नया नियम · लूका · अध्याय 8 / 24
लूका 8
1इसके शीघ्र ही पश्चात् ऐसा हुआ कि वह परमेश्वर के राज्य का प्रचार करते और सुसमाचार सुनाते हुए नगर-नगर और गांव-गांव जाने लगा और वे बारह भी उसके साथ रहे।
2और कुछ स्त्रियां भी जो दुष्टात्माओं और रोगों से चंगी की गई थीं साथ चलीं, जिनमें मरियम जो मगदलीनी कहलाती थी जिसमें से सात दुष्टात्माएं निकाली गई थीं,
3और हेरोदेस के भण्डारी खुज़ा की पत्नी योअन्ना और सूसन्नाह तथा बहुत-सी अन्य स्त्रियां थी। वे अपने व्यक्तिगत साधनों से उनकी सेवा करती थी।
4जब बड़ी भीड़ इकट्ठा हो रही थी और विभिन्न नगरों से लोग उसके पास चले आ रहे थे तो उसने उनसे दृष्टान्त में कहा,
5“एक बोने वाला बीज बोने निकला। बोते हुए कुछ मार्ग के किनारे गिरा और पैरों से रौंदा गया तथा पक्षियों ने आकर उसे चुग लिया।
6कुछ पथरीली भूमि पर गिरा और उगते ही सूख गया क्योंकि उसमें नमी न थी।
7कुछ कँटीली झाड़ियाें में गिरा और झाड़ियों ने साथ-साथ बढ़कर उसे दबा दिया।
8अन्य बीज अच्छी भूमि पर गिरा और उगकर सौ गुणा फल लाया।” यह कहकर उसने ऊंची आवाज़ में कहा, “जिसके सुनने के कान हों वह सुने।”
9उसके चेले उससे प्रशन करने लगे कि इस दृष्टान्त का अर्थ क्या हो सकता है?
10उसने कहा, “तुमको यह प्रदान किया गया है कि तुम परमेश्वर के राज्य के रहस्यों को जानो, पर दूसरों को दृष्टान्तों में ही बताया जाता है कि वे देखते हुए न देखें और सुनते हुए न सुने।
11दृष्टान्त यह हैः बीज परमेश्वर का वचन है।
12मार्ग के किनारे वाले वे हैं जिन्होंने वचन तो सुना पर शैतान आकर उनके हृदयों में से वचन को उठा ले जाता है कि वे विश्वास न करें और उनका उद्धार न हो।
13चट्टान पर के वे हैं जो वचन सुनने पर उसे बड़े आनन्द से ग्रहण तो करते हैं पर जड़ मज़बूत न होने के कारण क्षण भर तो विश्वास करते हैं पर जब परीक्षा आती है तो बहक जाते है।
14जो बीज कँटीली झाड़ियों में गिरा यह तो वे हैं जिन्होंने वचन सुना और जैसे वे आगे बढ़ते हैं वे चिन्ताओं, धन और जीवन के सुख-विलास में फंस जाते हैं और परिपक्वता के लिए कोई फल नहीं लाते।
15अच्छी भूमि के बीज वे हैं जो वचन सुनकर अपने शुद्ध और अच्छे हृृदय में उसे दृढ़ता से रखते और बड़े धैर्य से फल लाते है।
16“दीपक जलाकर कोई भी उसे बर्तन से नहीं ढांपता, न ही खाट के नीचे रखता है, वरन् दीपदान पर रखता है जिससे भीतर आने वालों को प्रकाश मिले।
17क्योंकि कुछ भी छिपा नहीं जो प्रकट न होगा, न कोई गुप्त बात है जो जानी नहीं जाएगी और प्रकट नहीं होगी।
18इसलिए सावधान रहो कि तुम किस प्रकार सुनते हो, क्योंकि जिसके पास है उसे और भी दिया जाएगा और जिसके पास नहीं है उससे वह भी जिसे वह अपना समझता है ले लिया जाएगा।”
19उसकी माता और उसके भाई भी उसके पास आए, परन्तु भीड़ के कारण उसके पास नहीं पहुंच सके।
