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पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 39 / 42

अय्यूब 39

1“क्या तू जानता है कि पहाड़ पर की जंगली बकरियां कब जनती हैं? क्या तू हरिणियों के बियाने को देख सकता है?

2क्या तू उनके महीनों को गिन सकता है? क्या तू उनके बियाने का समय जानता है?

3वे घुटने टेककर अपने बच्चे जनतीं और अपनी प्रसव-पीड़ा से छूट जाती है।

4उनके बच्चे हृष्ट-पुष्ट होकर जंगल में बढ़ते हैं; वे निकल जाते और फिर नहीं आते।

5“बनैले गदहे को किसने स्वतंत्र छोड़ दिया? जंगली गदहे के बन्धन किसने खोले?

6उसको मैंने घर के लिए जंगल, तथा निवास के लिए ऊसर भूमि दी?

7वह नगर के कोलाहल को तुच्छ जानता, और हांकने वाले की सुनता भी नही।

8वह अपनी चराई के लिए पहाड़ों में घूमता, और हरियाली की खोज करता-फिरता है।

9“क्या जंगली सांड़ तेरी सेवा करना चाहेगा? अथवा क्या वह तेरी चरनी के पास रात काटेगा?

10क्या तू जंगली सांड को रस्सी से बांधकर रेघारियां बना सकता है? क्या वह तेरे पीछे पीछे हर-रेखा पर पाटा चलाएगा?

11क्या तू उसके बड़े बल के कारण उस पर भरोसा रखकर, अपने परिश्रम का काम उस पर छोड़ देगा?

12क्या तू उस पर भरोसा करेगा कि वह खेत से तेरा अनाज लाकर खलिहान में इकट्ठा करेगा?

13“शुतुर्मुर्गी के पंख आनन्द से फड़फड़ाते हैं, परन्तु क्या ये डैने और पंख ममता को प्रकट करते हैं?

14क्योंकि वह अपने अंडे भूमि पर छोड़ देती, और उन्हें धूल से सेती है;

15और वह भूल जाती है कि कोई पैर उन्हें कुचल देगा, अथवा कोई वनपशु उन्हें रौंद डालेगा।

16वह अपने बच्चों से ऐसी क्रूरता का व्यवहार करती है मानों वे उसके बच्चे नहीं; चाहे उसकी पीड़ा व्यर्थ हो जाए, फिर भी वह इसकी चिन्ता नहीं करती।

17क्योंकि परमेश्वर ने उसे बुद्धिरहित बनाया और उसे समझ नहीं दी है।

18जब वह भागने के लिए अपने पंख फैलाती है, तब वह घोड़े और उसके सवार पर हँसती है।

19“क्या तूने घोड़े को बल दिया है? क्या तूने उसकी गर्दन को अयाल से सुशोभित किया है?

20क्या उसे टिड्डी के समान उछलने की शक्ति तूने दी है? उसकी भयंकर फुफकार डरावनी होती है।

21तराई में वह टाप मारता, तथा अपने सामर्थ्य पर गर्व करता है वह अस्त्र-शस्त्रें का सामना करने निकलता है।

22वह भय पर हँसता है, और घबराता नहीं; वह तलवार से पीठ नहीं फेरता।

23तर्कश, चमकता हुआ बरछा और भाला उस पर खड़खड़ाता है।

24उत्तेजना और क्रोध से वह भूमि पर सरपट दौड़ता, तथा तुरही-नाद सुनकर ठहर नहीं सकता।

25जब-जब तुरही बजती, वह मानो कहता है, ‘अहा!’ वह युद्ध की गन्ध तथा सेनापतियों की गर्जना और युद्ध की ललकार को दूर से सूंघ लेता है।

26“क्या तेरी बुद्धि से बाज दक्षिण की ओर अपने पंख फैलाकर उड़ता है?

27क्या उकाब तेरी ही आज्ञा से ऊपर उड़ता, और अपना घोंसला ऊंचे पर बनाता है?

28वह चोटी पर रहता और वहीं बसेरा करता है, हां, चट्टान की चोटी पर, जो अगम्य स्थान है।

29वहीं से वह अपने अहेर को ताक लेता है, उसकी आंखें दूर ही से उसे देख लेती है।

30उसके बच्चे भी लहू चूसते हैं, जहां घात किए हुए हैं वहां वह भी होता है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)