पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 36 / 42
अय्यूब 36
1फिर एलीहू ने यह भी कहा,
2“थोड़ा धीरज रख कि मैं और बोलूं: परमेश्वर के पक्ष में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है।
3मैं अपना ज्ञान दूर से ले आऊंगा, मैं अपने सृजनहार की धार्मिकता को प्रकट करूंगा।
4क्याेंकि निश्चय मेरे वचन झूठे नहीं होंगेः तेरे साथ वह है जो ज्ञान में सिद्ध है।
5देख, परमेश्वर सामर्थी है, परन्तु किसी को तुच्छ नहीं जानता, वह समझने की शक्ति में सामर्थी है।
6वह दुष्ट को जीवित नहीं रखता, परन्तु दुखियों का न्याय चुकाता है।
7वह धर्मियों पर से अपनी आंखें नहीं हटाता, परन्तु उसने उन्हें राजाओं के साथ सिंहासन पर सदा के लिए बैठाया है, और वे महिमान्वित किए गए है।
8चाहे वे बेड़ियों से जकड़े जाएं, तथा दुख की रस्सियों से बांधे जाएं,
9फिर भी वह उन पर उनके कार्य तथा उनके अपराध प्रकट करता है कि उन्होंने घमंड किया है।
10वह उनके कान शिक्षा सुनने के लिए खोलता, और आज्ञा देता है कि वे बुराई से फिरे।
11यदि वे सुनें और उसकी सेवा करें, तो वे अपने दिन समृद्धि में तथा अपने वर्ष सुख में बिताएंगे।
12परन्तु यदि वे न सुनें तो वे तलवार से नष्ट हो जाएंगे, और अज्ञानता में मर जाएंगे।
13परन्तु जो मन में विधर्मी हैं वे क्रोध संचय करते, और जब वह उन्हें बांधता है तब भी सहायता के लिए नहीं पुकारते।
14वे जवानी में मर जाते, और उनके जीवन लुच्चों के बीच नष्ट हो जाते है।
15वह दीन-दुखियों को उनके दुखों से छुड़ाता है और पीड़ा में उनके कान खोलता है।
16तब निश्चय, वह मुझे क्लेश के मुंह से निकालकर, ऐसे चौड़े स्थान में जहां कोई बाधा नहीं पहुंचा देता है। और जो कुछ तेरी मेज पर परोसा जाता वह चिकनाई से भरा होता है।
17“परन्तु दुष्टों का ही दण्ड तुझ पर आ पड़ा है, न्याय और दण्ड ने तुझे जकड़ रखा है।
18देख, कहीं क्रोध तुझको ठट्ठा करने के लिए न उभारे; और फिरौती का मूल्य बड़ा जानकर मार्ग से न मुड़।
19क्या तेरा धन अथवा तेरा सम्पूर्ण बल संकट से तेरी रक्षा करेगा?
20उस रात की अभिलाषा मत कर जिसमें लोग अपने-अपने स्थान से ऊपर उठा लिए जाते है।
21सावधान रह, बुराई की ओर मत फिर, तूने तो दुःख से अधिक इसी को चाहा है।
22देख, परमेश्वर सामर्थ्य में अति महान्् है; उसके समान सिखाने वाला कौन है?
23किसने उसके लिए मार्ग ठहराया है, और कौन उसे ग़्ालत कह सका है?
24“उसके कार्यों की महिमा करने को स्मरण रख, जिसके विषय में लोग गाते आए है।
25सब मनुष्यों ने इसे देखा है; मनुष्य इसे दूर से देखता है।
26देख, परमेश्वर महान् है, और हमारे ज्ञान से परे है। उसके वर्षों का हिसाब नहीं लगाया जा सकता।
27क्योंकि वह जल की बूंदें ऊपर खींचता है, वे कुहरे से वर्षा बनकर टपकती हैं,
28इन्हें बादल उंडेलते हैं, वे मनुष्य के ऊपर बहुतायत से बरसती है।
29क्या कोई बादलों का फैलना, और उसके आकाशमंडल में का गरजना समझ सकता है?
30देख, वह अपने चारों और बिजली चमकाता, और सागर की थाह को ढांप देता है।
31क्योंकि वह इनसे जाति-जाति का न्याय करता है; और प्रचूरता से भोजन देता है।
32वह बिजली को अपने हाथों में लेकर, उसे आज्ञा देता है कि निशाने पर वार करे।
33उसकी कड़क परमेश्वर का समाचार देती है। पशु भी आंधी के आने की सूचना देते है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)