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नया नियम · लूका · अध्याय 16 / 24

लूका 16

1फिर वह चेलों से भी कह रहा था, “किसी धनवान मनुष्य का एक भण्डारी था और उस भण्डारी के सम्बन्ध में उसे बताया गया था कि वह तेरी सारी सम्पत्ति उड़ा रहा है।

2उसने उसे बुलाकर कहा, ‘यह क्या बात है जो मैं तेरे विषय में सुन रहा हूँ? अपने भण्डारीपन का लेखा दे, क्योंकि अब तू भण्डारी नहीं रह सकता।’

3तब उस भण्डारी ने मन में सोचा, ‘मेरा स्वामी तो भण्डारी का कार्य मुझसे छीन रहा है, अब मैं क्या करूं? मुझमें अब इतनी शक्ति नहीं कि गड्ढे खोद सकूँ। भीख मांगने से भी मुझे लज्जा आती है।

4मैं समझ गया कि मैं क्या करूँंगा जिससे कि जब मैं भण्डारीपन से हटाया जाऊँ तो लोग अपने घरों में मेरा स्वागत करे।’

5तब उसने अपने स्वामी के प्रत्येक देनदार को बुलाया और पहले से पूछा, ‘तुझपर मेरे स्वामी का कितना ट्ठण है?’

6उसने कहा, “तीन हज़ार लीटर तेल,’ उसने उससे कहा, ‘ले अपना बही-खाता और शीघ्र बैठकर पन्द्रह सौ लिख।’

7तब उसने दूसरे से कहा, ‘तू कितने का ट्ठणी है?’ उसने कहा, ‘सौ क्विन्टल गेहूँ का,’ उसने उससे कहा, ‘ले अपना बही खाता और शीघ्र बैठकर अस्सी लिख।’

8तब उसके स्वामी ने उस अधर्मी भण्डारी की सराहना की, क्योंकि उसने चतुराई से कार्य किया। क्योंकि इस युग के पुत्र अपने जैसे लोगों के साथ व्यवहार करने में ज्योति के पुत्रों से अधिक चतुर हैं।

9मैं तुमसे कहता हूँ कि अधर्म के धन से अपने लिए मित्र बना लो कि जब वह समाप्त हो जाए तो वे तुम्हें अनन्त निवासों में ले ले।

10जो अत्यन्त छोटी-सी बात में विश्वासयोग्य है, वह बहुत में भी विश्वासयोग्य है; और जो अत्यन्त छोटी बात में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है।

11अतः यदि तुम अधर्म केधन में विश्वासयोग्य न रहे तो सच्चा धन तुम्हें कौन सौंपेगा?

12यदि तुम पराए का धन उपयोग करने में विश्वासयोग्य न रहे, तो जो तुम्हारा अपना है, उसे तुम्हें कौन देगा?

13कोई भी सेवक दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता; क्योंकि या तो वह एक से घृणा और दूसरे से प्रेम करेगा, या फिर एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।”

14फरीसी जो धन के लोभी थे, उसकी इन सब बातों को सुन रहे थे और उसपर ताना मार रहे थे।

15उसने उनसे कहा, “तुम ऐसे लोग हो जो मनुष्यों के सामने अपने आप को धर्मी ठहराते हो, परन्तु परमेश्वर तुम्हारे हृदय को जानता है। वह जो मनुष्यों में अति सम्मानित है, परमेश्वर की दृष्टि में तुच्छ है।

16यूहन्ना के समय तक तो व्यवस्था और नबियों का प्रचार हुआ। तत्पश्चात परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया गया और प्रत्येक व्यक्ति उसमें बलपूर्वक प्रवेश कर रहा है।

17परन्तु व्यवस्था के एक बिन्दु के मिट जाने की अपेक्षा स्वर्ग और पृृथ्वी का टल जाना सहज है।

18प्रत्येक जो अपनी पत्नी को त्यागकर दूसरी से विवाह करता है, व्यभिचार करता है; और जो पति द्वारा त्यागी हुई स्त्री से विवाह करता है, तो वह भी व्यभिचार करता है।

19“एक धनी मनुष्य था जो सदा बैंजनी वस्त्र व मलमल पहना करता था और प्रतिदिन धूमधाम व बड़े सुख-विलास से रहता था।

20और लाजर नाम का एक कंगाल व्यक्ति घावों से भरा हुआ उसके फाटक पर छोड़ दिया जाता था,

21कि जो टुकड़े उस धनवान की मेज से गिरते थे उनसे वह अपना पेट भरे; इसके अतिरिक्त कुत्ते भी आकर उसके घावों को चाटा करते थे।

22ऐसा हुआ कि कंगाल मनुष्य मर गया और स्वर्गदूतों ने आकर उसे इब्राहीम की गोद में पहुँचा दिया। वह धनी मनुष्य भी मरा और दप़फ़ना दिया गया।

23तब अधोलोक में अत्यन्त पीड़ा में पड़े हुए उसने अपनी आँखें उठाईं और दूर से इब्राहीम को देखा जिसकी गोद में लाजर था।

24तब उसने पुकारकर कहा, ‘हे पिता इब्राहीम, मुझ पर दया कर। लाजर को भेज कि वह अपनी उंगली का सिरा पानी में डुबोकर मेरी जीभ को ठण्डा करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में पड़ा तड़प रहा हूँ।’

25परन्तु इब्राहीम ने कहा, “हे पुत्र, स्मरण कर कि तू अपने जीवन में सब अच्छी वस्तुएं प्राप्त कर चुका है और इसी प्रकार लाजर बुरी वस्तुएं; पर अब वह यहां शान्ति पा रहा है और तू पीड़ा में पड़ा तड़प रहा है।

26इसके अतिरिक्त हमारे और तेरे मध्य एक अथाह खाई निर्धारित की गई है कि यहां से यदि कोई उसपार जाना भी चाहे तो न जा सके, और वहां से यदि कोई इस पार हमारे पास आना चाहे तो न आ सके।’

27उसने कहा, ‘हे पिता, तब तो मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू उसे मेरे पिता के घर भेज दे-

28क्योंकि मेरे पांच भाई हैं-कि वह उन्हें चेतावनी दे, कहीें ऐसा न हो कि वे भी इस पीड़ा के स्थान में आए।’

29परन्तु इब्राहीम ने कहा, “उनके पास मूसा और नबी हैं; वे उनकी ही सुने।’

30परन्तु उसने कहा, “हे पिता इब्राहीम, नहीं; यदि मृतकों में से कोई उनके पास लौटकर जाए तो वे मन फिराएंगे।’

31परन्तु उसने उससे कहा, ‘यदि वे मूसा और नबियों की नहीं सुनते तो वे उसकी भी, जो मृतकों में से जीवित होकर उनके पास जाए, नहीं सुनेंगे’।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)