पुराना नियम · अय्यूब · अध्याय 4 / 42
अय्यूब 4
1तब तेमानी एलीपज ने कहा,
2यदि कोई तुझसे दो शब्द कहे तो क्या तू अधीर हो उठेगा? परन्तु बोले बिना कोैन रह सकता है?
3सुन, तूने बहुतों को शिक्षा दी है, और तूने निर्बल हाथो को बल दिया है।
4गिरते हुओं को तूने अपने वचनों से सम्भाला, और लड़खड़ाते घुटनों को तूने दृढ़ किया है।
5पर अब यह तुझी पर आ पड़ा है, और तू निराश हुआ जाता है; उसने तुझे छुआ और तू घबरा उठा है।
6क्या परमेश्वर का भय मानने में ही तेरा भरोसा नहीं? क्या तेरी आशा इसमें नहीं कि तू खराई से चले?
7विचार तो करः क्या कोई निर्दोष व्यक्ति कभी नष्ट हुआ है? कहीं कोई सच्चा व्यक्ति नष्ट हुआ?
8मैंने तो यह देखा है कि जो अधर्म का खेत जोतते और दुख बोते हैं वे वही काटते है।
9वे परमेश्वर के श्वास से नष्ट होते, और उसके क्रोध के झोंके से भस्म हो जाते है।
10सिंह गरजते और हिंसक सिंह दहाड़ते तो हैं, फिर भी जवान सिंहों के दांत तोड़ दिए जाते है।
11बूढ़ा सिंह शिकार के अभाव में मर जाता है, और सिंहनी के बच्चे तितर-बितर हो जाते है। मनुष्य नश्वर है
12“एक बात मेरे पास चुपके से पहुंचाई गई, और उसकी कुछ भनक मेरे कान में पड़ी।
13रात के स्वप्नों के अशान्त विचारों के बीच जब मनुष्यों को गहरी निद्रा आ दबाती है,
14तब भय और कंपकंपी ने मुझे धर दबोचा, और मेरी सब हडिóयों को हिला डाला।
15तब एक आत्मा मेरे सामने से निकली; और मेरी देह के रोएं खड़े हो गए।
16वह चुपचाप खड़ी हो गई, परन्तु मैं उसका रूप पहचान नहीं सका ; मेरी आंखों के सामने एक आकृति थी; सन्नाटा छाया हुआ था, तब मैंने एक वाणी सुनीः
17क्या मनुष्य परमेश्वर से अधिक धर्मी हो सकता है? क्या मनुष्य अपने सृजनहार से अधिक पवित्र हो सकता है?
18वह अपने दासों पर कोई भरोसा नहीं रखता, और अपने स्वर्गदूतों को भी दोषी ठहराता है।
19तब जो मिट्टी के घरों में रहते हैं, जिनकी नींव ही धूल में है, और जो पतंगों के समान पिस जाते हैं, उनका क्या अस्तित्व?
20भोर से लेकर संध्या तक वे नष्ट किए जाते हैं वे सदा के लिए मिट जाते हैं और कोई उन पर ध्यान नहीं देता।
21क्या उनके जीवन-डेरे की डोरी उनके अन्दर ही अन्दर तोड़ी नहीं जाती? और वे निर्बुद्धि के समान मर जाते है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)