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पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 31 / 66

यशायाह 31

1हाय उन पर जो सहायता पाने के लिए मिस्र को जाते, तथा घोड़ों पर निर्भर रहते हैं, जो रथों की बड़ी संख्या तथा घुड़सवारों की बड़ी शक्ति पर भरोसा रखते हैं, पर न तो इस्राएल के पवित्र की ओर दृष्टि करते और न ही यहोवा की खोज करते हैं!

2फिर भी वह बुद्धिमान है और घोर संकट ले आएगा, वह अपने वचन से नहीं मुकरेगा, परन्तु कुकर्मियों के घराने तथा अधर्मियों के सहयोगियों के विरुद्ध उठेगा।

3मिस्री तो मनुष्य ही हैं, परमेश्वर नहीं और उनके घोड़े मांस ही हैं, आत्मा नही। अतः यहोवा अपना हाथ उठाएगा, और सहायता करने वाले ठोकर खाएंगे और सहायता पाने वाले गिरेंगे, और वे सबके सब एक साथ नष्ट हो जाएंगे।

4क्योंकि यहोवा ने मुझसे यों कहा, “जिस प्रकार सिंह या जवान सिंह अपने शिकार पर गुर्राते समय अपने विरुद्ध चरवाहों के दल के बुलाए जाने पर भी उनकी ललकार से न तो आतंकित और न ही उनके शोरगुल से प्रभावित होता है, उसी प्रकार सेनाओं का यहोवा सिय्योन पर्वत और उसके शिखर पर युद्ध करने को उतरेगा।

5मंडराते हुए पक्षियों के समान सेनाओं का यहोवा यरूशलेम की रक्षा करेगा। वह उसकी रक्षा करके उसे छुड़ाएगा। वह लांघकर उसका उद्धार करेगा।” यहोवा पर भरोसा रखने का आग्रह

6हे इस्राएलियो, जिसके विरुद्ध तुमने भारी विद्रोह किया उसी की ओर लौट आओ।

7सोने-चांदी की जिन मूर्तियों को तुमने अपने हाथों से बनाकर पाप किया है उन्हें उस दिन तुम में से प्रत्येक व्यक्ति निकाल फेंकेगा।

8“तब अश्शूर उस तलवार से जो मनुष्य की नहीं, गिराया जाएगा। वह उस तलवार का कौर हो जाएगा जो मनुष्य की नही। अतः वह उस तलवार से न बचेगा, और उसके जवानों से बेगारी कराई जाएगी।

9आतंक से उसका गढ़ जाता रहेगा, और युद्ध-पताका देखकर उसके प्रधान भयभीत हो उठेंगे।” यह उसी यहोवा की वाणी है जिसकी अग्नि सिय्योन में और जिसका भट्ठा यरूशलेम में है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)