20उसे बताया गया, “तेरी माता और तेरे भाई बाहर खड़े है। वे तुझसे मिलना चाहते है।”
21परन्तु उसने उत्तर दिया, “मेरी माता और मेरे भाई तो ये हैं जो परमेश्वर का वचन सुनकर उसका पालन करते है।”
22तब एक दिन ऐसा हुआ कि वह और उसके चेले एक नाव पर चढ़ गए और उसने उनसे कहा, “आओ, झील के उसपार चलेे।” अतः उन्होंने नाव खोल दी।
23परन्तु जब वे नाव खेते हुए आगे बढ़ रहे थे तो वह सो गया। और झील पर बड़ी भयंकर आंधी आयी, नाव में पानी भरने लगा और उनका जीवन ख़तरे में पड़ गया।
24तब उन्होंने पास आकर उसे जगाया और कहा, “स्वामी, हे स्वामी, हम नष्ट हुए जाते हैं!” उसने उठकर आंधी तथा उठती हुई लहरों को डांटा और वे थम गईं और शान्ति छा गई।
25उसने उनसे कहा, “तुम्हारा विश्वास कहां है?” वे डर गए और आशचर्यचकित होकर एक दूसरे से कहने लगे, “तो फिर यह कौन है जो आंधी और पानी को भी आज्ञा देता है और वे उसकी मान लेते हैं?”
26तब वे गिरासेनियों के प्रदेश में पहुंचे जो गलील के सामने ही है।
27जब वह किनारे पर उतरा तो उसे उस नगर का एक मनुष्य मिला जिसमें दुष्टात्माएं थी। वह बहुत दिनों से न कपड़े पहनता था न घर में रहा करता था, परन्तु कब्रों में ही रहता था।
28यीशु को देखकर वह चिल्ला उठा और उसके सामने गिरकर ऊंची आवाज में उसने कहा, “हे सर्वोच्च परमेश्वर के पुत्र यीशु, मेरा तुझसे क्या काम? मैं तुझसे निवेदन करता हूँ कि तू मुझे यातना न दे।”
29वह तो अशुद्ध आत्मा को आज्ञा दे रहा था कि उस मनुष्य में से निकल जाए, क्योंकि बहुत बार उसने उस मनुष्य को पकड़ा था। लोग उसे सांकलों और बेड़ियों से बांधकर पहरे में रखते थे, फिर भी वह इन बन्धनों को तोड़ डालता था और दुष्टात्मा उसे जंगल में भगाए फिरती थी।
30और यीशु ने उससे पूछा, “तेरा नाम क्या है?” उसने कहा, “सेना,” क्योंकि बहुत-सी दुष्टात्माएं उसमें समाई हुई थी।
31वे उससे अनुनय-विनय कर रही थीं कि वह उन्हें अथाह खड्ड में जाने की आज्ञा न दे।
32सूअरों का बड़ा झुण्ड वहां पहाड़ पर चर रहा था। तब दुष्टात्माओं ने उससे बड़ी विनती की कि वह उन्हें सूअरों में जाने दे। उसने उन्हें जाने दिया।
33दुष्टात्माएं उस मनुष्य में से निकलकर सूअरों में समा गई और सारा झुण्ड ऊंचे कगार पर से नीचे झपटकर झील में कूदा और डूबकर मर गया।
34जब चरवाहों ने जो कुछ हुआ था उसे देखा तो भागकर नगर में और गांवों में जाकर बता दिया।
35तब लोग जो कुछ हुआ था उसे देखने निकले और यीशु के पास आए। वहां उन्होंने उस मनुष्य को जिसमें से दुष्टात्माएं निकली थीं यीशु के पैरों के समीप बैठे हुए देखा। वह कपड़े पहने हुए सही मानसिक स्थिति में था। इसपर वे भयभीत हो गए।
36जिन लोगों ने यह देखा था, उन्होंने उन्हें बताया कि वह मनुष्य जिसमे दुष्टात्मा समाई हुई थी किस प्रकार ठीक कर दिया गया है।
