोगों के सामने जो उसके आसपास खड़े थे अपने आप को रोक न सका, तब उसने चिल्लाकर कहा, “मेरे पास से सब लोगों को बाहर कर दो।” इसलिए जब यूसुफ ने स्वयं को अपने भाइयों पर प्रकट किया तब उसके साथ कोई न था।
2तब वह इतनी जोर से चिल्ला-चिल्लाकर रोया कि मिस्रियों ने इसे सुना और फि़रौन के घर के लोगों ने भी इसके बारे में सुना।
3तब युसूफ ने अपने भाइयों से कहा, “मैं यूसुफ हूं! क्या मेरा पिता अब तक जीवित है?” परन्तु उसके भाई उसे उत्तर न दे सके क्योंकि वे उसकी उपस्थिति से घबरा गए थे।
4तब यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा, “मेरे निकट आओ।” वे उसके निकट पहुंचे। तब उसने उनसे कहा, “मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूं जिसको तुमने मिस्र आने वालों के हाथ बेच दिया था।
5अब व्याकुल या अपने आपसे क्रोधित मत होओ कि तुमने मुझे यहां आने वालों के हाथों बेच दिया। क्योंकि परमेश्वर ने प्राणों की रक्षा के लिए तुमसे पहले मुझे यहां भेजा था।
6क्योंकि दो वर्ष से इस देश में अकाल है और पांच वर्ष तक ऐसा ही रहेगा जिसमें न तो हल चलेगा और न फसल काटी जाएगी।
7परमेश्वर ने मुझेे तुमसे पहले भेजा कि पृथ्वी पर तुम्हारे वंश की रक्षा की जाए और महान् छुटकारा देकर तुम्हें जीवित रखे।
8इसलिए अब मुझ को यहां भेजने वाले तुम नहीं परन्तु परमेश्वर है और उसी ने मुझे फि़रौन के लिए पिता के समान और उसके घर का स्वामी तथा सारे मिस्र देश का शासक ठहरा दिया है।
9शीघ्र उठकर मेरे पिता के पास जाओ और उससे कहो, ‘तेरा पुत्र यूसुफ यह कहता है, कि परमेश्वर ने मुझे सारे मिस्र पर स्वामी ठहरा दिया है। शीघ्र उठकर मेरे पास चला आ।
10तू अपने बेटों, नाती-पोतों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों और अपने सब कुछ समेत गोशेन देश में मेरे निकट रहेगा।
11और मैं तुझे आवश्यकता की सब वस्तुएं दूंगा, क्योंकि अकाल के पांच वर्ष अब भी शेष हैं, ऐसा न हो कि कहीं तू और तेरा घराना वरन् जितने तेरे हैं सब भूखे मरे।’
12और तुम्हारी आंखें देखती हैं और मेरा भाई बिन्यामीन भी अपनी आंखों से देखता है कि मैं ही तुमसे बातें कर रहा हू।
13तुम मेरे सब वैभव का जो मिस्र में है और वह सब जो तुमने देखा है मेरे पिता से वर्णन करना और मेरे पिता को तुरन्त यहां ले जाना।”
14तब वह बिन्यामीन के गले से लिपटकर रोया और बिन्यामीन भी उसके गले से लिपटकर रोया।
15फिर वह अपने भाइयों को चूमकर रोया तब उसके भाई उससे बातें करने लगे।
16जब इस बात का समाचार फि़रौन के भवन तक पहुंचा कि यूसुफ के भाई आए हैं तो इससे फि़रौन और उसके कर्मचारी आनन्दित हुए।
17तब फि़रौन ने यूसुफ से कहा, “अपने भाइयों से कह कि एक काम करोः अपने पशुओं को लाद कर कनान में चले जाओ।
18और अपने पिता और अपने-अपने घर के लोगों को लेकर मेरे पास आओ और मैं तुझे मिस्र देश की सबसे अच्छी भूमि दूंगा और तुम देश के उत्तम से उत्तम पदार्थ खाओगे।
19अब तुम्हारे लिए यह आज्ञा है, कि मिस्र देश से अपने बाल-बच्चों और स्त्रियों के लिए गाड़ियां ले जाओ और अपने पिता को ले आओ।
20और अपने सामान की चिन्ता मत करना क्योंकि मिस्र देश की अच्छी से अच्छी भूमि तुम्हारी है।”
21तब इस्राइल के पुत्रों ने ऐसा ही किया, और यूसुफ ने फि़रौन की आज्ञा के अनुसार उन्हें गाड़ियां दीं और यात्रा के लिए भोजन-सामग्री दी।
22उनमें से हर एक को उसने एक-एक जोड़ा वस्त्र दिया परन्तु बिन्यामीन को उसने चांदी के तीन सौ टुकड़े और पांच जोड़े वस्त्र दिए।
23और अपने पिता के पास उसने यह भेजा अर्थात् मिस्र की सबसे अच्छी वस्तुओं से लदे दस गदहे, और अन्न तथा रोटी और अपने पिता के मार्ग के लिए भोजन वस्तु से लदी हुई दस गदहिया।
24इस प्रकार उसने अपने भाइयों को विदा किया और जब वे जाने लगे तो उसने उनसे कहा, “मार्ग में कहीं झगड़ा न करना।”
25तब वे मिस्र से चलकर कनान देश में अपने पिता याकूब के पास पहुंचे।
26और उन्होंने उससे यह कहा, “यूसुफ अब तक जीवित है और सचमुच वही सम्पूर्ण मिस्र देश पर प्रभुता करता है।” परन्तु वह स्तम्भित रह गया क्योंकि उसने उनकी बात पर विश्वास न किया।
27जब उन्होंने अपने पिता से यूसुफ की वे सब बातें बताईं जो उसने उनसे कही थीं और जब उसने उन गाड़ियों को देखा जिन्हें यूसुफ ने उसके ले आने के लिए भेजी थीं तब उनके पिता याकूब को चैन मिला।
28तब इस्राएल ने कहा, “यही बहुत है, मेरा पुत्र यूसुफ अब तक जीवित है। मैं अपनी मृत्यु से पहले जाकर उसे देखूंगा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)