नया नियम · लूका · अध्याय 10 / 24
लूका 10
1इसके पश्चात् प्रभु ने सत्तर अन्य व्यक्तियों को नियुक्त किया और उन्हें अपने आगे दो दो करके प्रत्येक नगर और स्थान को भेजा जहां वह स्वयं जाने पर था।
2उसने उनसे कहा, “फसल तो बहुत खड़ी है, पर मज़दूर थोड़े हैं, अतः खेत के मालिक से विनती करो कि वह अपने खेत में मज़दूरों को भेजे।
3जाओ देखो, मैं तुम्हें मेमनों के समान भेड़ियों के मध्य भेजता हूँ।
4अपने साथ न तो बटुआ, न झोला और न जूतियां लो, और मार्ग में किसी को नमस्कार भी मत करो।
5जिस घर में भी प्रवेश करो, पहले कहो, ‘इस घर में शान्ति बनी रहे।’
6यदि वहां कोई शान्ति के योग्य हो, तो तुम्हारी शान्ति उसपर बनी रहेगी अन्यथा वह तुम्हारे पास लौट आएगी।
7उसी घर में रहो, और जो कुछ वे तुम्हें दें उसी को खाओ और पीयो, क्योंकि मज़दूर को मज़दूरी अवश्य ही मिलनी चाहिए। घर घर मत फिरा करो।
8जिस नगर में भी जाओ, जब वे तुम्हारा स्वागत करें तो जो कुछ तुम्हारे सामने रखा जाए वही खाओ।
9वहां जो बीमार हों उन्हें चंगा करो और उनसे कहो, ‘परमेश्वर का राज्य तुम्हारे निकट आ पहुंचा है।’
10पर जिस नगर में तुम जाओ और लोग तुम्हारा स्वागत न करें तो उसकी गलियों में जाकर कहो,
11‘तुम्हारे विरोध में हम तुम्हारे नगर की उस धूल को भी जो हमारे पैरों पर लगी है झाड़ देते है। फिर भी यह निश्चयपूर्वक जान लो कि परमेश्वर का राज्य निकट आ पहुंचा है।’
12मैं तुमसे कहता हूँ कि उस दिन सदोम की दशा उस नगर से कहीं अधिक सहने योग्य होगी।
13हे खुराजीन, तुमपर हाय! हे बैतसैदा, तुम पर हाय! जो आशचर्यकर्म तुम्हारे मध्य किये गये यदि वे सूर और सैदा में किये गए होते तो वे टाट ओढ़कर और राख पर बैठकर कब के मन फिरा लिए होते।
14परन्तु न्याय के दिन सूर और सैदा की दशा तुमसे कहीं अधिक सहने योग्य होगी।
15हे कफरनहूम, तू क्या स्वर्ग तक ऊंचा उठाया जाएगा? तू तो अधोलोक तक नीचा किया जाएगा!
16वह जो तुम्हारी सुनता है, मेरी सुनता है; और जो तुम्हें अस्वीकार करता है, वह मुझे अस्वीकार करता है; और जो मुझे अस्वीकार करता है, वह उसे अस्वीकार करता है जिसने मुझे भेजा है।”
17वे सत्तर आनन्द करते हुए लौटे और कहने लगे, “हे प्रभु, यहां तक कि दुष्टात्माएं भी तेरे नाम से हमारे वश में है।”
18उसने उनसे कहाः “मैं शैतान को बिजली के समान आकाश से गिरते देख रहा था।
19देखो, मैंने तुम्हें सर्पों और बिच्छुओं को कुचलने तथा शत्रु की सारी सामर्थ्य पर अधिकार दिया है, अतः कोई तुम्हें हानि नहीं पहुंचाएगा।
20फिर भी इस बात पर आनन्दित मत हों कि आत्माएं तुम्हारे वश में हैं, परन्तु इस बात से आनन्दित हों कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए है।”
21उसी क्षण वह पवित्र आत्मा में अत्यन्त आनन्दित हुआ, और उसने कहा, “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरी स्तुति करता हूँ कि तूने बुद्धिमानों और ज्ञानियों से इन बातों को गुप्त रखा पर बच्चों पर प्रकट किया। हाँ, हे पिता, यही तुझे भला लगा।
22मेरे पिता ने मुझे सब वस्तुएं सौंप दी हैं, पिता को छोड़ कोई नहीं जानता कि पुत्र कौन है, तथा केवल पुत्र को छोड़ कोई नहीं जानता कि पिता कौन है, और केवल उस व्यक्ति के जिसपर पुत्र उसे प्रकट करना चाहे।”
23तब चेलों की ओर मुड़कर उसने उनसे गुप्त रूप में कहा, “धन्य हैं वे आँखें जो उन बातों को देखती हैं जिन्हें तुम देखते हो,
24क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम जिन बातों को देखते हो उनको बहुत-से नबियों तथा राजाओं ने देखना चाहा पर न देखा, और उन बातों को सुनना चाहा जिन्हें तुम सुनते हो, पर न सुना।”
25देखो, एक व्यवस्थाविद् उठा और यह कहकर उसकी परीक्षा की, “हे गुरु, अनन्त जीवन का उत्तराधिकारी होने के लिए मैं क्या करूॅं?”
