नया नियम · लूका · अध्याय 9 / 24
लूका 9
1तब उसने बारहों को एकसाथ बुलाया और उनको सब दुष्टात्माओं पर और बीमारियों को चंगा करने के लिए सामर्थ्य और अधिकार दिया।
2उसने उनको भेजा कि वे परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार-प्रचार करें और रोगियों को चंगा करे।
3उसने उनसे कहा, “अपनी यात्रा के लिए कुछ न ले जाना-न तो लाठी, न झोला, न रोटी, और न रुपए-पैसे-यहां तक कि दो-दो कुरते भी न ले जाना।
4जिस किसी घर में जाओ, वहीं रहो और वहीं से विदा हो, जाओ।
5और जो तुमको स्वीकार न करें, जब तुम उस नगर में से निकलो तो उनके विरुद्ध गवाही के रूप में अपने पैरों से धूल झाड़ दोे।”
6अतः वे निकलकर गांव-गांव सुसमाचार सुनाते हुए और हर स्थान पर चंगाई करते चले।
7देश के चौथाई के राजा हेरोदेस ने जब इन सब घटनाओं के विजय में सुना तो वह अत्यन्त घबरा गया, क्योंकि कुछ लोगों के द्वारा कहा जा रहा था कि यूहन्ना मरे हुओं में से जी उठा है,
8कुछ कहते थे कि एलिय्याह प्रकट हुआ है, अन्य लोगों के अनुसार पुराने नबियों में से एक जी उठा है।
9हेरोदेस ने कहा, “यूहन्ना का सिर तो स्वयं मैंने कटवाया था, परन्तु यह मनुष्य कौन है जिसके विजय में मै ऐसी बातें सुनता हूँ?” और वह उसे देखने का प्रयत्न करता रहा।
10जब प्रेरित लौट आए तो सब कुछ जो उन्होंने किया था उसे बताया। तब वह उनको अपने साथ लेकर चुपचाप बैतसैदा नामक नगर को गया।
11परन्तु भीड़ के लोगों को पता लग गया और वे उसके पीछे चल पड़े। उनका स्वागत करके वह उनसे परमेश्वर के राज्य की बातें करने लगा, और जिनको चंगा होने की आवश्यकता थी उसने उन्हें चंगा किया।
12जब दिन ढलने लगा तो बारहों ने उसके पास आकर कहा, “भीड़ को विदा कर कि वे आस-पास के गांवों और बस्तियों में जाकर अपने लिए रहने को स्थान और खाने को कुछ ढूंढ़ सकें, क्योंकि हम तो यहां निर्जन स्थान में है।”
13परन्तु उसने उनसे कहा, “तुम ही उन्हें कुछ खाने को दो।” उन्होेंने कहा, “हमारे पास पांच रोटी और दो मछलियों के अतिरिक्त और कुछ नही। जब तक कि हम जाकर सारी भीड़ के लिए भोजन मोल न ले आएं यह नहीं हो सकता”-
14क्योंकि वहां पर लगभग पांच हज़ार पुरुष थे-उसने अपने चेलों से कहा, “पचास-पचास की पंक्तियों में उन्हें भोजन करने बैठा दो।”
15उन्होंने इसी प्रकार उन सबको बैठा दिया।
16तब उसने पांच रोटी और दो मछलियां लीं और स्वर्ग की ओर दृष्टि करके उनपर आशीष मांगी और उन्हें तोड़कर चेलों को देता गया कि वे लोगों को परोसे।
17तब सब लोग खाकर तृप्त हुए, और उन्होंने बचे हुए टुकड़ों से भरी बारह टोकरियां उठाईं।
18फिर जब वह अकेला प्रार्थना कर रहा था और चेले उसके साथ थे तो उसने उनसे पूछा, “मैं कौन हूँ, इस विजय में लोग क्या कहते हैं?”
