पुराना नियम · यिर्मयाह · अध्याय 5 / 52
यिर्मयाह 5
1“यरूशलेम की गलियों में इधर-उधर जाकर देखो और ध्यान दो और उसके चौकों में ढूंढोः यदि तुम एक भी ऐसा मनुष्य पा सको जो न्याय से कार्य करता हो और सच्चाई की खोज करता हो तो मैं उसे क्षमा कर दूंगा।
2यघपि वे ‘यहोवा के जीवन’ की शपथ खाते हैं, निश्चय, वे झूठी शपथ खाते है।”
3हे यहोवा, क्या तेरी आंखें सच्चाई को नहीं खोजती? तूने उन्हें मारा पर वे शोकित न हुए, तूने उन्हें नष्ट किया परन्तु उन्होंने ताड़ना को भी अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपना मुख चट्टान से भी कठोर बना लिया और पश्चात्ताप करने से इनकार कर दिया है।
4तब मैंने कहा, “वे तो कंगाल हैं, मूर्ख हैं, क्योंकि वे यहोवा का मार्ग अथवा अपने परमेश्वर की विधियों को नहीं जानते।
5मैं अधिकारियों के पास जाऊंगा और उनको सुनाऊंगा, क्योंकि वे यहोवा का मार्ग और अपने परमेश्वर की विधियों को जानते है।” परन्तु उन्होंने भी एका करके जूआ तोड़ डाला है और बन्धनों को खोल दिया है।
6इस कारण जंगल से एक सिंह आकर उन्हें मार डालेगा, निर्जन स्थान से भेड़िया आकर उनका विनाश करेगा, और एक चीता उनके नगरों पर घात लगाएगा। प्रत्येक जो बाहर निकलेगा उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे, क्योंकि उनके अपराध बहुत हैं, उनके विधर्म अनगिनत है।
7“मैं तुझे क्यों क्षमा करूं? तेरे बेटों ने मुझे त्याग दिया है और जो परमेश्वर नहीं उनकी शपथ खाई है। जब मैंने उन्हें पेट भर खिलाया तब उन्होंने व्यभिचार किया और वेश्या के घर पर भीड़ लगाई।
8वे खा-खा कर अघाए हुए कामुक घोड़ों के समान हैं, उनमें से प्रत्येक अपने पड़ोसी की पत्नी पर हिनहिनाता है।
9क्या मैं ऐसे लोगों को दण्ड न दूं और ऐसी जाति से अपना पलटा न लूं?” यहोवा की यही वाणी है।
10“उसके दाख की कतारों से होकर जाओ और उन्हें नष्ट करो, परन्तु पूर्णतः नष्ट न करो। उसकी डालियों को तोड़ कर फेंक दो, क्योंकि वे यहोवा की नहीं है।
11क्योंकि इस्राएल के घराने और यहूदा के घराने ने मेरे साथ बड़ा विश्वासघात किया है,” यहोवा की यही वाणी है।
12“उन्होंने यहोवा की बातों को झुठलाकर कहा है, ‘वह है ही नही। हम पर विपत्ति नहीं पड़ेगी, न हम तलवार अथवा अकाल को देखेंगे।
13नबी तो वायु के समान हैं, उनमें वचन नहीं है। उनके साथ ऐसा ही किया जाएगा।’”
14इसलिए यहोवा सेनाओं का परमेश्वर यों कहता हैः “क्योंकि तूने यह वचन कहा है, देख, मैं अपने वचन को तेरे मुंह में आग और इस प्रजा को काठ बनाऊंगा, और वह उनको भस्म करेगी।
15हे इस्राएल के घराने, देख, मैं बहुत दूर से तेरे विरफ़द्ध एक जाति को ला रहा हूं, यह सहनशील जाति है और प्राचीन है, ऐसी जाति है जिसकी भाषा तू नहीं जानता, वे जो कुछ कहते हैं उसे तू समझ नहीं सकता,” यहोवा की यह वाणी है।
