पुराना नियम · न्यायियों · अध्याय 9 / 21
न्यायियों 9
1और यरुब्बाल के पुत्र अबीमेलेक ने शकेम जाकर अपनी माता और नाना के सब सम्बन्धियों से कहा,
2शकेम के सब अगुवों के सामने अब यह पूछो, ‘तुम्हारे लिए क्या भला है? क्या यह कि यरुब्बाल के सत्तर पुत्र तुम पर राज्य करें या यह कि एक ही पुरुष तुम पर राज्य करे?’ यह भी स्मरण रखो कि मैं तुम्हारा हाड़-मांस हूँ।”
3तब उसकी माता के सम्बन्धियों ने उसके पक्ष में शकेम के सब अगुवों से ये बातें कहीं, और वे अबीमेलेक के पीछे चलने के लिए तैयार हो गए, क्योंकि उन्होंने कहा, “वह हमारा सम्बन्धी है।”
4तब उन्होंने बाल-बरीत के मन्दिर में से चांदी के सत्तर टुकड़े उसको दिए जिनसे अबीमेलेक ने निकम्मे और ओछे लोगों को भाड़े पर रख लिया और वे उसके पीछे हो लिए।
5तब उसने अपने पिता के घर ओप्रा में जाकर अपने भाइयों को जो यरुब्बाल के सत्तर पुत्र थे एक ही पत्थर पर घात किया। परन्तु यरुब्बाल का सबसे छोटा पुत्र योताम छिपकर बच गया।
6तब शकेम के सब मनुष्य और बेतमिल्लों के लोग इकट्ठे होकर गए और शकेम में बांजवृक्ष के स्तम्भ के पास अबीमेलेक को राजा बनाया।
7जब लोगों ने योताम को यह समाचार दिया तो वह गिरिज्जीम पहाड़ की चोटी पर खड़ा होकर ऊँचे स्वर से पुकार कर यह कहने लगा, “हे शकेम के लोगो, मेरी सुनो जिससे कि परमेश्वर तुम्हारी सुने।
8किसी समय वृक्ष किसी को अपना राजा अभिषिक्त करने चले और उन्होंने जैतून के वृक्ष से कहा, ‘हम पर राज्य कर!’
9परन्तु जैतून के वृक्ष ने उनसे कहा, ‘क्या मैं अपनी उस चिकनाहट को जिससे परमेश्वर और मनुष्य दोनों को सम्मान होता है, छोड़कर और वृक्षों का अधिकारी होकर इधर-उधर डोलने लगूं?’
10तब वृक्षों ने अंजीर के वृक्ष से कहा, ‘तू आकर हम पर राज्य कर।’
11परन्तु अंजीर के वृक्ष ने उनसे कहा, ‘क्या मैं अपनी मिठास और अच्छे फलों को छोड़कर वृक्षों का अधिकारी बनूँ और इधर-उधर डोलने लगूं?’
12तब वृक्षों ने दाखलता से कहा, ‘तू आकर हम पर राज्य कर!’
13परन्तु दाखलता ने कहा, ‘क्या मैं अपने उस ताजे दाखमधु को छोड़ छूं जिससे परमेश्वर व मनुष्य दोनों प्रसन्न होते हैं और वृक्षों की अधिकारिणी बनकर इधर-उधर डोलने लगूं?’
14अन्त में सब वृक्षों ने झड़बेरी से कहा, ‘तू आकर हम पर राज्य कर!’
