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नया नियम · लूका · अध्याय 19 / 24

लूका 19

1वह यरीहो में प्रवेश करके वहां से जा रहा था

2तो देखो, वहां एक मनुष्य था जिसका नाम जक्कई था। वह चुंगी लेने वालों का प्रमुख था और वह धनी था।

3वह यीशु को देखने का प्रयत्न कर रहा था, परन्तु भीड़ के कारण देख नहीं पा रहा था क्योंकि वह नाटा था।

4तब उसे देखने के लिए वह दौड़कर एक गूलर के पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि यीशु उसी मार्ग से होकर जाने वाला था।

5जब यीशु उस स्थान पर पहुँचा तो उसने ऊपर देखकर उससे कहा, “जक्कई, शीघ्र नीचे उतर आ, क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना है।”

6और उसने झटपट नीचे उतरकर प्रसन्नता- पूर्वक उसका स्वागत किया।

7जब लोगों ने यह देखा तो वे सब यह कहकर कुड़कुड़ाने लगेः “वह तो एक पापी मनुष्य का अतिथि बनने गया है।”

8जक्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा, “प्रभु, देख, मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को दे दूँगा, और यदि मैंने किसी से अन्याय करके कुछ भी लिया है तो उसे चौगुना लौटा दूंगा।”

9यीशु ने उसके लिए कहा, “आज इस घर में उद्धार आया है, क्योंकि यह मनुष्य भी इब्राहीम का एक पुत्र है।

10मनुष्य का पुत्र तो खोए हुओं को ढूंढ़ने और उनका उद्धार करने आया है।”

11जब लोग इन बातों को सुन रहे थे, वह एक दृष्टान्त कहने लगा, क्योंकि वह यरूशलेम के निकट था और वे सोचते थे कि परमेश्वर का राज्य शीघ्र ही प्रकट होनेपर है।

12इसलिए उसने कहा, “एक कुलीन पुरुष दूर देश को गया कि अपने लिए राज्य पाकर लौट जाए।

13उसने अपने दस दासों को बुलाया और उन्हें दसमीना दिए और उनसे कहा, ‘मेरे लौट आने तक इनसे व्यापार करना।’

14परन्तु उसके नगरवासी उससे बैर रखते थे अतः उसके पीछे-पीछे अपने प्रतिनिधि यह कहने के लिए भेजेः ‘हम नहीं चाहते कि यह मनुष्य हमपर राज्य करे।’

15ऐसा हुआ कि जब वह राज्य पाकर लौटा तो उसने आज्ञा दी कि वे दास जिनको उसने धन दिया था बुलाए जाएं, जिससे उसे मालूम हो जाए कि उन्होंने कैसा व्यापार किया।

16पहले ने आकर कहा, ‘हे स्वामी, तेरेमीना ने दसमीना और कमाए।’

17उसने उससे कहा, ‘हे भले दास, शाबाश! तू बहुत छोटी-सी बात में विश्वासयोग्य निकला, अतः दस नगरों का अधिकारी बन।’

18फिर दूसरे ने आकर कहा, ‘हे स्वामी, तेरे मीना ने पांच मीना और कमाए है।

19उसने उससे कहा, ‘तू पांच नगरों का अधिकारी बन।’

20फिर एक और आकर कहने लगा, “हे स्वामी, देख तेरा मीना! इसे मैंने रूमाल में बांधकर रखा है

21क्योंकि मैं तुझसे डरता था इसलिए कि तू कठोर मनुष्य है। जिसे तूने नहीं रखा, उसे तू ले लेता; और जिसे तूने नहीं बोया , उसे तू काटता है।’

22उसने उससे कहा, ‘हे निकम्मे दास, तेरे ही शब्दों में मैं तुझे दोषी ठहराऊँगा। तू तो जानता था कि मैं कठोर मनुष्य हूँ: जिसे मैंने नहीं रखा, उसे उठा लेता हूँ और जिसे नहीं बोया, उसे काटता हूँ।

23तो तूने मेरा धन ब्याज पर क्यों नहीं लगाया कि जब मैं लौटता तो उसे ब्याज सहित ले लेता?’

