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नया नियम · याकूब · अध्याय 3 / 5

याकूब 3

1हे मेरे भाइयो, तुम में से बहुत शिक्षक न बनें, यह जानते हुए कि हम शिक्षक और भी कठोरतम दण्ड के भागी होंगे।

2क्योंकि हम सब कई बातों में चूक जाते है। जो अपनी बातों में नहीं चूकता, वही सिद्ध मनुष्य है और सारी देह पर भी नियंत्रण रख सकता है।

3यदि हम अपने वश में करने के लिए घोड़ों के मुंह में लगाम लगाएं तो हम उनके सारे शरीर को भी नियंत्रण में रख सकते है।

4देखो, जहाज़ भी यघपि इतने बड़े हाते हैं और तीव्र वायु द्वारा चलाए जाते हैं, फिर भी एक छोटी सी पतवार द्वारा नाविक के इच्छानुसार संचालित किए जाते है।

5वैसे ही जीभ भी, यघपि शरीर का एक छोटा सा अंग है, फिर भी बड़ी-बड़ी डींगे मारती है। देखो एक छोटी सी चिनगारी कितने बड़े वन में आग लगा देती है!

6और जीभ भी एक अग्नि अर्थात् अधर्म का एक लोक है। हमारे अंगों में स्थित यह जीभ सारे शरीर को कलंकित करती और हमारे जीवन की गति में आग लगा देती है, और नरक की अग्नि में जलती रहती है।

7क्योंकि प्रत्येक जाति के पशु-पक्षी, रेंगने वाले जन्तु, और समुद्री जीव पाले जा सकते हैं तथा मानव जाति द्वारा वश में किए गए हैं,

8पर जीभ को कोई भी वश में नहीं कर सकता। यह एक ऐसी बुराई है जो कभी शान्त नहीं रहती तथा प्राण-नाशक विज से भरी है।

9इसी से हम अपने प्रभु और पिता की प्रशंसा करते हैं, और इसी से हम मनुष्यों को शाप देते हैं, जो परमेश्वर की समानता में बनाए गए है।

10एक ही मुंह से आशीर्वाद और शाप दोनों ही निकलते है। हे मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए।

11क्या सोते के एक मुंह से मीठा और खारा जल दोनों ही निकलते हैं?

12हे मेरे भाइयो, क्या अंजीर के वृक्ष में जैतून, या अंगूर की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा जल नहीं निकल सकता।

13तुम में ज्ञानवान और समझदार कौन है? जो ऐसा हो वह अपने कार्यों को अच्छे चालचलन से उस नम्रता सहित प्रकट करे जो ज्ञान से उत्पन्न होती है।

14परन्तु यदि तुम्हारे हृदय में कटु ईर्ष्या और स्वार्थी आकांक्षा हो तो गर्व न करना, और न सत्य के विरोध में झूठ ही बोलना।

15यह तो वह ज्ञान नहीं जो ऊपर से उतरता है, वरन् सांसारिक, स्वाभाविक और शैतानी है।

16क्योंकि जहां डाह और स्वार्थी आकांक्षा होती है, वहां बखेड़ा तथा हर प्रकार की बुराई भी होती है।

17पर जो ज्ञान ऊपर से आता है, वह पहिले तो पवित्र होता है, फिर मिलनसार, कोमल, विचारशील, करुणामय और अच्छे फलों से लदा हुआ, स्थिर और कपट-रहित होता है।

18मेल-मिलाप कराने वाले उस बीज को जिसका फल धार्मिकता है मेल के साथ बोते है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)