15और झड़बेरी ने वृक्षों से कहा, ‘यदि तुम सचमुच अपने ऊपर राजा होने के लिए मेरा अभिषेक करते हो तो मेरी छाया में शरण लोः नहीं तो झड़बेरी से आग निकलर लबानोन के देवदारों को भस्म कर देगी।’
16“इसलिए अब यदि तुमने अबीमेलेक को राजा बनाने में सच्चाई और खराई से व्यवहार किया है, और यदि यरुब्बाल और उसके घराने के साथ उचित व्यवहार किया है और जैसा उसके काम के योग्य उचित था वैसा ही उसके साथ किया है-
17क्योंकि मेरे पिता ने तुम्हारे लिए अपनी जान की बाजी लगा कर युद्ध किया और तुम्हें मिघानियों के हाथ से छुड़ाया;
18परन्तु आज तुमने मेरे पिता के घराने के विरुद्ध उठकर उसके सत्तर पुत्रों को एक ही पत्थर पर घात किया और उसकी नौकरानी के पुत्र अबीमेलेक को शकेम के लोगों के ऊपर राजा बनाया क्योंकि वह तुम्हारा जाति भाई है-
19इसलिए यदि तुमने आज यरुब्बाल और उसके घराने से सच्चाई के साथ व्यवहार किया हो तो अबीमेलेक के साथ आनन्द मनाओ और वह भी तुम्हारें साथ आनन्द मनाए।
20यदि ऐसा न हो तो अबीमेलेक में से आग निकलकर शकेम के लोगों को भस्म कर दे और शकेम के लोगों और बेतमिल्लो से आग निकलकर अबीमेलेक को भस्म कर दे।”
21तब योताम बचकर भागा और अपने भाई अबीमेलेक के डर के कारण बैर को जाकर वहीं रहने लगा।
22अबीमेलेक ने इस्राएल पर तीन वर्ष तक शासन किया।
23फिर परमेश्वर ने अबीमेलेक और शकेम के लोगों के बीच एक दुष्ट आत्मा भेजी जिससे कि शकेम के लोग अबीमेलेक से विश्वासघात करने लगे,
24जिससे कि उसे यरुब्बाल के सत्तर पुत्रों पर की गई हिंसा का फल मिले। और उसका लहू उनकी हत्या करने वाले उनके भाई अबीमेलेक पर तथा शकेम के उन लोगों पर भी पड़े जिन्होंने उसके भाइयों की हत्या करने के लिए उसके हाथ मज़बूत किए थे।
25तब शकेम के लोगों ने उसके विरुद्ध घात लगाने के लिए लोगों को पहाड़ी की चोटियों पर बैठाया और उन्होंने उस मार्ग से आने-जाने वाले सब लोगों को लूटा और इसका समाचार अबीमेलेक को मिला।
26तब एबेद का पुत्र गाल अपने सम्बन्धियों के साथ शकेम में आया; और शकेम के लोगों ने उसका भरोसा किया।
27और उन्होंने मैदान में जाकर अपनी दाख की बारियों में से फल बटोरे और रौंदकर उनका रस निकाला और उत्सव मनाया। फिर उन्होंने अपने देवता के घर में जाकर खाया-पीया और अबीमेलेक को शाप दिया।
28तब एबेद के पुत्र गाल ने कहा, “अबीमेलेक कौन है और शकेम कौन है कि हम उसकी सेवा करें? क्या वह यरुब्बाल का पुत्र नहीं और जबूल उसका सेनानायक नहीं? हम शकेम के पिता हमोर के लोगों की सेवा तो करें परन्तु हम उसकी सेवा क्यों करें?
29इसलिए यदि यह प्रजा मेरे अधिकार में होती तो अच्छा होता! तब मैं अबीमेलेक को हटा देता।” और उसने अबीमेलेक से कहा, “अपनी सेना बढ़ा कर निकल आ।”
30और जब नगर के शासक जबूल ने एबेद के पुत्र गाल के इन शब्दों को सुना तो उसका क्रोध भड़क उठा।
31और उसने कपटपूर्वक अबीमेलेक के पास दूतों को यह कहने के लिए भेजा, “देख, एबेद का पुत्र गाल और उसके सम्बन्धी शकेम आए हैं और देख, वे नगर को तेरे विरुद्ध भड़का रहे है।
32इसलिए अब तू रात को उठ और अपने साथ के लोगों को लेकर मैदान में घात लगा।
33और सुबह के समय ऐसा हो कि जैसा कि सूर्याेदय हो, तू उठकर इस शहर पर आक्रमण कर, और देख, जब वह अपने साथ के लोगों समेत तेरे विरुद्ध निकले तो जो कुछ तुझ से हो सके वहीं करना।”
34अतः अबीमेलेक और उसके साथ के सब लोग रात को उठे और चार दल बांधकर शकेम के विरुद्ध घात लगाकर बैठ गए।
35फिर एबेद का पुत्र गाल बाहर जाकर नगर के प्रवेश द्वार पर खड़ा हो गया और अबीमेलेक और उसके साथ के लोग घात छोड़कर उठ खड़े हुए।
36और जब गाल ने लोगों को देखा तो जबूल से कहा, “देख, पहाड़ों की चोटियों पर से लोग उतर कर आ रहे है।” परन्तु जबूल ने उससे कहा, “वह तो पहाड़ों की छाया है, जो तुझे मनुष्यों के सामान दिखाई पड़ रही है।”
37गाल ने फिर कहा, “देख, लोग देश के ऊँचे स्थानों से नीचे उतरे चले आ रहे हैं और एक झुण्ड मोननीम नामक बांजवृक्ष के मार्ग से चला आ रहा है।”
38जबूल ने उससे कहा, “अब तेरा वह बड़ा बोल कहां रहा जो तू ने कहा था, अबीमेलेक कौन है कि हम उसकी सेवा करें?’ क्या ये ही वे लोग नहीं हैं जिन्हें तू तुच्छ जानता था? अब बाहर निकल कर उससे लड़!”
