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पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 38 / 42

अय्यूब 38

1तब यहोवा ने अय्यूब को बवंडर में से उत्तर दिया,

2“यह कौन है जो परामर्श पर नासमझी की बातों के द्वारा परदा डालता है?

3अब पुरुष के समान अपनी कमर कस ले, मैं तुझसे पूछूंगा, तू मुझे उत्तर दे!

4जब मैंने पृथ्वी की नींव डाली तब तू कहां था? यदि तुझे इसका ज्ञान है तो उत्तर दे।

5किसने उसकी नाप ठहराई? क्या तू जानता है? किसने उस पर सूत खींचा?

6उसकी नींव किस पर रखी गई! उसके कोने का पत्थर किसने बिठाया,

7जबकि भोर के तारों ने साथ मिलकर गाया तथा परमेश्वर के सब पुत्रों ने जय-जयकार किया था?

8“जब सागर मानो गर्भ से फूट निकला, तब किसने द्वार बन्द करके उसे रोक दिया?

9उस समय मैंने ही बादल को उसका वस्त्र बनाया तथा घोर अन्धकार की पट्टियों से उसे लपेटा,

10और उसके लिए सीमा ठहराई, तथा बेंडें और दरवाजे लगाए,

11और मैंने कहा, ‘तू यहीं तक आएगा, इससे आगे नहीं; तथा यहीं तेरी विशाल लहरें रुक जाएंगी।’

12“क्या तूने अपने जीवन में प्रातःकाल को कभी आज्ञा दी, तथा उषाकाल को उसका स्थान बताया,

13कि वह पृथ्वी के छोर-छोर तक अधिकार कर सके, तथा दुष्ट लोग उसमें से झाड़ दिए जाएं?

14वह मुहर के नीचे चिकनी मिट्टी के समान बदल जाती है; और सब वस्तुएं पोशाक के समान दिखने लगती है।

15दुष्टों की ज्योति उनसे रोक ली जाती है, तथा उनकी उठी हुई भुजा तोड़ दी जाती है।

16“क्या तू कभी समुद्र के सोतों तक पहुंचा है? क्या तू गहरे सागर की थाह में कभी चला-फिरा है?

17क्या मृत्यु के फाटक तुझ पर प्रकट हुए? क्या तूने गहन अन्धकार के फाटकों को कभी देखा है?

18क्या तूने पृथ्वी के विस्तार को जान लिया है? यदि तू यह सब जानता है तू मुझे बता।

19“प्रकाश के निवास का मार्ग कहां है? और अन्धकार का स्थान कहां है,

20कि तू उसे उसके स्थान में पहुंचा सके तथा उसके घर का पथ पहचान सके!

21तू तो अवश्य जानता होगा, क्योंकि तू उस समय उत्पन्न हो चुका था, तथा तेरी आयु बहुत अधिक है!

22क्या तूने बर्फ के भंडारों में प्रवेश किया, अथवा ओलों के भंडारों को देखा है,

23जिनको मैंने संकट के समय के लिए, अर्थात् युद्ध और लड़ाई के लिए रख छोड़ा है?

24किस मार्ग से उजियाला फैलाया जाता है या पुरवाई पृथ्वी पर बहाई जाती है?

25“किसने बाढ़ के लिए नाला खोदा है, अथवा वज्रपात के लिए मार्ग बनाया है;

26कि मानव-रहित भूमि में, हां, निर्जल मरुभूमि में जल बरसाए,

27जिससे कि उजाड़ और बंजर भूमि तृप्त हो तथा घास उगे?

28क्या वर्षा का कोई पिता है? ओस की बूंदों को किसने उत्पन्न किया है?

29किसके गर्भ से बर्फ निकला है? तथा आकाश के पाले को किसने जन्म दिया है?

30पानी पत्थर के समान कठोर हो जाता, तथा गहरे सागर की सतह जम जाती है।

31“क्या तू कचपचिया के गुच्छों को गूंथ सकता, अथवा मृगशिरा के बन्धन खोल सकता है?

32क्या तू यथोचित समय पर राशियों का उदय कर सकता, तथा सप्तर्षि और उसके साथियों का मार्गदर्शन कर सकता है?

33क्या तू आकाशमंडल की विधियां जानता है, अथवा पृथ्वी पर अधिकार निर्धारित कर सकता है?

34“क्या तू अपनी वाणी बादलों तक पहुंचा सकता है कि बहुत जल बरस कर तुझे छिपा ले?

35क्या तू बिजलियों को गिरने का आदेश दे सकता है कि वे फिर तुझसे कहे, ‘हम तैयार हैं’?

36किसने अन्तःकरण में बुद्धि उत्पन्न की है, अथवा मन में समझ दी है?

37बुद्धि से बादलों को कौन गिन सकता है, अथवा उस समय आकाश के घड़ों को उंडेल सकता है,

38जब मिट्टी सख्त हो जाती, तथा ढेले एक दूसरे से सट जाते हैं?

39“क्या तू सिंहनी के लिए शिकार पकड़ सकता, अथवा सिंहों के बच्चों की भूख उस समय मिटा सकता है,

40जब वे अपनी गुफाओं में दुबक कर बैठे हों और अपने अड्डे पर घात लगाए हों?

41जब कौए के बच्चे परमेश्वर की दुहाई देते हुए निराहार उड़ते फिरते हैं तब उन्हें कौन आहार देता है?

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)