Loading account

नया नियम · लूका · अध्याय 23 / 24

लूका 23

1तब सारी सभा उठकर उसे पिलातुस के पास ले गई।

2वे यह कहकर उसपर दोष लगाने लगेः “हमने इस मनुष्य को देशवासियों को बहकाते और कैसर को कर देने से मना करते और यह कहते पाया कि वह स्वयं मसीह, एक राजा है।”

3पिलातुस ने उससे पूछा, “क्या तू यहूदियों का राजा है? उसने उसे उत्तर दिया, “ऐसा ही है, जैसा तू कह रहा है।”

4पिलातुस ने मुख्य याजकों और भीड़ से कहा, “मैं इस मनुष्य में कोई दोष नहीं पाता।”

5परन्तु वे यह कहकर दबाव डालते रहे कि वह गलील से लेकर समस्त यहूदिया में शिक्षा दे देकर लोगों को भड़काता है, यहां तक कि इस स्थान में भी।

6जब पिलातुस ने यह सुना तो पूछा कि क्या यह मनुष्य गलीली है?

7जब उसने जाना कि वह हेरोदेस के राज्य-क्षेत्र का रहने वाला है तो उसने उसे हेरोदेस, जो स्वयं भी उस समय यरूशलेम में था, के पास भेज दिया।

8जब हेरोदेस ने यीशु को देखा तो अत्यन्त प्रसन्न हुआ क्योंकि वह उसे बहुत दिनों से देखना चाहता था, क्योंकि वह उसके विषय में सुनता चला आ रहा था और उसके द्वारा कुछ चिह्न दिखाए जाने की आशा किया करता था।

9उसने उससे बहुत-से प्रशन पूछे, परन्तु यीशु ने कोई उत्तर न दिया।

10मुख्य याजक और शास्त्री वहां खड़े होकर बड़ी उग्रता से दोष लगा रहे थे।

11तब हेरोदेस ने अपने सैनिकों सहित उसे ठट्ठों में उड़ाने और उसके साथ दुर्व्यवहार करने के पश्चात् उसे भड़कीला वस्त्र पहनाया और पिलातुस के पास लौटा दिया।

12उसी दिन से हेरोदेस और पिलातुस परस्पर मित्र बन गए। इससे पहले उनमें शत्रुता थी।

13पिलातुस ने मुख्य याजकों, शासकों तथा लोगों को बुलाया,

14और उनसे कहा, “तुम इस मनुष्य को मेरे पास यह कहकर लाए हो कि यह लोगों को विद्रोह करने के लिए भड़काता है, और देखो, तुम्हारे समक्ष इस मनुष्य को जांचने पर मैंने इसपर उन बातों का कोई अपराध नहीं पाया जिनका तुम दोष लगाते हो।

15नहीं, न तो हेरोदेस ने ही ऐसा कुछ पाया, क्योंकि उसने इसे हमारे पास लौटा दिया है; और अब देखो, इसने मृत्यु-दण्ड के योग्य कोई कार्य नहीं किया है।

16अतः मैं इसे प्रताड़ित करके छोड़ दूँगा।”

17पर्व के दिन पिलातुस को उनके लिए एक व़फ़ैदी को छोड़ना पड़ता था।ह्

18परन्तु वे एकसाथ चिल्ला उठे, “इस मनुष्य का काम तमाम कर और हमारे लिए बरअब्बा को छोड़ दे!”-

19यह वही था जो नगर में बलवा कराने और हत्या के अपराध में बन्दीगृह में डाला गया था-

20पिलातुस ने यीशु को छोड़ने की इच्छा से लोगों को फिर समझाया,

21परन्तु वे यह कहते हुए चिल्लाते रहेः “उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर!”

22तब उसने तीसरी बार उनसे कहा, “क्यों? इस मनुष्य ने क्या बुराई की है? मैंने इसमें मृत्यु-दण्ड के योग्य कोई अपराध नहीं पाया है; अतः ताड़ना देकर मैं उसे छोड़ दूंगा।”

23परन्तु वे ऊँची आवाज में चिल्ला-चिल्लाकर पीछे पड़ गए कि वह क्रूस पर चढ़ाया जाए; और उनका स्वर प्रबल होने लगा।

24पिलातुस ने निर्णय दिया कि उनकी मांग पूरी की जाए।

25तब उसने उस मनुष्य को जो बलवा और अपराध के कारण बन्दी बनाया गया था, उनकी मांग के अनुसार, मुक्त कर दिया, परन्तु यीशु को उनकी इच्छा पर छोड़ दिया।

26जब वे उसे ले गए तो उन्हाेंने गांव की ओर से आते हुए शमौन नामक एक कुरेनी को पकड़ा और क्रूस उसके कंधे पर रखा कि वह यीशु के पीछे-पीछे ले चले।

27उसके पीछे लोगों की एक बड़ी भीड़ चली आ रही थी और उनमें स्त्रियां भी थीं जो उसके लिए रो-रोकर विलाप कर रही थी।

