Loading account

पुराना नियम · यशायाह · अध्याय 44 / 66

यशायाह 44

1“परन्तु अब, हे मेरे दास याकूब, हे इस्राएल जिसे मैंने चुना है, सुनः

2तेरा कर्त्ता यहोवा, जिसने तुझे गर्भ ही से रचा है और जो तेरी सहायता करेगा, वह यों कहता हैः हे मेरे दास याकूब, हे यशूरून जिसे मैंने चुना है, भयभीत न हो।

3क्योंकि मैं प्यासी भूमि पर जल उंडेलूंगा तथा सूखी भूमि पर धाराएं बहाऊंगा। मैं तेरे वंश पर अपना आत्मा और तेरे वंशजों पर अपनी आशीष उंडेलूंगा।

4वे घास के मध्य ऐसे बढ़ेंगे जैसे धाराओं के पास मजनू।

5कोई कहेगा, ‘मैं यहोवा का हूं,’ और कोई याकूब के नाम का कहलाएगा। कोई अपने हाथ पर लिखेगा, ‘मैं यहोवा का हूं,’ और गर्व से अपना नाम इस्राएली बताएगा।”

6यहोवा जो इस्राएल का राजा तथा उसका छुड़ाने वाला है, हां, सेनाओं का यहोवा यों कहता हैः “मैं ही प्रथम और मैं ही अन्तिम हूं, मुझे छोड़ अन्य कोई परमेश्वर नही।

7मेरे समान कौन है? वह इसे बताए और प्रकट करे, हां, मैंने प्राचीनकाल की जाति को जब से ठहराया तब से लेकर आज तक उसका क्रमानुसार वर्णन वह मुझसे करे। आने वाली बातें प्रकट की जाएं और उन घटनाओं का वर्णन किया जाए जो होने वाली है।

8थरथराओ मत, न ही भयभीत होओ। क्या मैंने प्राचीनकाल से ही ये बातें तुम्हें नहीं सुनाईं और तुम पर प्रकट नहीं कीं? तुम मेरे साक्षी हो। क्या मुझे छोड़ कोई और परमेश्वर या कोई और चट्टान है? मैं तो किसी और को नहीं जानता।”

9जो गढ़कर मूर्ति बनाते हैं वे सब-के-सब निरर्थक हैं, उनकी पूज्य वस्तुएं कुछ लाभ की नहीं, यहां तक कि जो उनके पक्षधर हैं वे भी न तो कुछ देखते और न कुछ जानते हैं, इसलिए उन्हें लज्जित होना पड़ेगा।

10किसने देवता को बनाकर या मूर्ति ढालकर व्यर्थ कार्य किया है?

11देख, उसके सब साथियों को लज्जित होना पड़ेगा, क्योंकि शिल्पी निरे मनुष्य ही तो है। वे सब इकट्ठे हों, वे खड़े हों, वे थरथराएं और लज्जित हो।

12एक मनुष्य अंगारों पर काटने वाला हथियार बनाता और हथौड़ों से गढ़ता है, वह अपनी बलवान भुजाओं से काम करता है। वह भूखा भी हो जाता और उसका बल घट जाता है। वह पानी नहीं पीता और थक कर चूर हो जाता है।

13दूसरा मनुष्य लकड़ी की मूर्ति बनाता है। वह सूत से उस पर लाल चिह्न लगाता है। वह उस पर रन्दा चलाता है और परकार से रेखाएं खींचकर उसे मनुष्य का रूप देता है-और इसे मनुष्य की-सी सुन्दरता प्रदान करता है जिससे कि यह घर में स्थापित की जा सके।

14हां, वह अपने लिए देवदार काटता, और वन के वृक्षों में से वह अपने लिए सनौवर या बांज का एक वृक्ष चुनकर उसकी देख-भाल करता है। वह चीड़ का पौधा उगाता है जो वर्षा का जल पाकर बढ़ता है।

15तब मनुष्य के लिए यह ईंधन के काम आता है। वह उसमें से कुछ सुलगाकर आग तापता है और उसको जलाकर रोटी पकाता है। फिर कुछ से वह देवता भी बनाकर उसकी उपासना करता है। वह उससे गढ़कर मूर्ति बनाता और उसी को दण्डवत् करता है।

16उसका आधा भाग तो वह आग में जलाता और उसी भाग से मांस भूनकर खाता और तृप्त होता है। फिर आग तापकर कहता है, “अहा! गर्मी मिली, मैंने आग देखी है!

