नया नियम · लूका · अध्याय 22 / 24
लूका 22
1अब अख़मीरी रोटी का पर्व, जो फसह कहलाता है, आ रहा था।
2और मुख्य याजक और शास्त्री इस खोज में लगे हुए थे कि उसे कैसे मार डालें, क्योंकि वे लोगों से डरते थे।
3तब शैतान उस यहूदा में समाया जो इस्करियोती कहलाता था और जो बारहों में से एक था।
4उसने जाकर मुख्य याजकों और अधिकारियों के साथ बातचीत की कि यीशु को किस प्रकार उनके हाथ पकड़वाए।
5इस पर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे रुपये देने को सहमत हुए।
6उसने यह बात मान ली और वह इस सुअवसर की ताक में रहने लगा कि भीड़ से कहीं अलग उसे धोखे से पकड़वा दे।
7तब अख़मीरी रोटी के पर्व का वह दिन आया जिसमें फसह का मेमना बलि करना पड़ता था।
8उसने पतरस और यूहन्ना को यह कहकर भेजाः “जाकर हमारे लिए फसह तैयार करो कि हम उसे खाए।”
9तब उन्होंने उससे पूछा, “तू कहां चाहता है कि हम उसे तैयार करें?”
10उसने उनसे कहा, “देखो, जब तुम नगर में प्रवेश करोगे, तुम्हें एक आदमी मिलेगा जो पानी का घड़ा लिए होगा। तुम भी उसके पीछे-पीछे उस घर में चले जाना जिसमें वह जाए।
11तुम उस घर के स्वामी से कहना, ‘गुरु तुझसे कहता है कि वह अतिथि-गृह कहां है जहां मैं अपने चेलों के साथ फसह खाऊं?’
12और वह तुम्हें सजाढाया एक बड़ा ऊपरी कक्ष दिखाएगाः वहीं तैयारी करना।”
13उन्होंने जाकर सब कुछ वैसा ही पाया जैसा उसने बताया था, और उन्होंने वहां फसह तैयार किया।
14जब समय हुआ तो यीशु भोजन करने बैठा और प्रेरित भी उसके साथ बैठे।
15उसने उनसे कहा, “अपने दुख उठाने से पूर्व मेरी बड़ी अभिलाजा थी कि मैं तुम्हारे साथ फसह खाऊँ,
16क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक यह परमेश्वर के राज्य में पूरा न हो जाए, मैं इसे फिर कभी नहीं खाऊँगा।”
17प्याला लेकर जब उसने धन्यवाद दिया तो कहा, “इसे लो और आपस में बांटो,
18क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि जब तक परमेश्वर का राज्य न आ जाए, मैं दाखरस नहीं पीऊँगा।”
19फिर रोटी लेकर जब उसने धन्यवाद दिया तो उसे तोड़कर उनको दिया और कहा, “यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिए दी जाती है; मेरी स्मृति में ऐसा ही किया करो।”
20जब वे खा चुके तो उसी प्रकार उसने प्याला लेकर कहा, “यह प्याला जो तुम्हारे लिए उण्डेला गया है मेरे लहू में एक नई वाचा है।
21पर देखो, वह जो मुझे धोखे से पकड़वाने वाला है, उसका हाथ मेरे साथ मेज़ पर है।
22क्योंकि मनुष्य का पुत्र तो जैसा निशिचत किया गया है, जाता ही है, परन्तु उस मनुष्य के लिए हाय जिसके द्वारा वह धोखे से पकड़वाया जाता है!”