28परन्तु यीशु ने उनकी ओर पलटकर कहा, “यरूशलेम की बेटियो, मेरे लिए रोना बन्द करोे, परन्तु अपने और अपने बच्चों के लिए रोओ।

29क्योंकि देखो, ऐसे दिन आ रहे है। जब लोग कहेंगे, ‘धन्य हैं वे बांझ और वे गर्भ जिन्होंने जन्म नहीं दिया, और वे स्तन जिन्होंने कभी दूध नहीं पिलाया।’

30तब वे पहाड़ों से कहने लगेंगे, ‘हमपर गिर पड़ो,’ और पहाड़ियों से, ‘हमें ढांप लो।’

31क्योंकि यदि वे हरे पेड़ के साथ ऐसा करते हैं, तो सूखे के साथ क्या कुछ न होगा?”

32वे अन्य दो को भी, जो अपराधी थे, उसके साथ मृत्यु-दण्ड देने के लिए ले जा रहे थे।

33जब वे उस स्थान पर जो खोपड़ी कहलाता है पहुँचे, तो वहां पर उन्होंने उसे और उसके साथ दो अपराधियों को भी क्रूस पर चढ़ाया, एक को दाहिनी और दूसरे को बाईं ओर।

34परन्तु यीशु ने कहा, “हे पिता इन्हें क्षमा कर; क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे है।” और उन्होंने चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े आपस में बांट लिए।

35लोग समीप खड़े होकर देख रहे थे, यहां तक कि अधिकारी भी यह कहकर उस पर ताना मार रहे थेः “इसने अन्य लोगों को बचाया; यदि यह परमेश्वर का मसीह अर्थात् उसका चुना हुआ है, तो अपने आप को बचाए।”

36सैनिक भी उसके पास आकर ठट्ठा करने और सिरका पिलाकर

37कहने लगे, “यदि तू यहूदियों का राजा है तो अपने आप को बचा।”

38और उसके ऊपर यह दोष-पत्र भी लगा थाः “यह यहूदियों का राजा है।”

39जो वहां लटकाए गए थे उनमें से एक अपराधी यह कहकर उसकी निन्दा कर रहा थाः “क्या तू मसीह नहीं? अपने आप को और हमें बचा!”

40पर दूसरे ने उसे डांटकर कहा, “क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता? तू भी तो इसी निर्णय के अन्तर्गत दण्ड पा रहा है

41और वास्तव में हमारे साथ तो न्याय हुआ, क्योंकि हम तो अपनी करनी का उचित फल भोग रहे हैं, परन्तु इस मनुष्य ने कोई अपराध नहीं किया।”

42तब उसने कहा, “यीशु, जब तू अपने राज्य में आए तो मुझे स्मरण करना!”

43उसने उससे कहा, “मैं तुझसे सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।”

44अब यह दोपहर के लगभग बारह बजे का समय था और तीन बजे दिन तक सारे देश में अन्धकार छाया रहा

45क्योंकि सूर्य का प्रकाश जाता रहा। तब मन्दिर का परदा बीच से फट गया

46और यीशु ने ऊँचे स्वर में पुकार कर कहा, “हे पिता, मैं अपना आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूँ।” यह कहकर उसने प्राण त्याग दिया।

47जब सूबेदार ने यह सब देखा, तो वह यह कहकर परमेश्वर की बड़ाई करने लगाः “निश्चय यह मनुष्य निर्दोष था।”

48तब सारी भीड़ जो यह दृशय देखने एकत्रित हुई थी, जो कुछ हुआ उसे जब देख चुकी तो अपनी छाती पीटती हुई लौटने लगी।

49उसके सब परिचित जन और वे स्त्रियां जो गलील से उसके साथ आई थीं, कुछ दूर खड़ी होकर यह सब देख रही थी।

50देखो, यूसुफ नामक एक मनुष्य जो महासभा का एक सदस्य, जो सज्जन व धर्मी पुरुष था-

51उसने उनकी योजना और कार्य के प्रति सहमति प्रकट नहीं की थी-वह यहूदियों के एक नगर अरमतियाह का रहने वाला था और परमेश्वर के राज्य की प्रतीक्षा कर रहा था।

52इस मनुष्य ने पिलातुस के पास जाकर यीशु का शव मांगा।

53उसने उसे उतारकर मलमल के कपड़े में लपेटा और एक कब्र में रखा जो चट्टान काटकर बनाई गई थी, जिसमें कभी कोई नहीं रखा गया था।

54वह तैयारी का दिन था और सब्त का दिन प्रारम्भ होने पर था।

55उन स्त्रियों ने, जो गलील से उसके साथ आई थीं, पीछे-पीछे जाकर उस कब्र को देखा और यह भी देखा कि उसका शव कैसे रखा गया है।

56तब उन्होंने लौटकर सुगन्धित मसाले और इत्र तैयार किए। फिर आज्ञा के अनुसार सब्त के दिन उन्होंने विश्राम किया।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)