17शेष भाग से वह एक देवता अर्थात् एक खुदी हुई मूर्ति बनाता है। वह उसको दण्डवत् करके उसकी उपासना करता है। वह उससे विनती करके कहता है, “मुझे बचा ले, क्योंकि तू ही मेरा ईश्वर है!”

18वे न तो जानते हैं और न ही कुछ समझते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उनकी आंखें बन्द कर दी हैं जिससे कि वे देख न सकें, और उनके मन भी ऐसे कर दिए हैं कि वे समझ न सके।

19कोई इस पर ध्यान नहीं देता, न ही उनका ज्ञान और समझ इतनी है कि वे कह सकें, “उसका एक भाग तो मैंने जला दिया और उसके अंगारों पर रोटी पकाई है। मैंने मांस भूनकर खाया है। तब क्या मैं उसके आधे बचे भाग से घिनौनी वस्तु बनाऊं? क्या मैं लकड़ी के टुकड़े को दण्डवत् करूं?”

20वह राख से पेट भरता है। छली हृदय ने उसे भटका दिया है। वह न तो अपने आप को बचा सकता है और नही यह कह सकता है, “मेरे दाहिने हाथ में जो है क्या वह मिथ्या नहीं?”

21“हे याकूब, इन बातों को स्मरण रख। हे इस्राएल, तू तो मेरा दास है। मैंने तुझे बनाया है, तू मेरा दास है। हे इस्राएल, मैं तुझे नहीं भूलूंगा।

22मैंने काली घटा के समान तेरे अपराधों को और घने कोहरे के समान तेरे पापों को मिटा दिया है। मेरी ओर लौट आ, क्योंकि मैंने तुझे छुड़ा लिया है।”

23हे स्वर्गो, ऊंचे स्वर से आनन्द मनाओ, क्योंकि यहोवा ने यह किया है! हे पृथ्वी के निचले स्थानो, जय जयकार करो। हे पर्वतो, हे वन और उसमें के प्रत्येक वृक्ष, तुम सब गला खोलकर आनन्द मनाओ, क्योंकि यहोवा ने याकूब को छुड़ा लिया है, वह इस्राएल में अपनी महिमा प्रकट करता है।

24तेरा छुड़ाने वाला यहोवा जिसने तुझे गर्भ से ही रचा, वह यों कहता हैः “मैं यहोवा ही सबका सृजनहार हूँ। मैंने ही आकाश को ताना है और अकेले ही पृथ्वी को फैलाया है।

25मैं झूठों के चिह्नों को व्यर्थ कर देता, और भविष्य बताने वालों को मूर्ख ठहराता हूँ। मैं बुद्धिमानों को पीछे हटा देता और उनके ज्ञान को मूर्खता में बदल देता हू।

26मैं अपने दास के वचन को पूरा करता और अपने सन्देश वाहकों के कार्य को सफल करता हू। मैं ही हूँ जो यरूशलेम के विषय में कहता हूं, ‘वह पुनः बसाई जाएगी!’ और यहूदा के नगरों के विषय में, ‘उनका पुनर्निर्माण होगा।’ और मैं उसके खंडहरों को फिर खड़ा कर दूंगा।

27मैं ही हूँ जो गहरे सागर से कहता हूँ, ‘सूख जा!’ और मैं तेरी नदियों को सुखा दूंगा।

28मैं ही हूँ जो कुस्रू के विषय में कहता हूँ, ‘वह मेरा चरवाहा है, वह मेरी ही इच्छा पूरी करेगा,’ और यरूशलेम के विषय में घोषणा करता हूँ, ‘वह बसाई जाएगी,’ और मन्दिर के विषय में, ‘तेरी नीवँ डाली जाएगी।’

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)