नया नियम · लूका · अध्याय 17 / 24
लूका 17
1फिर उसने अपने चेलों से कहा, “ठोकरों का लगना तो अनिवार्य है, परन्तु हाय उस पर जिसके द्वारा ये लगती हैं!
2उसके लिए अच्छा यह होता कि उसके गले में चक्की का पाट लटकाकर उसे समुद्र में फेंक दिया जाता, अपेक्षा इसके कि वह उन छोटों में से किसी एक को ठोकर खिलाए।
3सावधान! यदि तेरा भाई पाप करे तो उसे डांट, और यदि वह मन फिराए तो उसे क्षमा कर।
4यदि वह प्रतिदिन सात बार तेरे विरुद्ध पाप करे और सातों बार आकर तुझसे कहे, ‘मैं पश्चात्ताप करता हूँ,’ तो उसे क्षमा कर।”
5तब प्रेरितों ने प्रभु से कहा, “हमारा विश्वास बढ़ा।”
6प्रभु ने कहा, “यदि तुममें राई के दाने के बराबर विश्वास होता और तुम इस शहतूत के पेड़ से कहते, ‘उखड़कर समुद्र में लग जा’, तो वह तुम्हारी मान लेता।
7तुममें से कौन ऐसा है जिसका दास हल चलाता और भेड़ों को चराता हो, कि जब दास खेत से लौटकर आए तो वह दास से कहे, ‘शीघ्र आ, भोजन करने बैठ’?
8क्या वह उससे नहीं कहेगा, ‘मेरे खाने के लिए कुछ बना और साफ वस्त्र पहन तथा जब तक मैं खा-पी न लूँ, मेरी सेवा कर; तत्पश्चात तू भी खा-पी लेना’?
9आज्ञाओं का पालन करने के लिए क्या वह अपने दास को धन्यवाद देगा?
10इसी प्रकार तुम भी जब उन सब आज्ञाओं का पालन कर लो जो तुम्हें दी गई हैं तो कहो, ‘हम अयोग्य दास हैं; हमने तो केवल वही किया है जो हमें करना चाहिए था’।”
11ऐसा हुआ कि जब वह यरूशलेम को जा रहा था तो सामरिया और गलील के बीच से होकर निकला।
12ज्यों ही उसने किसी गांव में प्रवेश किया तो दूर खड़े दस कुष्ठ-रोगी उससे मिले।
13उन्होंने ऊंची आवाज़ में पुकारकर कहा, “हे यीशु, स्वामी, हमपर दया कर!”
14जब उसने उन्हें देखा तो कहा, “जाकर अपने आप को याजकों को दिखाओ।” तब ऐसा हुआ कि जाते-जाते वे शुद्ध हो गए।
15अब उनमें से एक ने, जब देखा कि वह चंगा हो गया है तो ऊंची आवाज में परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ लौट आया,
16और उसे धन्यवाद देते हुए मुंह के बल उसके चरणों पर गिर पड़ा। वह एक सामरी था।
17इस पर यीशु ने कहा, “क्या दस के दस शुद्ध नहीं हुए थे, तो फिर वे नौ कहां हैं?
18क्या इस परदेशी के अतिरिक्त और कोई नहीं रह गया जो लौटकर परमेश्वर को महिमा देता?”
19उसने उससे कहा, “उठकर चला जा; तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है।”
20फरीसियों द्वारा यह पूछे जाने पर कि परमेश्वर का राज्य कब आएगा, उसने उन्हें उत्तर दिया, “परमेश्वर के राज्य का आगमन दृशयरूप में नहीं होगा;
21न लोग कहेंगे, ‘देखो, यहां है!’ या ‘वहां है!’ क्योंकि देखो, परमेश्वर का राज्य तुम्हारे मध्य है।”
22उसने चेलों से कहा, “वे दिन आएंगे जब मनुष्य के पुत्र के दिनों में से एक दिन को देखने की तुम्हें बड़ी उत्कण्ठा होगी और तुम उसे नहीं देखोगे।
23वे तुमसे कहेंगे, ‘वहां देखो!’ ‘यहां देखो!’ तुम चले मत जाना, और न उनके पीछे भागना।
24क्योंकि जिस प्रकार बिजली चमककर आकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक कौंधती है, उसी प्रकार मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में दिखाई देगा।
25परन्तु पहले यह आवश्यक है कि वह बहुत दुख उठाए और इस पीढ़ी के लोगों द्वारा त्यागा जाए।
26जैसा नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा।
27जब तक नूह ने जहाज़ में प्रवेश न किया, वे खाते-पीते और शादी-ब्याह करते रहे। तब जल-प्रलय हुआ और सब नष्ट हो गए।
28लूत के दिनों में भी ऐसा ही हुआ। वे खाते-पीते, लेन-देन करते, पेड़-पौधे लगाते और घर बनाते रहे;
29परन्तु जब लूत सदोम से निकला, उस दिन आकाश से आग और गंधक की वर्षा हुई और वे सब नष्ट हो गए।
30जिस दिन मनुष्य का पुत्र प्रकट होगा, उस दिन भी ठीक ऐसा ही होगा।
31उस दिन, जो छत पर हो और उसका सामान नीचे घर में हो, वह उसे लेने को न उतरे; और इसी प्रकार वह जो खेत में हो, पीछे न लौटे।
32लूत की पत्नी को स्मरण करो!
33जो कोई अपना प्राण बचाने का प्रयत्न करता है; वह उसे खोएगा; और जो उसे खोएगा, वह उसे जीवित रखेगा!
34मैं तुमसे कहता हूँ, उस रात दो मनुष्य एक चारपाई पर होंगे; एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा।
35दो स्त्रियां एक ही स्थान पर चक्की पीसती होंगी; एक ले ली जाएगी और दूसरी छोड़ दी जाएगी।
36दो मनुष्य खेत में होंगे; एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा।”ह्
37तब उन्होंने उससे पूछा, “हे प्रभु, यह कहाँ होगा?” उसने उनसे कहा, “जहां शव होगा, वहां गिद्ध भी इकट्ठे होंगे।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)