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नया नियम · लूका · अध्याय 20 / 24

लूका 20

1ऐसा हुआ कि एक दिन जब वह मन्दिर में लोगों को उपदेश दे रहा था और सुसमाचार प्रचार कर रहा था तो मुख्य याजकों और शास्त्रियों ने कुछ प्राचीनों के साथ आकर उसका सामना किया,

2और उससे कहा, “हमें बता कि तू ये कार्य किस अधिकार से करता है, अथवा वह कौन है जिसने तुझे यह अधिकार दिया है?”

3उसने उन्हें उत्तर दिया, “मैं भी तुमसे एक प्रशन पूछता हूँ। तुम मुझे बताओः

4यूहन्ना का बपतिस्मा क्या स्वर्ग से था, या मनुष्य की ओर से?”

5तब वे आपस में तर्क करने लगे, “यदि हम कहें, ‘स्वर्ग से,’ तो वह कहेगा, ‘तुमने उसपर विश्वास क्यों नहीं किया?’

6परन्तु यदि हम कहें, “मनुष्यों की ओर से,’ तो सब लोग पत्थराव करके हमें मार डालेंगे, क्योंकि उनको निश्चय है कि यूहन्ना एक नबी था।”

7इसपर उन्होंने उत्तर दिया कि नहीं मालूम कि वह कहां से था।

8यीशु ने उनसे कहा, “मैं भी तुम्हें नहीं बताऊँगा कि किस अधिकार से मैं ये कार्य करता हूँ।”

9तब वह लोगों से यह दृष्टान्त कहने लगाः “किसी मनुष्य ने दाख-उघान लगाकर उसे किसानों को किराए पर दिया और स्वयं लम्बी यात्रा पर निकल गया।

10फसल के समय उसने किसानों के पास एक दास को भेजा कि वे उस उघान की फसल में से कुछ उसे दें, पर उन्होंने उसे मार-पीट कर खाली हाथ लौटा दिया।

11इसपर उसने दूसरे दास को भेजा, पर उन्होंने उसे भी मार-पीट और अपमानित करके खाली हाथ भेजा।

12इसी प्रकार उसने तीसरे को भेजा और उन्होेंने उसको भी घायल करके भगा दिया।

13तब उघान के स्वामी ने कहा, ‘मैं क्या करूँ? मैं अपने प्रिय पुत्र को भेजूँगा, कदाचित् वे उसका सम्मान करे।’

14परन्तु जब किसानों ने उसे देखा तो आपस में यह कहकर निश्चय किया, ‘यह तो उत्तराधिकारी है। आओ, हम इसे मार डालें कि उत्तराधिकार हमारा हो जाए।’

15उन्होंने उसे दाख-उघान से निकालकर मार डाला। अतः उघान का स्वामी उनके साथ क्या करेगा?

16वह आकर उन किसानों को नाश करेगा और दाख-उघान अन्य लोगों को सौंपेगा!” यह सुनकर उन्होंने कहा, “ऐसा कभी न हो!”

17परन्तु उसने उनकी ओर देखकर कहा, “तो यह क्या लिखा है, ‘जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने ठुकरा दिया था, वही कोने का पत्थर बन गया।’

18प्रत्येक जो उससे टकराएगा चकनाचूर हो जाएगा, परन्तु जिसपर वह गिरेगा उसे धूल के समान पीस डालेगा।”

19उसी क्षण शास्त्रियों और मुख्य याजकों ने उसे पकड़ने का प्रयत्न किया, क्योंकि वे समझ गए थे कि उसने यह दृृष्टान्त हमारे ही विरोध में कहा है, परन्तु लोगों से डर गए।

20वे उसकी ताक में लगे रहे, और ऐसे भेदिए भेजे जो धार्मिक होने का ढोंग रचकर उसके किसी कथन से उसे पकड़ें और उसे राज्यपाल के हाथ और अधिकार में सौंप दे।

21उन्होंने यह कहकर उससे प्रशन किया: “हे गुरु, हम जानते हैं कि तू ठीक बोलता है व सही शिक्षा देता है, और तू किसी का पक्ष नहीं लेता वरन् परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है।

22कैसर को कर चुकाना उचित है या नहीं?”

