पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 31 / 42
अय्यूब 31
1“मैंने अपनी आंखों से वाचा बांधी है; फिर मैं किसी कुंवारी पर क्यों आंखें लगाऊं!
2स्वर्ग से अर्थात् परमेश्वर की ओर से कौन सा भाग मिलता है, और ऊपर से, सर्वशक्तिमान् की ओर से कौन सी मीरास?
3क्या वह कुटिल मनुष्यों के लिए विपत्ति, तथा अधर्मियों के लिए सत्यानाश नहीं?
4क्या वह मेरे चाल-चलन को नहीं देखता, और मेरे पग-पग को नही गिनता?
5“यदि मैं छलपूर्वक चला हूं, और मेरे पैर धोखा देने के लिए दौड़े हों,
6तो परमेश्वर मुझे सच्चे तराजू पर तौले, वह मेरी खराई को जान ले।
7यदि मेरा कदम मार्ग से भटक गया हो, या मेरा मन मेरी आंखों के अनुसार चला हो, या मेरे हाथों पर कलंक लग गया हो,
8तो मैं बोऊं, और दूसरा खाए, और मेरी फसल उखाड़ ली जाए।
9यदि मेरा हृदय किसी स्त्री पर मोहित हो गया है, या मैं अपने पड़ोसी के द्वार पर घात में बैठा हूं,
10तो मेरी पत्नी दूसरे के लिए चक्की पीसे, और दूसरे उसे भ्रष्ट करे।
11क्योंकि यह तो महापाप होता, यह न्यायियों से दण्ड पाने योग्य अधर्म होता।
12यह तो ऐसी आग होती जो भस्म करके विनाश के घर पहुंचाती, यह मेरी सम्पूर्ण समृद्धि का समूल विनाश कर देती।
13“जब मेरे दास-दासियों ने मेरे विरुद्ध शिकायत की तब यदि मैंने उनकी अनसुनी की है,
14तो जब परमेश्वर उठेगा, मैं क्या कर सकूंगा? और जब वह मुझसे लेखा लेगा तब मैं क्या उत्तर दूंगा?
15जिसने मुझे गर्भ में बनाया क्या उसी ने उसको नहीं बनाया? क्या उसी ने हम दोनों को गर्भ में नहीं रचा?
16“यदि मैंने कंगालों की इच्छा पूरी न की हो, या मेरे कारण विधवा की आंखों में निराशा छा गई हो,
17या मैंने अपना निवाला अकेले खाया हो, और अनाथ उसमें से खाने न पाया हो,
18परन्तु वह तो मेरी जवानी से मेरे साथ ऐसे पला जैसे पिता के साथ, और मैं अपने बचपन से ही विधवा की देख-भाल करता आया हू।
19यदि मैंने किसी को कपड़े के अभाव से मरते देखा हो, या यह कि किसी दरिद्र के पास ओढ़ने को न था,
20और उसने मुझे हृदय से आशीर्वाद न दिया हो, वह मेरी भेड़ के ऊन से गरम नहीं हुआ हो,
21यदि मैंने नगर-द्वार पर अपने समर्थक देखकर, किसी अनाथ पर हाथ उठाया हो,
22तो मेरा कन्धा उखड़ जाए, और मेरी बांह कोहनी से टूट जाए।
23क्योंकि परमेश्वर से आई विपत्ति से मैं डरता हू। उसके प्रताप के कारण मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता।
24“यदि मैंने सोने पर भरोसा किया हो, और चोखे सोने को अपना आसरा मान लिया हो,
25या अपने धन की बहुतायत, और अपने हाथ की बड़ी कमाई में आनन्द लिया,
26या सूर्य की चमक और चन्द्रमा की भव्य चाल को देखकर
27और मन ही मन मुग्ध होकर तथा छिपकर उनको प्रणाम किया हो,
28तो वह भी न्यायी से दण्ड पाने के योग्य अधर्म का काम होता, क्योंकि तब मैंने स्वर्ग में विराजमान परमेश्वर का इनकार किया होता।
29“क्या मैंने अपने शत्रु के मिट जाने पर आनन्द मनाया, जब उस पर विपत्ति आ पड़ी तो क्या मैं हर्षित हुआ?
30नहीं, मैंने अपने मुंह से ऐसा पाप नहीं होने दिया, कि मैं शाप देकर उसकी मृत्यु मांगता।
31क्या मेरे डेरे के लोगों ने नहीं कहा है, ऐसा कौन है जो उसके यहां उत्तम भोजन से तृप्त न हुआ हो?
32किसी परदेशी को सड़क पर टिकना न पड़ा, क्योंकि किसी भी यात्री के लिए मेरा द्वार खुला रहा।
33क्या बड़ी भीड़ के डर के मारे मैंने अपने अधर्म को अपने मन में छिपाकर,आदम के सामन अपने अपराधों को ढांपा? या कुलों की घृणा से भयभीत होकर,मैं चुप्पी साधे रहा और द्वार से बाहर नहीं निकला?
34क्या बड़ी भीड़ के डर के मारे मैंने अपने अधर्म को अपने मन में छिपाकर, आदम के सामन अपने अपराधों को ढांपा? या कुलों की घृणा से भयभीत होकर, मैं चुप्पी साधे रहा और द्वार से बाहर नहीं निकला?
35काश, कि कोई मेरी सुनने वाला होता! लो, यह मेरा हस्ताक्षर है; सर्वशक्तिमान् ही मुझे उत्तर दे! तब जो अभियोग-पत्र मेरे विरोधी ने लिखा है,
36उसे मैं निश्चय अपने कांधे पर लिए फिरता और उसे मुकुट-सा धारण किए रहता।
37मैं उसे अपने पग-पग का लेखा देता, और शासक के समान उसके सामने जाता।
38“यदि मेरी भूमि मेरे विरुद्ध पुकार उठती हो, और उसकी रेघारियां मिलकर रोती हों;
39यदि मैंने उसकी उपज मूल्य चुकाए बिना खाई हो या उसके स्वामियों के प्राण लिए हों,
40तो गेहूं के बदले झाड़ी और जौ के बदले धतूरा उगे।” अय्यूब के वचन समाप्त हुए।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)