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नया नियम · याकूब · अध्याय 4 / 5

याकूब 4

1तुम्हारे बीच होने वाले लड़ाइयों और झगड़ों का कारण क्या है? क्या इनका कारण वे भोग-विलास नहीं जो तुम्हारे अंगों में परस्पर लड़ाई करते रहते हैं?

2तुम लालसा तो करतेे हो, पर पाते नहीं-इसलिए हत्या करते हो। तुम डाह करते हो, और जब प्राप्त करने में असमर्थ होते हो तो लड़ते झगड़ते हो। तुम्हें इसलिए नहीं मिलता कि तुम मांगते नही।

3तुम मांगते तो हो पर पाते नहीं, क्योंकि बुरे उद्देशय से मांगते हो, कि अपने भोग-विलास में उड़ा दो।

4हे व्यभिचारिणियों, क्या तुम नहीं जानतीं कि संसार में मित्रता करना परमेश्वर से शत्रुता करनी है? अतः यदि कोई संसार से मित्रता रखना चाहता है तो वह अपने आप को परमेश्वर का शत्रु बनाता है।

5या तुम सोचते हो कि पवित्रशास्त्र व्यर्थ ही यह कहता हैः “उस आत्मा को जिसे परमेश्वर ने हमारे भीतर निवास करने के लिए बनाया है, क्या वह उसकी बड़ी ईर्ष्या से कामना नहीं करता?”

6वरन् वह और भी अधिक अनुग्रह देता है। इसलिए कहता है, “परमेश्वर घमण्डियों का विरोध करता पर दीन लोगों पर अनुग्रह करता है।”

7इसलिए परमेश्वर के अधीन हो जाओ। शैतान का सामना करो तो वह तुम्हारे पास से भाग जाएगा।

8परमेश्वर के निकट आओ तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा। हे पापियो, अपने हाथ शुद्ध करो। और हे दुचित्तो, अपने हृदयों को पवित्र करो।

9शोकित होओ, विलाप करो और रोओ। तुम्हारी हंसी आंसुओं में, और तुम्हारा हर्ष, विषाद में बदल जाए।

10प्रभु के सामने दीन बनो तो वह तुम्हें प्रतिज्ठित करेगा।

11हे भाइयो, एक दूसरे के विरोध में न बोलो। जो अपने भाई के विरुद्ध बोलता या उस पर दोष लगाता है, वह व्यवस्था के विरुद्ध बोलता है और व्यवस्था पर दोष लगाता है। पर यदि तुम व्यवस्था पर दोष लगाते हो तो तुम उस पर चलने वाले नहीं वरन् उसके न्यायी ठहरे।

12व्यवस्था का देने वाला और न्यायी तो एक ही है, जो बचाने अथवा नाश करने का सामर्थ्य रखता है। पर तुम कौन होते हो जो अपने पड़ोसी पर दोष लगाते हो?

13सुनो, तुम जो यह कहते हो, ‘आओ, हम आज या कल अमुक नगर में जाकर वहां एक वर्ष बिताएंगे और व्यापार करके लाभ उठाएंगे,

14फिर भी यह नहीं जानते कि कल तुम्हारे जीवन का क्या होगा। तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर तक दिखाई देती और फिर अदृशय हो जाती है।

15पर इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, ‘यदि प्रभु की इच्छा हो तो हम जीवित रहेंगे और यह अथवा वह काम भी करेंगे।

16पर अब तुम अपनी धृष्टता पर डींग मारते हो, और ऐसी डींगे मारना बुरा है।

17इसलिए जो कोई उचित काम करना जानता है और नहीं करता, उसके लिए यह पाप है।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)