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पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 21 / 42

अय्यूब 21

1तब अय्यूब ने उत्तर दिया,

2“मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम्हारी सांत्वना इसी प्रकार की हो।

3धैर्यपूर्वक मेरी सुन लो कि मैं भी बोल सकूं, और जब मैं बोल चुकूं तब ठट्ठा करना।

4क्या मेरी शिकायत किसी मनुष्य से है? फिर मैं अधीर क्यों न होऊं?

5मेरी ओर देखकर चकित हो, और अपने मुंह पर हाथ रख लो।

6स्मरण करने पर भी मैं घबरा जाता हूं, और मेरा शरीर थरथर कांपने लगता है।

7दुष्ट क्यों जीते रहते, वरन् दीर्घायु और अत्यन्त शक्तिशाली हो जाते हैं?

8उनके वशंज उनकी दृष्टि के सामने, और उनके बाल-बच्चे उनकी आंखों के सामने दृढ़ हो जाते है।

9उनके घर निर्भय रहते हैं, और परमेश्वर की छड़ी उन पर नहीं पड़ती है।

10उसका साँड़ गाभिन करता और चूकता नहीं, उसकी गाय ब्याती, और गर्भ नहीं गिराती।

11वे अपने लड़कों को झुंड के झुंड बाहर भेजते हैं; उनके बाल-बच्चे चारों ओर नाचते-फिरते है।

12वे डफ और वीणा की धुन पर गाते, और बांसुरी की धुन पर आनन्द मनाते है।

13वे अपने दिन सुख से बिताते, और एकाएक अधोलोक में उतर जाते है।

14वे परमेश्वर से कहते हैं, ‘हमारे पास से चला जा! हमें तेरे मार्गों के ज्ञान की इच्छा भी नहीं है।

15सर्वशक्तिमान कौन है कि हम उसकी सेवा करें, और यदि हम उससे विनती भी करें तो हमें क्या लाभ?’

16देखो, उनका कुशल उनके हाथ में नहीं है; दुष्टों का परामर्श मुझसे दूर रहे।

17कितनी बार दुष्टों का दीपक बुझ जाता है, या विपत्ति उन पर आ पड़ती है? क्या परमेश्वर अपने क्रोध में उनके लिए विनाश ठहराता है?

18क्या वे वायु से उड़ाए हुए भूसे, या आंधी से उड़ाई हुई भूसी के समान हैं?

19तुम कहते हो, ‘परमेश्वर मनुष्य के अधर्म का दंड उसके बाल-बच्चों के लिए रख छोड़ता है।’ वह उसका बदला उसी को दे कि वह जान सके।

20अपना विनाश वह स्वयं अपनी आंखों से देखे, और सर्वशक्तिमान के क्रोध में से स्वयं पीए।

21अपने बाद अपने घराने की उसे क्या चिन्ता, जबकि उसकी आयु के दिन काट दिए गए?

22क्या कोई परमेश्वर को ज्ञान सिखा सकता है? वह तो बड़ों-बड़ों का भी न्याय करता है।

23कोई तो अपने पूरे बल में बड़े सुख-चैन में रहकर मर जाता है।

24उसके शरीर पर चर्बी छाई रहती है, और उसकी हड्डियों का गूदा तर रहता है।

25और कोई अपने जी में कुढ़-कुढ़ कर, बिना सुख भोगे मर जाता है।

26वे एक साथ मिट्टी में मिल जाते हैं, और कीड़े उन्हें ढांप लेते है।

27“देखो, मैं तुम्हारे विचार जानता हूं, और उन युक्तियों को भी जिनसे तुम मेरी हानि करना चाहते हो।

28क्याेंकि तुम कहते हो, ‘रईस का घर कहां है, और दुष्टों के निवास कहां हैं?’

29क्या तुमने यात्राियों से नहीं पूछा, और उनके प्रमाणों को नहीं मानते?

30दुष्ट तो विपत्ति के दिन सुरक्षित रहता है, और प्रकोप के दिन बचाया जाता है।

31उसके मुंह पर कौन उसका सामना करेगा, और कौन उसे उसके कार्य का बदला देगा?

32जब वह कब्र को पहुंचाया जाएगा, तो उसकी कब्र पर पहरा बैठाया जाएगा।

33घाटी के ढेले उसको धीरे से ढांप लेंगे, फिर भी सब लोग उसके पीछे-पीछे, और अनगिनत लोग उसके आगे-आगे चले जाएंगे।

34तुम मुझे व्यर्थ शान्ति क्यों देते हो? तुम्हारे उत्तरों में झूठ ही झूठ पाए जाते है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)