23पर उसने उनकी चतुराई को जानकर उनसे कहा,

24“मुझे एक दीनार दिखाओ। इसपर आकृति और लेख किसके हैं?” उन्होंने कहा, “कैसर के।”

25उसने उनसे कहा, “तो जो कैसर का है, वह कैसर को दो; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो।’

26वे लोगों के समक्ष उसे किसी बात में न पकड़ सके, परन्तु उसके उत्तर से अचम्भित होकर चुप रहे।

27फिर कुछ सदूकी जिनका कहना है कि पुनरुत्थान है ही नहीं, उसके पास आए।

28उन्होंने उससे प्रशन किया और कहा, “हे गुरु, मूसा ने लिखा है, ‘यदि कोई मनुष्य जिसकी पत्नी हो, निःसन्तान मर जाए तो उसका भाई उस स्त्री से विवाह करके अपने भाई के लिए सन्तान उत्पन्न करे।’

29अब ऐसा हुआ कि सात भाई थे। पहले भाई ने विवाह किया पर वह निःसन्तान मर गया।

30और दूसरे ने भी,

31और तीसरे ने भी उस स्त्री को अपनी पत्नी बनाया। इसी प्रकार सातों निःसन्तान मर गए।

32अन्त में वह स्त्री भी मर गई।

33इसलिए जब पुनरुत्थान होगा तो वह किसकी पत्नी होगी, जब कि सातों ने उसे अपनी-अपनी पत्नी बनाया था?”

34यीशु ने उनसे कहा, “इस युग की सन्तानें शादी-ब्याह करती व करवाती हैं,

35परन्तु वे जो उस युग में प्रवेश करने और मरे हुओं में से जी उठने के योग्य ठहरे हैं, न तो शादी-ब्याह करेंगे और न करवाएंगे,

36न तो वे फिर कभी मरेंगे, क्योंकि वे पुनरुत्थान की सन्तान बनकर स्वर्गदूतों के समान और परमेश्वर की सन्तान होंगे।

37मरे हुए तो जिलाए जाते है। मूसा भी इस बात को जलती झाड़ी वाले स्थल में प्रकट करता हैः यहां वह प्रभु को इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर और याकूब का परमेश्वर कहता है।

38वह मरे हुओं का नहीं, परन्तु जीवितों का परमेश्वर है, क्योंकि सब उसके लिए जीवित रहते है।”

39कुछ शास्त्रियों ने उत्तर दिया, “हे गुरु, तूने ठीक कहा है।”

40इसके बाद उनको किसी भी बात में उससे प्रशन पूछने का साहस नहीं हुआ।

41उसने उनसे कहा, “यह कैसी बात है कि वे कहते हैं कि मसीह तो दाऊद का पुत्र है?

42क्योंकि दाऊद स्वयं भजन संहिता की पुस्तक में कहता है, ‘प्रभु ने मेरे प्रभु से कहाः मेरे दाहिने हाथ बैठ,

43जब तक कि मैं तेरे शत्रुओं को तेरे चरणों की चौकी न बना दूँ।’

44इस प्रकार दाऊद तो उसे ‘प्रभु’ कहता है। अतः वह उसका पुत्र कैसे हुआ?”

45जब कि सब लोग सुन रहे थे तो उसने चेलों से कहा,

46“शास्त्रियों से सतर्क रहो जिनको लम्बे-लम्बे चोगे पहन कर इधर-उधर घूमना, बाज़ारों में सम्मान के साथ नमस्कार पाना, आराधनालयों में प्रमुख स्थान पर बैठना और भोज के समय सम्मानित स्थान पाना प्रिय लगता है,

47और जो विधवाओं के घरों को हड़प जाते और दिखाने के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करते हैं; उन्हें और भी अधिक दण्ड मिलेगा।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)