26उसने उससे कहा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?”
27उसने उत्तर दिया, तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय, सम्पूर्ण प्राण, सम्पूर्ण शक्ति तथा सम्पूर्ण बुद्धि से प्रेम कर तथा अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर।”
28तब उसने उससे कहा, “तूने ठीक उत्तर दिया है, यही कर तो तू जीवित रहेगा।”
29परन्तु उसने अपने को धर्मी ठहराने की इच्छा से यीशु से पूछा, “और मेरा पड़ोसी है कौन?”
30यीशु ने उत्तर दिया, “एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो जा रहा था कि वह डाकुओं से घिर गया; उन्होंने उसके कपड़े उतार लिए, और मारा-पीटा और वे उसे अधमरा छोड़कर चल दिए।
31संयोग से एक याजक उस मार्ग से जा रहा था और उसने उसे देखा तो कतरा कर चला गया।
32इसी प्रकार एक लेवी भी उधर से निकला और उस स्थान पर पहुंचकर जब उसने उसे देखा तो कतराकर चल दिया।
33परन्तु एक सामरी भी जो यात्रा कर रहा था वहाँ पहुंचा। जब उसने उसे देखा तो उसे तरस आया।
34उसने पास जाकर उसके घावों पर तेल और दाखरस उण्डेलकर उनपर पट्टियाँ बांधी। तब उसे अपनी सवारी पर चढ़ाकर एक सराय में ले आया जहां उसने उसकी सेवा-सुश्रुजा की।
35दूसरे दिन उसने दो दीनार निकालकर सराय वाले को दिए और कहा, ‘इसकी सेवा-सुश्रुजा करना। इससे अधिक जो खर्च आए, मैं लौटने पर चुका दूँगा।’
36तेरे विचार से इन तीनों में से उस व्यक्ति का जो डाकुओं के हाथ में पड़ गया था कौन पड़ोसी प्रमाणित हुआ?”
37उसने कहा, “वही जिसने उसपर दया की।” यीशु ने उससे कहा, “जा, तू भी ऐसा ही कर।”
38जब वे चले जा रहे थे तो उसने एक गांव में प्रवेश किया, और मार्था नामक एक स्त्री ने उसे अपने घर में ठहराया।
39उसकी एक बहन थी जिसका नाम मरियम था जो प्रभु के पावों के समीप बैठ कर उसके वचन सुन रही थी।
40परन्तु मार्था सेवा-टहल करते करते व्याकुल हो उठी और उसने उसके पास आकर कहा, “हे प्रभु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि मेरी बहन ने सेवा-टहल के लिए मुझे अकेला छोड़ दिया है? उससे कह कि वह मेरी सहायता करे।”
41परन्तु प्रभु ने उत्तर दिया, “मार्था, हे मार्था, तू बहुत-सी बातों के लिए चिन्तित तथा व्याकुल रहती है;
42परन्तु कुछ बातें आवश्यक हैं-वास्तव में एक ही बात और मरियम ने उस उत्तम भाग को चुन लिया है जो उससे छीना न जाएगा।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)