पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 33 / 42
अय्यूब 33
1“फिर भी हे अय्यूब, अब मेरी बातें सुन, और मेरे सब वचनों पर कान लगा।
2अब देख, मैं अपना मुंह खोलता हूं, मेरी जीभ बोलने के लिए बेचैन है।
3मेरी बातें मेरे हृदय की खराई को प्रकट करती है। और मेरे होंठ सच्चाई से ज्ञान की बातें बोलते है।
4परमेश्वर के आत्मा ने मुझे सृजा है, तथा सर्वशक्तिमान् की श्वास मुझे जीवन देती है।
5यदि तू खंडन कर सके तो कर, और अपने तर्कों को क्रमवार रख कर अपने पक्ष में खड़ा हो।
6देख, परमेश्वर के सामने मैं तेरे समान हूं; मैं भी मिट्टी से रचा गया हू।
7देख, मेरे कारण तू किसी प्रकार भयभीत न होना, मेरा दबाव तुझ पर भारी न होगा।
8“निश्चय, तूने मेरे सामने ही कहा, और मैंने तेरे इन वचनों को सुना हैः
9मैं निर्दोष और निरपराध हूं, मैं निष्कलंक हूं और मुझमें कोई अधर्म नहीं है।
10देख, वह मेरे विरुद्ध अवसर खोजता है; वह मुझे अपना शत्रु समझता है।
11वह मेरे पैरों को काठ में ठोंक देता है, वह मेरे सब मार्गों पर दृष्टि रखता है।’
12सुन, मैं तुझसे कहता हूं, तेरी यह बात ठीक नहीं है, परमेश्वर तो मनुष्य से महान् है।
13“तू क्यों उसकी शिकायत करता है कि वह अपने सब कार्यों का लेखा नहीं देता?
14निश्चय, परमेश्वर तो एक बार बोलता है, वरन् दो बार, पर लोग ध्यान नहीं देते।
15स्वप्न में, रात्रि के दर्शन में, जब लोगों को गहरी नींद आती है, और वे बिछौने पर सोए रहते हैं,
16तब वह उनके कान खोलता, तथा उनकी शिक्षा पर मुहर लगाता है,
17कि मनुष्य को उसके दुराचरण से अलग करे, और उसके घमंड से दूर रखे;
18वह उसके प्राण को गड्ढे से बचाता है, और उसके जीवन को तलवार की मार से।
19“मनुष्य को उसके बिछौने पर पीड़ा से, और उसकी हड्डियों में लगातार होने वाली वेदना से ताड़ना दी जाती है।
20जिससे उसका जीवन रोटी से, और उसका प्राण मनपसन्द भोजन से घृणा करता है।
21उसका मांस सूख कर दिखाई तक नहीं देता, और उसकी न दिखने वाली हड्डियां दिखने लगती है।
22तब उसका प्राण गड्ढे के समीप पहुंच जाता है, और उसका जीवन मृत्यु लाने वालों के निकट पहुंच जाता है।
23“यदि उसके लिए हजारों स्वर्गदूतों में से कोई एक मध्यस्थ हो, जो मनुष्य को स्मरण दिलाए कि उसके लिए क्या उचित है।
24तो वह उस पर अनुग्रह करके कहे, ‘उसे गड्ढे में जाने से छुड़ा ले, मुझे उसकी छुड़ौती का दाम मिल गया है।’
25उसकी देह शिशु की-सी कोमल हो जाएगी, वह अपनी जवानी के दिनों में लौट जाएगा,
26तब वह परमेश्वर से प्रार्थना करेगा, और परमेश्वर उसे ग्रहण करेगा। वह हर्षित होकर उसके मुख का दर्शन करेगा, और उससे अपनी धार्मिकता पुनः प्राप्त कर लेगा।
27वह मनुष्यों के सामने गाएगा और कहेगा, ‘मैंने पाप किया, और सच्चाई को उलट-पुलट कर दिया है, परन्तु उसका बदला मुझे दिया नहीं गया।
28उसने मेरे प्राण को गड्ढे में जाने से बचाया है, मेरा जीवन, प्रकाश को देखेगा।’
29“देख, परमेश्वर मनुष्यों के साथ ये सब काम बहुधा किया करता है
30कि उसके प्राण को गड्ढे से बचा लाए, जिससे वह जीवन के प्रकाश से प्रकाशित हो जाए।
31हे अय्यूब, ध्यान से मेरी सुन; चुप रह और मुझे बोलने दे।
32फिर यदि तेरे पास कुछ कहने को हो तो उत्तर देना बोल, क्योंकि मैं तुझे निर्दोष ठहराना चाहता हू।
33यदि नहीं, तो तू मेरी सुन; चुप रह, मैं तुझे बुद्धि की बात सिखाऊंगा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)