19उन्होंने उत्तर दिया, “यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला; पर कुछ कहते हैं, एलिय्याह; और अन्य लोगों के अनुसार, प्राचीन नबियों में से कोई एक जो जी उठा है।”
20उसने उनसे कहा, “पर तुम मुझे क्या कहते हो?” पतरस ने उत्तर दिया, “परमेश्वर का मसीह।
21पर उसने उन्हें चेतावनी देकर आदेश दिया कि यह बात किसी से न कहना,
22और कहा, “यह आवश्यक है कि मनुष्य का पुत्र बहुत दुख उठाए और प्राचीनों, महायाजकों व शास्त्रियों द्वारा त्यागा जाकर मार डाला जाए और तीसरे दिन जी उठे।”
23तब उसने सब लोगों से कहा, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है तो वह स्वयं का इनकार करे, प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए और मेरा अनुसरण करे।
24क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, परन्तु जो कोई अपना प्राण मेरे लिए खोए वह उसे बचाएगा।
25यदि कोई मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने को खो दे अथवा उससे वंचित हो जाए तो उसे क्या लाभ होगा?
26जो मुझसे और मेरे वचन से लज्जित होता है, उससे मनुष्य का पुत्र भी उस समय लज्जित होगा जब वह अपनी, और अपने पिता की, और स्वर्गदूतों की महिमा में आएगा।
27पर मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि यहां कुछ ऐसे खड़े हैं जो जब तक स्वर्ग का राज्य न देख लें तब तक मृत्यु का स्वाद न चखेंगे।”
28इन बातों के लगभग आठ दिन पश्चात् ऐसा हुआ कि वह पतरस, यूहन्ना और याकूब को साथ लेकर प्रार्थना करने के लिए पर्वत पर चढ़ गया।
29जब वह प्रार्थना कर रहा था तो उसके मुख का रूप बदल गया और उसका वस्त्र "वेत होकर चमकने लगा।
30देखो, दो मनुष्य उससे बातें कर रहे थे-वे मूसा और एलिय्याह थे।
31ये महिमा में प्रकट होकरउसके मरने के विजय में बातें कर रहे थे जिसे वह यरूशलेम में पूरा करने पर था।
32पतरस और उसके साथियों को नींद ने दबा रखा था, पर जब वे पूर्णरूप से जाग उठे तो उन्होंने उसकी महिमा को और उसके साथ उन दोनों मनुष्यों को खड़े देखा।
33जब वे उससे विदा होने लगे तो पतरस ने यीशु से कहा, “हे स्वामी, यहां रहना हमारे लिए अच्छा है, अतः हम तीन तम्बू खड़े करें: एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए और एक एलिय्याह के लिए” वह जानता न था कि क्या कह रहा है।
34वह यह कह ही रहा था कि एक बादल उठा जो उनपर छाने लगा, और जब वे बादल से घिरने लगे तो डर गए।
35तब बादल में से यह शब्द सुनाई दिया, “यह मेरा पुत्र, मेरा चुना हुआ है; इसकी सुनो!”