39इसलिए गाल निकल कर शकेम के अगुवों के आगे गया और अबीमेलेक से लड़ा।
40और अबीमेलेक ने उसे खदेड़ा और वह उसके सामने से भाग गया। और नगर के प्रवेश द्वार तक बहुत से लोग घायल होकर गिर पड़े।
41तब अबीमेलेक अरूमा में रुक गया; परन्तु जबूल ने गाल को और उसके सम्बन्धियों को निकाल दिया जिससे वे शकेम में न ठहर सके।
42दूसरे दिन ऐसा हुआ कि लोग मैदान में निकल गए और यह अबीमेलेक को बताया गया।
43इसलिए उसने अपने लोगों को तीन दलों में विभाजित किया और मैदान में घात लगा कर बैठ गया। जब उसने लोगों को शहर से निकल कर आते देखा तो उसने उठकर उन्हें घात किया।
44तब अबीमेलेक अपने दल के साथ आगे बढ़कर नगर के प्रवेश द्वार पर खड़ा हो गया। और अन्य दो दलों ने झपटकर उन सब लोगों को मार डाला जो मैदान में थे।
45अबीमेलेक दिन भर नगर के विरोध में लड़ा और नगर को अपने अधिकार में कर लिया और जो लोग उसमें थे उनको घात किया तब उसने नगर को ढा दिया और उस पर नमक छिड़कवा दिया।
46जब शकेम के गुम्मट के अगुवों ने यह सुना तो वे एलबरीत के मन्दिर के तहखाने में जा घुसे।
47और अबीमेलेक को यह बताया गया कि सब अगुवे शकेम के गुम्मट में एकत्रित है।
48अतः अबीमेलेक अपने साथियों सहित सलमोन पहाड़ पर चढ़ गया। और अबीमेलेक ने हाथ में कुल्हाड़ी लेकर पेड़ों में से एक डाली काटी और उसे उठाकर अपने कंधे पर रखा। तब उसने अपने साथ के सब लोगों को कहा, “जो कुछ तुमने मुझेे करते देखा है, शीघ्र वैसा ही करो।”
49और उसके साथ के सब लोग भी अपने लिए एक-एक डाल काटकर अबीमेलेक के पीछे चल पड़े और उन्हें तहखाने के ऊपर डालकर उन्होंने उस तहखाने में आग लगा दी जिसमें लोग थे। इसलिए शकेम के गुम्मट के वे सब लोग भी मर गए जो लगभग एक हज़ार स्त्री-पुरुष थे।
50तब अबीमेलेक तेबेस को गया और तेबेस के विरुद्ध डेरे खड़े करके उसने उस पर अधिकार कर लिया।
51परन्तु नगर के बीच में एक दृढ़ गुम्मट था। इसलिए सब स्त्री-पुरुष अपने नगर के अगुवों के साथ भाग कर उसमें जा घुसे और उसे बन्द करके गुम्मट की छत पर चढ़ गए।
52अतः अबीमेलेक गुम्मट के निकट पहुँच कर उसके विरुद्ध लड़ा और प्रवेश द्वार के निकट पहुँचा कि उसे आग से जला दे,
53परन्तु किसी स्त्री ने चक्की का ऊपरी पाट अबीमेलेक के सिर पर पटक दिया जिससे उसकी खोपड़ी फट गई।
54तब उसने शीघ्र ही अपने हथियार ढोने वाले जवान को बुलाया और उसे से कहा, “अपनी तलवार खींचकर मुझे मार डाल, ऐसा न हो कि मेरे बारे में यह कहा जाए कि एक स्त्री ने उसकी हत्या की।” इसलिए उस जवान ने उसे तलवार भोंक दी जिससे वह मर गया।
55और जब इस्राएलियों ने देखा कि अबीमेलेक मर गया है तो हर एक अपने-अपने घर चला गया।
56इस प्रकार परमेश्वर ने अबीमेलेक को उस दुष्टता को बदला दिया जो उसने अपने सत्तर भाइयों की हत्या करके अपने पिता से की थी।
57और शकेम के लोगों की सम्पूर्ण दुष्टता भी परमेश्वर ने उनके सिर पर लौटा दी, और यरुब्बाल के पुत्र योताम का शाप उन पर पड़ गया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)