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नया नियम · लूका · अध्याय 11 / 24

लूका 11

1फिर ऐसा हुआ कि वह किसी स्थान पर प्रार्थना कर रहा था। जब वह प्रार्थना कर चुका तो उसके चेलों में से एक ने उससे कहा, “हे प्रभु, जैसे यूहन्ना ने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया, तूभी हमें सिखा।”

2उसने उनसे कहा, “जब तुम प्रार्थना करो तो कहो, ‘हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए, तेरा राज्य आए।

3हमें दिन भर की रोटी प्रतिदिन दिया कर।

4हमारे पापों को क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने प्रत्येक अपराधी को क्षमा करते हैं, और हमें परीक्षा में न पड़ने दे’।”

5उसने उनसे कहा, “तुममें से ऐसा कौन है जिसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास जाकर कहे, ‘हे मित्र, मुझे तीन रोटियां दे;

6क्योंकि मेरा एक मित्र, यात्रा करते हुए मेरे पास आया है और मेरे पास उसे खिलाने के लिए कुछ भी नहीं;’

7वह भीतर से उत्तर देकर कहे, “मुझे न सता; द्वार बन्द हो चुका है और मेरे बच्चे मेरे साथ बिस्तर पर पड़े हैं: मैं उठकर तुझे कुछ भी नहीं दे सकता’?

8मैं तुमसे कहता हूँ कि यघपि मित्र होने के नाते वह न उठे और उसे कुछ भी न दे, फिर भी उसके बार-बार आग्रह करने पर वह उठकर उसकी जितनी भी आवश्यकता हो, देगा।

9मैं तुमसे कहता हूँ, मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढो तो पाओगे; खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।

10क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है, और जो ढूँढता है वह पाता है, और जो खटखटाता है उसके लिए खोला जाएगा।

11तुममें से कौन ऐसा पिता होगा कि जब उसका पुत्र रोटी मांगे तो वह उसे पत्थर दे? याह्मछली मांगे तो मछली के बदले उसे सांप दे?

12या अण्डा मांगे तो उसे बिच्छू दे?

13अतः जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको जो उससे मांगते हैं पवित्र आत्मा क्यों न देगा?”

14फिर वह एक दुष्टात्मा को निकालने लगा जो गूँगी थी; और ऐसा हुआ कि जब दुष्टात्मा निकल गई तो गूँगा बोलने लगा और भीड़ को बड़ा आशचर्य हुआ।

15पर उनमें से कुछ ने कहा, “वह तो दुष्टात्माओं को बालजबूल अर्थात् दुष्टात्माओं के प्रधान की सहायता से निकालता है।”

16अन्य कुछ लोगों ने उसकी परीक्षा करने के लिए उससे आकाश का एक चिह्न मांगा।

17परन्तु वह उनके विचारों को जानता था, अतः उसने कहा, “जिस राज्य में फूट हो वह उजड़ जाता है, और जिस घर में फूट हो वह नष्ट हो जाता है।

18यदि शैतान ही स्वयं अपना विरोधी हो जाए तो उसका राज्य कैसे स्थिर रह सकता है? क्योंकि तुम कहते हो कि मैं बालजबूल की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूँ।

19यदि मैं बालजबूल की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूँ, तो तुम्हारी सन्तान किसकी सहायता से निकालती हैं? परिणामस्वरूप वे ही तुम्हारे न्यायी होंगे।

20परन्तु यदि मैं परमेश्वर की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूँ तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है।

21जब एक बलवन्त मनुष्य पूर्णतः हथियार बांधे अपने घर की रखवाली करता है तो उसकी सम्पत्ति सुरक्षित रहती है।

22पर जब उससे भी बलवन्त कोई व्यक्ति उसपर आक्रमण करके उसे पराजित करता है तो वह उसके समस्त हथियारों को जिनपर उसे भरोसा था छीनता और सम्पत्ति को लूटकर बांट देता है।

23वह जो मेरे साथ नहीं, मेरे विरोध में है; और वह जो मेरे साथ बटोरता नहीं, बिखेरता है।

24जब अशुद्ध आत्मा मनुष्य में से निकलती है तो विश्राम की खोज करते हुए निर्जल स्थानों से होकर निकलती है; जब उसे कोई स्थान नहीं मिलता तो कहती है, ‘मैं अपने जिस घर से निकली थी उसी में लौट जाऊँगी’,