36जब वाणी हो चुकी तो यीशु वहाँ अकेला पाया गया। वे चुपचाप रहे और जो कुछ देखा था उसके विजय में उन्होंने उन दिनों किसी को कुछ नहीं बताया।
37दूसरे दिन ऐसा हुआ कि जब वे उस पर्वत से नीचे उतरे तो एक बड़ी भीड़ उससे मिली।
38और देखो, भीड़ में से एक मनुष्य ने चिल्लाकर कहा, “हे गुरु, मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मेरे पुत्र पर कृपा-दृष्टि कर, क्योंकि वह मेरा इकलौता पुत्र है,
39और देख, एक दुष्टात्मा उसमें समा जाती है और वह अचानक चीख उठता है। वह उसे ऐसा मरोड़ती है कि उसके मुंह से फेन निकलने लगता है, और वह उसे विकृत करके कठिनाई से छोड़ती है।
40मैंने तेरे चेलों से विनती की कि उसे निकालें, पर वे न निकाल सके।”
41यीशु ने उसे उत्तर दिया, “ हे अविश्वासी और हठीली पीढ़ी, मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम्हारी सहता रहूँगा? अपने पुत्र को यहां ले आ।”
42वह आ ही रहा था कि दुष्टात्मा ने उसे भूमि पर पटक कर बुरी तरह मरोड़ा। पर यीशु ने उस अशुद्ध आत्मा को डांटा और लड़के को चंगा करके उसके पिता को सौंप दिया।
43तब परमेश्वर की महानता से सब लोग आशचर्यचकित हुए। वह जो कुछ कर रहा था उसको देखकर जब सब लोग अचम्भा कर रहे थे तो उसने अपने चेलों से कहा,
44“इन बातों पर कान दो, क्योंकि मनुष्य का पुत्र लोगों के हाथों में पकड़वाया जाने वाला है।”
45परन्तु वे इस कथन को न समझे, और यह बात उनसे गुप्त रही कि वे उसे न जानें, और वे इसके विजय में उससे पूछने से डरते थे।
46तब उनके मध्य इस बात पर विवाद होने लगा कि हममें से कौन सबसे बड़ा है।
47तब यीशु ने यह जानकर कि वे अपने मन में क्या सोच रहे हैं, एक बालक को लेकर अपने निकट खड़ा किया,
48और उनसे कहा, “जो कोई इस बालक को मेरे नाम से ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो कोई मुझेे ग्रहण करता है, वह उसको ग्रहण करता है जिसने मुझे भेजा है, क्योंकि जो तुममें सबसे छोटा है, वही बड़ा है।”
49तब यूहन्ना ने कहा, “हे स्वामी, हमने एक मनुष्य को तेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालते देखा और उसे रोकने का प्रयत्न किया, क्योंकि वह हमारे साथ रहकर तेरा अनुसरण नहीं करता।”
50परन्तु यीशु ने उससे कहा, “उसे मत रोको, क्योंकि जो तुम्हारे विरोध में नहीं, वह तुम्हारी ओर है।”
51पिफ़र ऐसा हुआ कि जब उसके स्वर्गारोहण के दिन निकट आने लगे, तो उसने यरूशलेम जाने का दृढ़ निश्चय किया
52और उसने अपने आगे दूत भेजे। उन्होंने जाकर सामरियों के एक गांव में प्रवेश किया कि उसके लिए तैयारी करे।
53पर उन्होंने उसका स्वागत नहीं किया, क्योंकिवह यरूशलेम की ओर ही चला जा रहा था।
54जब उसके चेलों में से याकूब और यूहन्ना ने यह देखा तो कहा, “हे प्रभु, क्या तू चाहता है कि हम यह आज्ञा दें कि आकाश से अग्नि गिरे और उन्हें भस्म कर दे?”
55पर उसने मुड़कर उनको डांटा और कहा, “तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो।
56मनुष्य का पुत्र तो लोगों के प्राणों को नष्ट करने नहीं, परन्तु बचाने आया है।”ह् और वे दूसरे नगर को चले गए।
57जब वे मार्ग पर चले जा रहे थे तो किसी ने उससे कहा, “ तू जहां-जहां जाए मैं तेरे पीछे चलूंगा।”
58यीशु ने उससे कहा, “लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के घोंसले होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र के लिए सिर छिपाने के लिए भी कोई स्थान नही।”
59उसने दूसरे से कहा, “मेरे पीछे चल,” पर उसने कहा, “मुझे पहले जाने दे कि मैं अपने पिता को दप़फ़न करू।”
60पर उसने उससे कहा, “मुर्दों को अपने मुर्दे दप़फ़न करने दे, पर तू आकर परमेश्वर के राज्य का सर्वत्र प्रचार कर।”
61फिर किसी एक अन्य ने भी कहा, “हे प्रभु, मैं तेरे पीछे चलूंगा, पर मुझे पहले जाने दे कि घर वालों से विदा होकर आऊ।”
62परन्तु यीशु ने उससे कहा, “कोई भी व्यक्ति जो अपना हाथ हल पर रखने के पश्चात् पीछे मुड़कर देखता है परमेश्वर के राज्य के योग्य नही।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)