16“उनके तर्कश खुली कब्र के समान हैं, वे सब शूरवीर है।
17और वे तुम्हारे पके खेतों को और भोजन वस्तुओं को चट कर जाएंगे, तुम्हारे बेटे-बेटियों को निगल लेंगे, तुम्हारे भेड़-बकरियों तथा गाय-बैलों को निगल जाएंगे, तुम्हारे दाखों और अंजीरों को खा जाएंगे; और अपनी तलवारों से तुम्हारे गढ़वाले नगरों को जिन पर तुम भरोसा रखते हो मिट्टी में मिला देंगे।”
18यहोवा की यह वाणी हैः “फिर भी उन दिनों मैं तुम्हारा पूर्णतः अन्त नहीं करूंगा।
19और ऐसा होगा कि वे कहने लगेंगे, ‘हमारे परमेश्वर यहोवा ने यह सब हमारे साथ क्यों किया’ तब तू उनसे कहना, ‘जैसे तुमने मुझे त्याग कर अपने ही देश में दूसरे देवताओं की सेवा की है, वैसे ही तुम भी उस देश में जो तुम्हारा नहीं परदेशियों की सेवा करोगे।’
20“याकूब के घराने में यह सुनाओ और यहूदा के घराने में यह प्रचार करके कहो,
21‘हे मूर्ख और निर्बुद्धि लोगो, तुम जो आंखें रखते तो हो पर देखते नहीं, कान रखते हो पर सुनते नहीं, यह सुनो।
22क्या तुम मेरा भय नहीं मानते?’ यहोवा की वाणी है। ‘क्या तुम मेरी उपस्थिति में थरथराते नहीं? क्योंकि मैंने बालू को समुद्र की सीमा-एक अनन्त आदेश ठहराया है कि समुद्र उसे पार न कर सके। यघपि लहरें उनसे टकराएं, फिर वे प्रबल नहीं हो सकतीं; यघपि वे गरजें, फिर भी उसे पार नहीं कर सकती।
23परन्तु इस प्रजा का हृदय विद्रोही और हठीला है। मुंह फेर कर वे दूर हो गए है।
24वे अपने हृदय में यह नहीं कहते, “आओ, हम परमेश्वर यहोवा की ओर फिरें जो मौसम के अनुसार वर्षा देता है अर्थात् शरद और वसन्त की वर्षा, जो हमारे लिए कटनी के नियुक्त सप्ताह निर्धारित करता है।”
25तुम्हारे अधर्मों ने ही इनको भगा दिया है और तुम्हारे पापों ने भलाई को तुमसे दूर कर दिया है।
26मेरी प्रजा में दुष्ट लोग पाए जाते है। वे चिड़ीमार के समान ताक में रहते हैं, वे फन्दा लगाते हैं और मनुष्यों को फंसाते है।
27जिस प्रकार पिंजड़ा चिड़ियों से भरा रहता है उसी प्रकार उनके घर भी छल से भरे हुए हैं; इसी कारण वे महान् और धनी बन गए है।
28वे मोटे हो गए हैं और चिकने बन गए हैं, और दुष्टता के कामों में सीमा पार कर कुशल बन गए है। वे अनाथों के पक्ष में वकालत नहीं करते कि वे सम्पन्न होते, न वे कंगालों के अधिकार की रक्षा करते है।’
29इसलिए यहोवा की यह वाणी है, ‘क्या मैं इन लोगों को दण्ड न दूं? और ऐसी जाति से क्या मैं अपना पलटा न लूं?
30“देश में एक विस्मयकारी और घृणित कार्य हुआ हैः
31नबी झूठी नबूवत करते हैं, और याजक स्वयं अधिकारी बनकर अधिकार चलाते हैं; और मेरी प्रजा को यह सुहाता है! परन्तु अन्त में तुम क्या करोगे?
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)