पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 35 / 42
अय्यूब 35
1एलीहू ने आगे कहा,
2“क्या तू इसे न्यायोचित समझता है? क्या तू अपनी धार्मिकता को परमेश्वर की धार्मिकता से बढ़कर समझता है?
3क्योंकि तू कहता है, ‘इससे तुझे क्या लाभ होगा? पाप न करने से मुझे कौन सा अधिक लाभ हुआ?’
4मैं तुझे और तेरे साथ तेरे साथियों को भी उत्तर दूंगा।
5आकाश की ओर दृष्टि कर और देख; बादलों पर ध्यान दे-वे तुझसे ऊंचे है।
6यदि तूने पाप किया है तो परमेश्वर का क्या बिगाड़ लिया? और यदि तेरे अपराध बहुत हैं तो तू उसकी कौन-सी हानि करता है?
7यदि तू धर्मी है तो उसे क्या दे देता है? अथवा उसे तेरे हाथ से क्या मिल जाता है?
8तेरी दुष्टता का फल तेरे जैसे मनुष्य ही के लिए हैं, और तेरी धार्मिकता का फल भी मनुष्य मात्र के लिए है।
9“घोर अत्याचार के कारण वे चिल्ला उठते हैं वे बलवान के बाहुबल के कारण दुहाई देते है।
10परन्तु कोई नहीं पूछता, ‘मेरा सृजनहार परमेश्वर कहां है, जो रात में भी गीत प्रदान है।
11जो हमें पृथ्वी के पशुओं से अधिक शिक्षा देता है, तथा आकाश के पक्षियों से अधिक बुद्धि देता है?’
12बुरे मनुष्यों के घमंड के कारण लोग दुहाई देते हैं, फिर भी परमेश्वर उत्तर नहीं देता।
13निःसन्देह परमेश्वर व्यर्थ पुकार की ओर कान नहीं लगाता, और न सर्वशक्तिमान उसकी ओर ध्यान देता है।
14तो वह तेरी क्या सुनेगा जब तू कहता है कि मैं उसे देखता नहीं पर मामला उसके सामने है, और मुझे केवल उसकी प्रतीक्षा करना है।
15अब देख, इसलिए कि उसने अपना क्रोध प्रकट नहीं किया, और न अपराधों पर विशेष ध्यान दिया है-
16इसीलिए अय्यूब अपना मुंह व्यर्थ खोलता है; वह नासमझी की बातें बहुत बनाता है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)