23तब वे आपस में पूछताछ करने लगे कि हममें से कौन यह कार्य करेगा।
24उनमें एक विवाद भी उठ खड़ा हुआ कि उनमें सबसे बड़ा कौन समझा जाएगा।
25उसने उनसे कहा, “गैरयहूदियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं; और जिनको उनपर अधिकार होता है, वे ‘परोपकारी’ कहलाते है।
26परन्तु तुममें ऐसा न हो। वह जो तुममें सबसे बड़ा है, वह सबसे छोटा बने; और जो प्रमुख है, वह सेवक के समान बने।
27क्योंकि बड़ा कौन है, जो भोजन करने बैठा है, या वह जो भोजन परोसता है? क्या वह नहीं जो भोजन करने बैठता है? परन्तु मैं तुम्हारे मध्य में परोसने वाले के समान हूँ।
28तुम वे हो जो मेरी परीक्षाओं में मेरे साथ रहे।
29जैसे मेरे पिता ने मुझे एक राज्य दिया है, वैसे ही मैं भी तुम्हें देता हूँ,
30कि तुम मेरे राज्य में मेरी मेज़ पर खाओ और पीओ तथा न्याय-आसन पर बैठकर इस्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करो।
31“शमौन, हे शमौन, देख! शैतान ने तुम लोगों को गेहूँ के समान फटकने के लिए आज्ञा मांग ली है,
32परन्तु मैंने तेरे लिए प्रार्थना की है कि तेरा विश्वास चला न जाए। अतः जब तू फिरे तो अपने भाइयों को स्थिर करना।”
33उसने उससे कहा, “हे प्रभु, मैं तेरे साथ जेल जाने और मरने को भी तैयार हूँ््”
34फिर उसने कहा, “पतरस, मैं तुझसे कहता हूँ कि जब तक तू इस बात से कि मुझे जानता है आज तीन बार इनकार न कर लेगा, मुर्ग बांग न देगा।”
35उसने उनसे कहा, “जब मैंने तुम्हें बिना बटुआ, बिना थैली और बिना चप्पलों के भेजा था तो क्या तुम्हें किसी बात की घटी हुई थी?” उन्होंने कहा, “नहीं, किसी वस्तु की नही।”
36उसने उनसे कहा, “परन्तु अब जिसके पास बटुआ हो, साथ लेकर जाए; उसी प्रकार झोला भी ले जाए; और जिसके पास तलवार नहीं, अपने वस्त्र को बेचकर एक मोल ले।
37क्योंकि मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह बात जो लिखी गई है, वह मुझमें पूरी होगी, अर्थात् ‘वह अपराधियों के साथ गिना गया,’ क्योंकि जो बातें मेरे सम्बन्ध में कही गई हैं, पूरी होने पर है।”
38उन्होंने कहा, “हे प्रभु, देख, यहां दो तलवारें है।” उसने उनसे कहा, “पर्याप्त है।”
39तब वह बाहर निकलकर अपनी रीति के अनुसार जैतून के पर्वत की ओर चला, और चेले भी उसके पीछे चल पड़े।
40जब वह वहां पहुंचा तो उसने कहा, “प्रार्थना करो कि तुम परीक्षा में न पड़ो।”
41वह उनसे अलग लगभग पत्थर फेंकने की दूरी तक गया और घुटने टेककर प्रार्थना करने लगा,
42“हे पिता, यदि तू चाहे तो इस प्याले को मुझसे हटा ले; फिर भी मेरी इच्छा नहीं, पर तेरी इच्छा पूरी हो।”
43तब स्वर्ग से एक दूत उसे दिखाई दिया जो उसे सामर्थ्य देता था।
44यीशु व्याकुल होकर आग्रहपूर्वक प्रार्थना कर रहा था, और उसका पसीना रक्त की बूँद के समान भूमि पर गिर रहा था।
45जब वह प्रार्थना करके उठा और चेलों के पास आया तो उसने देखा कि वे शोकित होकर सो रहे थे।
46उसने उनसे कहा, “तुम क्यों सो रहे हो? उठो, प्रार्थना करो कि तुम परीक्षा में न पड़ो।”
47जबकि वह बातें कर ही रहा था, देखो, एक भीड़ आ पहुँची और बारहों में से एक जो यहूदा कहलाता था, उनके आगे-आगे चला आ रहा था। वह यीशु के पास आया कि उसे चूमे,
48परन्तु यीशु ने उससे कहा, “यहूदा, क्या तू मनुष्य के पुत्र को चूमकर धोखे से पकड़वा रहा है?”
