Loading account

नया नियम · लूका · अध्याय 18 / 24

लूका 18

1उसने उन्हें यह बताने के लिए कि निराश हुए बिना उनको सदैव प्रार्थना करना चाहिए, यह दृष्टान्त कहाः

2“किसी नगर में एक न्यायाधीश था जो न तो परमेश्वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था।

3उस नगर में एक विधवा भी रहती थी जो उसके पास बार-बार आकर कहती थी, ‘मेरा न्याय करके मुझे मुद्दई से बचा।’

4कुछ समय तक तो उसने उसकी न सुनी। अन्त में उसने सोचा, ‘यघपि मैं परमेश्वर से नहीं डरता और न किसी मनुष्य की परवाह करता हूँ,

5फिर भी इसलिए कि यह विधवा मुझे तंग करती है मैं उसका न्याय चुकाऊंगा, कहीं ऐसा न हो कि वह लगातार आकर मेरी नाक में दम कर दे’।”

6प्रभु ने कहा, “सुनो, इस अधर्मी न्यायाधीश नेे क्या कहा।

7तो क्या परमेश्वर अपने चुने हुओं का न्याय न करेगा जो रात-दिन उसे पुकारते रहते हैं? क्या वह उनके विषय में देर करेगा?

8मैं तुमसे कहता हूँ कि वह उनका न्याय शीघ्र करेगा। फिर भी मनुष्य का पुत्र जब आएगा तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास पाएगा?”

9उसने उन लोगों से जो इस बात के लिए अपने ऊपर भरोसा रखते थे कि वे धर्मी हैं और जो दूसरों को तुच्छ समझते थे, यह दृष्टान्त कहाः

10“दो व्यक्ति मन्दिर में प्रार्थना करने गए, उनमें से एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेने वाला।

11फरीसी खड़ा होकर स्वयं इस प्रकार प्रार्थना करने लगाः ‘हे परमेश्वर, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि मैं अन्य लोगों के समान ठग, अन्यायी व व्यभिचारी नहीं हूँ, न इस चुंगी लेने वाले के समान ही हूँ।

12मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूँ और जो कुछ मुझे मिलता है सबका दसवां अंश तुझे देता हूँ।’

13परन्तु चुंगी लेने वाला कुछ दूर खड़ा था; उसने स्वर्ग की ओर अपनी आंखें उठाना भी न चाहा, परन्तु छाती पीटते हुए कहा, ‘हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर!’

14मैं तुमसे कहता हूँ कि यह मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया, न कि वह अन्य। क्योंकि प्रत्येक जो अपने आप को बड़ा बनाता है, दीन किया जाएगा; और जो अपने को दीन बनाता है, बड़ा किया जाएगा।”

15लोग अपने बच्चों को भी उसके पास ला रहे थे कि वह उनपर हाथ रखे, परन्तु जब चेलों ने देखा तो वे उन्हें झिड़कने लगे।

16परन्तु यीशु ने पास बुलाकर उनसे कहा, “बच्चों को मेरे पास आने दो, उन्हें मना न करो, क्योंकि परमेश्वर का राज्य ऐसों ही का है।

17मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जो कोई परमेश्वर के राज्य को बच्चे के समान ग्रहण नहीं करता, वह कभी भी उसमें प्रवेश नहीं करेगा।”

18फिर किसी एक अधिकारी ने उससे प्रशन किया, “हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन पाने के लिए मैं क्या करूँ?”

19यीशु ने उससे कहा, “तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? परमेश्वर को छोड़ और कोई उत्तम नही।

20तू आज्ञाओं को तो जानता हैः ‘व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और माता का आदर करना’।”

21उसने कहा, “मैं इनको बचपन से मानता आया हूँ।”

22जब यीशु ने यह सुना तो उससे कहा, “तुझमें अभी तक एक बात की कमी हैः अपनी सारी सम्पत्ति को बेचकर कंगालों को बांट दे तो तेरे पास स्वर्ग में धन होगा और आकर मेरे पीछे चल।”

23परन्तु यह सब सुनकर वह बहुत उदास हुआ, क्योंकि वह अत्यन्त धनी था।

24यीशु ने उसकी ओर देखकर कहा, “धनवानों का परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना कठिन है!

25क्योंकि ऊंट का सुई के छेद में से निकल जाना किसी धनी व्यक्ति के परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से सहज है।”

26इसपर सुनने वालों ने कहा, “तो किसका उद्धार हो सकता है?”

27परन्तु उसने कहा, “जो बातें मनुष्य के लिए असम्भव हैं, वे परमेश्वर के लिए सम्भव है।”

28इसपर पतरस ने कहा, “देख, हम तो अपना घर-बार छोड़कर तेरे पीछे चल पड़े है।”

29उसने उनसे कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ, ऐसा कोई नहीं जिसने अपना, घर, पत्नी, भाई, माता-पिता या बच्चों को परमेश्वर के राज्य के लिए छोड़ा हो,

30और वह इस समय कई गुणा अधिक तथा आने वाले युग में अनन्तजीवन न पाए।”

31तब उसने बारहों को एक ओर ले जाकर उनसे कहा, “देखो, हम यरूशलेम जा रहे हैं, और मनुष्य के पुत्र के सम्बन्ध में नबियों के द्वारा जो कुछ लिखा गया है, वह सब पूरा होगा।

32क्योंकि वह गैरयहूदियों के हाथों में सौंप दिया जाएगा और ठट्ठों में उड़ाया जाएगा। उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाएगा और उसपर थूका जाएगा।

33कोड़े लगाने के पश्चात् वे उसे मार डालेंगे, तब तीसरे दिन वह जी उठेगा।”

34पर इनमें से कोई बात उनकी समझ में न आई, अतः यह बात उनसे गुप्त रही, और जो बातें कही गई थीं, वे उन्हें समझ न पाए।

35ऐसा हुआ कि जब वह यरीहो पहुँचने पर था तो एक अंधा, सड़क के किनारे बैठा, भीख मांग रहा था।

36भीड़ के चलने का शब्द सुनकर वह पूछने लगा कि यह सब क्या हो रहा है?

37उन्होंने उसे बताया कि यीशु नासरी जा रहा है।

38उसने पुकारकर कहा, “हे यीशु, दाऊद की सन्तान, मुझपर दया कर!”

39वे जो मार्ग पर आगे-आगे चल रहे थे उसे डांटकर चुप रहने को कह रहे थे, परन्तु वह और भी अधिक चिल्लाता रहा, “दाऊद की सन्तान मुझपर दया कर!”

40तब यीशु ने ठहरकर आज्ञा दी कि वह उसके पास लाया जाए, और जब वह पास आया तो उससे पूछा,

41“मैं तेरे लिए क्या करूँ? उसने कहा, “हे प्रभु, यह कि मैं देखने लगूँ।”

42यीशु ने उससे कहा, “देखने लग; तेरे विश्वास ने तुझे ठीक किया है।”

43वह उसी क्षण देखने लगा और परमेश्वर की महिमा करते हुए यीशु के पीछे चल पड़ा। जब सब लोगों ने यह देखा तो उन्होंने परमेश्वर की स्तुति की।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)