Loading account

पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 33 / 66

यशायाह 33

1हे नाश करने वाले, तू जो नष्ट नहीं किया गया, और हे, विश्वासघाती, जिसके साथ अन्य लोगों ने विश्वासघात नहीं किया, तुझ पर हाय! जैसे ही तू विनाश करना बन्द कर देगा, तू भी नष्ट किया जाएगा। जैसे ही तू विश्वासघात कर चुकेगा, अन्य लोग तेरे साथ विश्वासघात करेंगे।

2हे यहोवा, हम पर अनुग्रह कर, हम तेरी ही बाट जोहते आए है। नित्य प्रातः तू हमारा बल, तथा संकट में हमारा उद्धार ठहर।

3हुल्लड़ सुनते ही देश-देश के लोग भाग खड़े हुए, तेरे उठते ही जातियां तितर-बितर हो गईं।

4जैसे इल्ली खा जाती हैं, वैसे ही तुम्हारी लूट भी खाई जाएगी। उस पर लोग टिड्डियों के समान टूट पडें़गे।

5यहोवा सर्वोच्च है, वह तो ऊंचे पर विराजमान है। उसने सिय्योन को न्याय और धार्मिकता से भर दिया है।

6वह तेरे जीवनकाल का आधार होगा तथा उद्धार, बुद्धि और ज्ञान का खजाना होगा। यहोवा का भय उसका धन होगा।

7देखो, उनके शूरवीर सड़कों पर चिल्ला रहे हैं, सन्धि के राजदूत बिलख-बिलख कर रो रहे है।

8राजमार्ग सुनसान है, कोई यात्री न रहा। वाचा तोड़ दी गई, नगरों को तुच्छ जाना गया, और किसी मनुष्य के लिए सम्मान न रहा।

9भूमि विलाप करते-करते झुलस गई है, लेबनोन लज्जित होकर मुर्झा गया है, शारोन मरुस्थल के सदृश हो गया है, तथा बाशान और कर्मेल की हरियाली जाती रही।

10यहोवा कहता है, “अब मैं उठूंगा, मैं अपना प्रताप दिखाऊंगा, मैं सर्वोच्च ठहरूंगा।

11तुम्हारे गर्भ में भूसा ही है, तुम खूंटी उत्पन्न करोगे। मेरा श्वास तुम्हें आग के समान भस्म करेगा।

12और देश-देश के लोग भस्म होकर चूना बन जाएंगे, वे आग में झोंक दी जाने वाली कँटीली झाड़ी के समान हो जाएंगे।

13“तुम जो दूर हो, सुनो कि मैंने क्या किया है; और तुम जो निकट हो मेरे सामर्थ्य को जान लो।”

14सिय्योन में पापी भयभीत हैं; भक्तिहीनों को थरथराहट ने आ दबोचा हैः “हम में से कौन भस्म करने वाली अग्नि के सामने ठहर सकता है? हम में से कौन अनन्त आग के सामने जीवित रह सकता है?”

15वह जो धार्मिकता से चलता और सीधी बातें बोलता, जो अन्धेर के लाभ से घृणा करता, तथा घूस थामने से अपने हाथ झटक देता, जो हत्या की बातें सुनने से कान फेर लेता तथा बुराई देखने से अपनी आंखें बन्द कर लेता है,

16वह ऊंचे स्थानों पर वास करेगा, अटल चट्टान उसका शरणस्थान होगा, उसको उसकी रोटी मिलती रहेगी, और उसे पानी की घटी कभी न होगी।

17तेरी आंखें राजा की शोभा को निहारेंगी, वे एक विस्तृत देश पर दृष्टि करेंगी।

18वह आतंक ही तुम्हारे विचारों का केन्द्र होगाः “कहां रहा गिनती करने वाला? कहां रहा वह तोलने वाला? कहां रहा बुर्जों को गिनने वाला?”

19आगे को तू क्रूर जाति को न देखेगा, अर्थात् इन लोगों को जिनकी बोली में लड़खड़ाहट है जिससे वह स्पष्ट सुनाई नहीं देती और िजनकी भाषा में हकलाहट है जिससे वह समझ में नहीं आती।

20हमारे नियत पर्वों के नगर सिय्योन पर दृष्टि कर, तू अपनी आंखों से यरूशलेम को देखेगाः वह तो सुरक्षित निवास और ऐसा तम्बू होगा जो कभी न गिराया जाएगा, जिसका न तो कोई खूंटा उखाड़ा जाएगा और न ही कोई रस्सी कभी तोड़ी जाएगी।

21वहां वह महाप्रतापी अर्थात् यहोवा हमारे लिए नदियों और चौड़ी नहरों का ऐसा स्थान होगा, जिस पर न तो कोई नाव चप्पू से चलेगी और न ही कोई विशाल जलयान पार होगा-

22क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा व्यवस्था देनेवाला और यहोवा हमारा राजा है; वही हमारा उद्धार करेगा-

23तेरे रस्से ढीले हो गएः वे अपने मस्तूल के आधार को सम्भाल न सके न ही पाल को फैला सके। तब छीनी हुई बड़ी लूट बांटी जाएगी, लंगड़े भी लूट को ले लेंगे।

24कोई निवासी यह न कहेगा कि मैं बीमार हू। जो लोग वहां बसेंगे, उनका अधर्म क्षमा किया जाएगा।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)