49जो उसके आस-पास खड़े थे जब उन्होंने देखा कि क्या होने जा रहा है तो कहा, “हे प्रभु, क्या हम तलवार चलाएं?”
50उनमें से किसी एक ने महायाजक के दास पर तलवार चलाकर उसका दाहिना कान उड़ा दिया।
51परन्तु यीशु ने कहा, “ठहरो, ऐसा न करो!” उसने उसका कान छूकर अच्छा कर दिया।
52यीशु ने मुख्य याजकों और मन्दिर के अधिकारियों तथा प्राचीनों से जो उसके विरुद्ध उठकर आए थे, कहा, “क्या तुम तलवार और डण्डे लेकर किसी डाकू को पकड़ने आए हो?
53जब मैं प्रतिदिन मन्दिर में तुम्हारे साथ रहा तो तुमने मुझपर हाथ नहीं डाला, परन्तु यह घड़ी और अंधकार का अधिकार तुम्हारा है।”
54वे उसे बन्दी बनाकर ले गए और महायाजक के घर ले आए; परन्तु पतरस दूर ही दूर उसके पीछे चला आ रहा था।
55तत्पश्चात जब वे आंगन के मध्य आग जलाकर बैठ चुके तो पतरस भी उनके साथ बैठा हुआ था।
56तब एक दासी ने आग के प्रकाश में उसे बैठे देखकर उसकी ओर ध्यान से देखते हुए कहा, “यह भी तो उसके साथ था!”
57परन्तु उसने यह कहकर उससे इनकार कियाः “हे नारी, मैं उसे नहीं जानता।”
58कुछ देर पश्चात् किसी और ने उसे देखा और कहा, “तू भी उनमें से एक है।” परन्तु पतरस ने कहा, “नहीं जी, मैं नहीं हूँ!”
59लगभग एक घण्टा बीत जाने के बाद एक और मनुष्य जोर देकर कहने लगा, “निश्चय यह मनुष्य भी उसके साथ था, क्योंकि यह भी गलीली है।”
60परन्तु पतरस ने कहा, “हे भाई, मैं नहीं जानता तू क्या कह रहा है!” तत्काल जब वह बातें कर ही रहा था, मुर्ग ने बांग दी।
61तब प्रभु ने मुड़कर पतरस को देखा। पतरस को प्रभु की बात स्मरण हो आई कि उसने यह कहा थाः “आज मुर्ग़ के बांग देने से पहले तू तीन बार मेरा इनकार करेगा।”
62और वह बाहर जाकर फूट-फूटकर रोया।
63वे लोग जो यीशु को पकड़े हुए थे, उसका ठट्ठा करके उसे पीट रहे थे।
64वे उसकी आंखें ढांपकर और यह कहकर उससे पूछ रहे थे, “भविष्यवाणी कर, किसने तुझे मारा?”
65वे उसकी निन्दा करके उसके विरुद्ध कई और बातें कह रहे थे।
66जब दिन हुआ तो लोगों के प्राचीनों की महासभा बुलाई गई जिसमें मुख्य याजक और शास्त्री भी थे और वे उसे महासभा में यह कहते हुए ले गएः
67“यदि तू मसीह है तो हमें बता।” परन्तु उसने उनसे कहा, “यदि मैं कहूँ, फिर भी तुम विश्वास नहीं करोगे,
68और यदि मैं प्रशन पूछूँ तो तुम उत्तर नहीं दोगे।
69परन्तु अब से मनुष्य का पुत्र परमेश्वर की सत्ता की दाहिनी ओर बैठाया जाएगा।”
70तब सबने पूछा, “तो क्या तू परमेश्वर का पुत्र है?” उसने कहा, हां, मैं हूँ।”
71उन्होंने कहा, “अब हमें आगे साक्षी की क्या आवश्यकता है? क्योंकि हमने स्वयं उसके मुंह से सुन लिया।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)