पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 26 / 42
अय्यूब 26
1तब अय्यूब ने कहा,
2“वाह! निर्बल का तू कितना बड़ा सहायक है! शक्तिहीन भुजा को तूने कैसे सम्भाला है!
3निर्बुद्धि को तूने कैसी भली सम्मति दी है! उसे तूने कितनी लाभदायक सलाह दी है!
4तूने किसके लिए ये बातें कही हैं? किसकी आत्मा तेरे द्वारा प्रकट हुई है?
5“मृतकों की आत्माएं तथा गहरे तल के निवासी कांपते है।
6शओल परमेश्वर के सामने उघड़ा है और अबाद्दोन पर्दा रहित है।
7वह उत्तर दिशा को शून्य में फैलाता, और पृथ्वी को निराधार लटकाता है।
8जल को वह अपनी काली घटाओं में लपेट लेता है, और बादल उसके भार से फटता नही।
9वह पूर्ण चन्द्रमा के मुंह को ढांप देता है और अपने बादल को उसके ऊपर फैला देता है।
10प्रकाश और अन्धकार की सीमा के लिए उसने समुद्रों की सतह पर क्षितिज को ठहराया है।
11उसकी डांट से स्वर्ग के स्तम्भ कांपते, और चकित होते है।
12उसने अपनी सामर्थ्य से समुद्र को शान्त, और अपनी समझ के द्वारा रहब को टुकड़े-टुकड़े कर दिया।
13उसके श्वास से आकाश स्वच्छ हो जाता है, उसके हाथ ने फुर्तीले सर्प को छेद दिया है।
14देखो, ये तो उसके मार्गों के किनारे मात्र हैं हम तो केवल उसकी भनक ही सुन पाते है। फिर उसके सामर्थी गर्जन की थाह कौन पा सकहा है?”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)