नया नियम · लूका · अध्याय 21 / 24
लूका 21
1उसने आंखें ऊपर उठाईं और देखा कि धनवान अपना-अपना दान भण्डार में डाल रहे थे।
2उसने एक कंगाल विधवा को भी तांबे के दो छोटे-छोटे सिक्के डालते देखा।
3तब उसने कहा, “मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि इस कंगाल विधवा ने उन सबसे बढ़कर दान दिया है,
4क्योंकि उन सबने अपनी-अपनी बचत में से दान दिया, परन्तु इसने अपने कंगालपन में से अपनी जीविका का जो कुछ था, सब डाल दिया।”
5जब कुछ लोग मन्दिर के विषय में बातें कर रहे थे कि वह सुन्दर पत्थरों और मन्नत की भेंटों द्वारा कैसे बनाया गया है, तो उसने कहा,
6“इन वस्तुओं के सम्बन्ध में जिन्हें तुम देख रहे हो, ऐसे दिन आएंगे जब कि एक पत्थर के ऊपर दूसरा पत्थर न रहेगा जो ढाया न जाएगा।”
7तब उन्होंने यह कहकर उससे प्रशन कियाः “हे गुरु, ये बातें कब होंगी? और जब ये बातें होनेे को हों तो क्या चिह्न होगा?”
8उसने कहा, “सावधान रहो, कहीं तुम भ्रमित न किये जाओ, क्योंकि बहुत-से लोग मेरे नाम से आकर कहेंगे, ‘मैं वही हूँ,’ और ‘समय निकट आ पहुँचा है’, ‘पर तुम उनके पीछे चले न जाना।
9जब तुम लड़ाइयों और उपद्रवों की चर्चा सुनो तो भयभीत न होना; इन बातों का पहले होना आवश्यक है, परन्तु उस समय एकाएक अन्त न होगा।”
10तब वह उनसे कहने लगा, “जाति के विरुद्ध जाति और राज्य के विरुद्ध राज्य उठ खड़े होंगे,
11भयंकर भूकम्प होंगे, जगह-जगह महामारी होंगी व अकाल पड़ेंगे, आकाश में भयंकर बातें और बड़े-बड़े चिह्न दिखाई देंगे।
12पर इन सब बातों के होने से पहले मेरे नाम के कारण वे तुम्हें पकड़ेंगे, तुम्हें सताएंगे, सभागृहों में ले जाएंगे और बन्दीगृहों में डालेंगे और राजाओं व अधिकारियों के पास ले जाएंगे।
13इससे तुम्हें साक्षी देने का अवसर मिलेगा।
14अतः अपने मन में बचाव के लिए पहले से तैयारी न करना।
15क्योंकि मैं तुम्हें ऐसी बोली और ऐसी बुद्धि दूँगा कि शत्रुओं में से कोई भी तुम्हारा न तो सामना और न खण्डन ही कर सकेगा।
16परन्तु तुम्हारे माता-पिता, भाई-सम्बन्धी और मित्र भी धोखा देकर तुम्हें पकड़वाएंगे और तुममें से कितनों को मरवा डालेंगे।
17मेरे नाम के कारण सब तुमसे घृणा करेंगे।
18फिर भी तुम्हारा एक बाल भी बांका न होगा।
19परन्तु अपने धीरज द्वारा तुम अपने प्राणों को बचाओगे।
20“परन्तु जब तुम यरूशलेम को सेनाओं से घिरा हुआ देखो, तब जान लेना कि उसका उजड़ जाना निकट है।
21तब वे जो यहूदा में हों, पहाड़ियों पर भाग जाएं; जो नगर के भीतर हों, वे बाहर निकल जाएं; और वे जो गावों में हों, नगर में न लौटें,
22क्योंकि ये बदला लेने के दिन होंगे कि वे सब बातें जो लिखी गई हैं पूरी हो जाए।
23उन दिनों जो गर्भवती हों और दूध पिलाती हों, उनके लिए हाय! क्योंकि देश में बड़ा क्लेश होगा और इस जाति पर प्रकोप होगा।
24वे तलवार से घात किए जाएंगे और सब देशों में बन्दी बनाकर पहुँचाए जाएंगे। जब तक गैरयहूदियों का समय पूरा न हो, यरूशलेम गैरयहूदियों के पैरों के नीचे रौंदा जाएगा।
25“सूर्य, चन्द्रमा और तारों में चिह्न दिखाई देंगे, और पृथ्वी पर जातियों के मध्य त्रस और समुद्र की गरज और लहरों के कोलाहल से उनमें घबराहट होगी,
26भय और संसार पर घटित होने वाली बातों की प्रतीक्षा करते-करते मुनज्यों के हाथ-पैर ढीले पड़ जाएंगे क्योंकि आकाश की शक्तियां हिलाई जाएंगी।
27तब वे मनुष्य केे पुत्र को सामर्थ्य के साथ बादलों पर बड़ी महिमा के साथ आते हुए देखेंगे।
28परन्तु जब ये घटनाएं घटने लगें तो सीधे होकर अपने सिर उठाना, क्योंकि तुम्हारा छुटकारा निकट होगा।”
29तब उसने उनसे एक दृष्टान्त कहाः “अंजीर के पेड़ और अन्य सब पेड़ों को देखो।
30ज्यों ही उनमें कोपलें आती हैं, तुम देखकर स्वयं जान जाते हो कि अब ग्रीज्मकाल निकट आ गया है।
31इसी प्रकार तुम भी, जब ये सब होते देखो, तो जान लेना कि परमेश्वर का राज्य निकट है।
32मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जब तक सब बातें घटित न हो लें, इस पीढ़ी का अंत न होगा।
33आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरा वचन कभी नहीं टलेगा।”
34“सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे हृदय दुराचार, पियक्कड़पन और जीवन की चिन्ताओं के भार से दब जाएं और वह दिन एकाएक तुमपर फन्दे की भांति आ जाए,
35क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी पर रहने वाले सब लोगों पर वह इसी प्रकार आ पड़ेगा।
36परन्तु तुम हर समय सावधान होकर प्रार्थना में लगे रहो जिससे कि इन सब बातों से बच निकलने और मनुष्य के पुत्र के सामने खड़े होने के लिए तुममें सामर्थ्य हो।”
37दिन को तो वह मन्दिर में जाकर उपदेश दिया करता था, परन्तु संध्या समय बाहर निकलकर सारी रात उस पर्वत पर जो जैतून कहलाता है, बिताता था।
38सब लोग सुबह तड़के उठकर उसके पास मन्दिर में उसकी सुनने के लिए आया करते थे।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)