37तब गिरासेनियों और आसपास के क्षेत्र के सब लोगों ने उससे विनती की कि वह उनके पास से चला जाए, क्योंकि वे अत्यन्त भयभीत हो गए थे, और वह नाव पर चढ़कर लौट गया।
38पर वह मनुष्य जिसमें से दुष्टात्माएं निकली थीं उससे विनती करने लगा कि मुझे अपने साथ चलने दे, पर उसने उसे यह कहकर लौटा दियाः
39“अपने घर लौट जा, और लोगों को बता कि परमेश्वर ने तेरे लिए कैसे महान् कार्य किए है।” उसने लौटकर सारे नगर में यह प्रचार किया कि यीशु ने मेरे लिए कैसे महान् कार्य किए है।
40ज्यों ही यीशु लौटा तो भीड़ ने उसका स्वागत किया, क्योंकि वे सब उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
41और देखो, याईर नाम का एक मनुष्य आया जो आराधनालय का अधिकारी था। वह यीशु के पैरों पर गिर पड़ा और उससे अपने घर चलने के लिए अनुरोध करने लगा,
42क्योंकि उसकी इकलौती बेटी, जो लगभग बारह वर्ष की थी, मरने पर थी। जब वह जाने को था तो भीड़ उसपर टूटी जा रही थी।
43तब एक स्त्री ने जिसे बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था और जिसे कोई भी चंगा न कर सका था,
44पीछे से आकर उसके चोगे का किनारा छुआ, और तत्काल उसका लहू बहना रुक गया।
45यीशु ने कहा, “किसने मुझे छुआ?” जब वे सब मुकर रहे थे तो पतरस ने कहा, “हे स्वामी, भीड़ इकट्ठी होकर तुझपर टूटी जा रही है।”
46पर यीशु ने कहा, “किसी ने मुझे छुआ है, क्योंकि मुझे मालूम हुआ कि मुझमें से सामर्थ्य निकली है।”
47जब स्त्री ने देखा कि मैं छिप नहीं सकती तो डर के मारे कांपती हुई आकर उसके सामने गिर पड़ी। तब उसने सब लोगों के सामने बताया कि उसने क्यों उसे छुआ और कैसे वह तत्काल चंगी हो गई।
48उसने उससे कहा, “बेटी, तेरे विश्वास ने तुझे छुड़ा लिया है, कुशलपूर्वक चली जा।”
49जब वह यह कह रहा था तो किसी ने आराधनालय के अधिकारी के घर से आकर कहा, “तेरी बेटी मर गई है। अब गुरु को अधिक कष्ट न दे।”
50पर जब यीशु ने यह सुना तो उसे उत्तर दिया, “बिल्कुल मत डर। केवल विश्वास रख तो वह ठीक हो जाएगी।”
51जब वह उस घर में पहुंचा तो उसने पतरस, यूहन्ना, याकूब और उस लड़की के माता-पिता के अतिरिक्त अन्य किसी को अपने साथ भीतर आने न दिया।
52वे सब लोग उसके लिए विलाप करके रो रहे थे, पर उसने कहा, “रोना बन्द करो, क्योंकि वह मरी नहीं, वरन् सो रही है।”
53वे यह जानकर कि वह मर गई है उस पर हंसने लगे।
54परन्तु उसने उसका हाथ पकड़ा और यह कहकर पुकाराः “हे लड़की, उठ!”
55तब उसकी आत्मा लौट आई और वह तत्काल खड़ी हो गई और यीशु ने आज्ञा दी कि उसे कुछ खाने को दिया जाए।
56उसके माता-पिता आशचर्यचकित हुए, पर उसने उनको आदेश दिया कि जो कुछ हुआ उसे किसी को न बताए।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)