24उसने उनसे जो निकट खड़े थे कहा, ‘मीना को इससे ले लो और जिसके पास दस हैं, उसे दे दो।’

25उन्होंने उससे कहा, ‘स्वामी, उसके पास तो पहले से ही दस है।’

26‘मैं तुमसे कहता हूँ कि प्रत्येक जिसके पास हैं, उसे अधिक दिया जाएगा, परन्तु जिसके पास नहीं है, उससे वह भी जो उसके पास है ले लिया जाएगा।

27परन्तु मेरे उन शत्रुओं को जो नहीं चाहते कि मैं उनपर राज्य करूँ, यहां लाओ और मेरे सामने मार डालो’।”

28इन बातों के कहने के पश्चात् वह आगे आगे यरूशलेम की ओर बढ़ता गया।

29ऐसा हुआ कि जब वह बैतप़फ़गे और बैतनिय्याह में उस पहाड़ी के निकट जो ‘जैतून’ कहलाता है, पहुँचा तो उसने चेलों में से दो को यह कहकर भेजाः

30“अपने सामने के गांव में चले जाओ। वहां प्रवेश करते ही तुमको एक गदही का बच्चा जिस पर कभी कोई सवार नहीं हुआ बंधा मिलेगा। उसे खोलकर यहां ले आओ।

31यदि कोई तुमसे पूछे, ‘इसे क्यों खोल रहे हो?’ तो कहना, प्रभु को इसकी आवश्यकता है’।”

32जो चेले भेजे गए थे उन्होंने जाकर, जैसा उसने उनसे कहा था, ठीक वैसा ही पाया।

33ज्यों ही वे गदही के बच्चे को खोलने लगे उसके स्वामी ने कहा, “तुम इस बच्चे को क्यों खोल रहे हो?”

34उन्होंने कहा, “प्रभु को इसकी आवश्यकता है।”

35तब वे उसे यीशु के पास लाए, और उन्होंने अपने कपड़े गदही के बच्चे पर डालकर यीशु को उसपर बैठाया।

36जब वह चलने लगा तो वे अपने कपड़े मार्ग पर बिछाने लगे।

37अब, जब वह जैतून पहाड़ की ढलान पर पहुँचा तो चेलों की सारी भीड़ उन सब सामर्थ्य के कामों के लिए जो उन्होंने देखे थे, बड़े आनन्द के साथ ऊँची आवाज़ में परमेश्वर की स्तुति करने लगीः

38“धन्य है वह राजा जो प्रभु के नाम से आता है; स्वर्ग पर शान्ति और सर्वोच्च स्थान पर महिमा हो!”

39भीड़ में खड़े कुछ फरीसियों ने उससे कहा, “हे गुरु, अपने चेलों को डांट।”

40उसने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तुमसे कहता हूँ कि यदि ये चुप रहें तो पत्थर चिल्ला उठेंगे।”

41जब वह निकट पहुँचा तो नगर को देखकर उसपर रोया

42और कहा, “यदि आज के दिन तू, हां तू ही, उन बातों को जानता जो शान्ति की हैं-परन्तु अब वे तेरी आंखों से छिप गई है।

43क्योंकि तुझपर वे दिन आएंगे कि तेरे शत्रु तेरे सामने मोर्चा बाँधेंगे और तुझे चारों ओर से घेर कर दबाएंगे।

44तब वे तुझे और तेरे बालकों को मिट्टी में मिलाकर चौरस कर देंगे और तुझमें एक पत्थर पर दूसरा पत्थर भी न छोड़ेंगे, क्योंकि तूने उस अवसर को जिसमें तुझपर कृपा की गई, न पहिचाना।”

45तब वह मन्दिर में गया और व्यापारियों को यह कहकर बाहर निकालने लगाः

46“लिखा है, ‘मेरा घर प्रार्थना का घर होगा;’ परन्तु तुमने उसे डाकुओं की खोह बना दिया है।”

47वह प्रतिदिन मन्दिर में उपदेश दिया करता था; पर मुख्य याजक, शास्त्री और लोगों के प्रमुख उसे नष्ट करने का प्रयत्न करने लगे।

48परन्तु उन्हें ऐसा करने का कोई अवसर न मिला, क्योेंकि सब लोग उसकी बातों को बड़े चाव से सुनते थे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)