25जब वह वहाँ पहुँचती है तो उसे झाड़ा-बुहारा और सुसज्जित पाती है।

26तब वह अपने से भी बुरी अन्य सात आत्माओं को अपने साथ लेकर आती है और वे उसमें प्रवेश करके बस जाती है; और उस मनुष्य की पिछली दशा, पहले से भी बुरी हो जाती है।”

27ऐसा हुआ कि जब वह ये बातें कह चुका तो भीड़ में से किसी स्त्री ने ऊँचे शब्द से उससे कहा, “धन्य है वह गर्भ जिसमें तू रहा और वे स्तन जिनसे तेरा पोषण हुआ।”

28परन्तु उसने कहा, “इसके विपरीत धन्य हैं वे जो परमेश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते है।”

29ज्यों-ज्यों भीड़ बढ़ती जा रही थी वह कहने लगा, “यह दुष्ट पीढ़ी है, क्योंकि यह चिह्न की खोज में रहती है; फिर भी इसको योना के चिह्न के अतिरिक्त अन्य कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा।

30जिस प्रकार योना नीनवे के लोगों के लिए चिह्न बना उसी प्रकार मनुष्य का पुत्र भी इस पीढ़ी के लोगों के लिए बनेगा।

31दक्षिण की रानी न्याय के दिन इस पीढ़ी के लोगों के साथ खड़ी होकर उनपर दोष लगाएगी, क्योंकि वह पृथ्वी के छोर से सुलैमान का ज्ञान सुनने आई, पर देखो, यहाँ वह है जो सुलैमान से भी बड़ा है।

32न्याय के दिन नीनवे के लोग इस पीढ़ी के लोगों के साथ खड़े होकर इन पर दोष लगाएंगे, क्योंकि उन्होंने योना का प्रचार सुनकर मन फिराया, और देखो, यहां वह है जो योना से भी बड़ा है।

33“कोई भी दीपक जलाकर तहखाने में नहीं रखता, न टोकरी के नीचे रखता है, परन्तु उसे दीवट पर रखता है कि प्रवेश करने वालों को प्रकाश मिले।

34तेरे शरीर का दीपक तेरी आंख है; जब तेरी आंख निर्मल है तो सारा शरीर भी पूर्णतः प्रकाशमान है, पर जब वह बुरी है तो तेरा शरीर भी पूर्णतः अन्धकारमय हो जाता है।

35अतः सतर्क रह कि तेरी ज्योति अंधकार न बन जाए।

36इसलिए यदि तेरा सारा शरीर ज्योति से जगमगाता हो और किसी भी भाग में अन्धेरा न हो तो वह पूर्णतः उसी प्रकार प्रकाशित होगा, जिस प्रकार दीपक अपनी चमक से तुझे प्रकाश देता है।”

37जब उसने बोलना समाप्त किया तो एक फरीसी ने उसे अपने साथ भोजन के लिए आमन्त्रित किया। वह भीतर जाकर भोजन करने बैठा।

38जब फरीसी ने यह देखा तो उसे आशचर्य हुआ कि उसने भोजन करने से पहले रीति के अनुसार स्नान नहीं किया।

39परन्तु प्रभु ने उससे कहा, “हे फरीसियो, तुम कटोरे और थाली को बाहर से तो मांजते हो, परन्तु तुम्हारे भीतर डकैती और दुष्टता भरी है।

40हे मूर्खों, जिसने बाहर के भाग को बनाया, क्या उसने भीतर के भाग को नहीं बनाया?

41पर जो भीतर का है उसे दान कर दो तो तुम्हारे लिए सब कुछ शुद्ध हो जाएगा।

42“परन्तु हे फरीसियों, तुमपर हाय! क्योंकि तुम पोदीने और सुदाब तथा विभिन्न प्रकार के साग-सब्जियों का दशमांश तो देते हो परन्तु न्याय व परमेश्वर के प्रेम की उपेक्षा करते हो; यही वे बातें हैं जिन्हें तुम्हें अन्य बातों की अवहेलना किए बिना करना चाहिए था।

43हे फरीसियो, तुमपर हाय! क्योंकि तुम्हें आराधनालयों में आगे का स्थान और बाज़ारों में सम्मानपूर्ण नमस्कार प्रिय है।

44तुमपर हाय! क्योंकि तुम उन छिपी हुई क़ब्रों के समान हो जिनपर लोग अनजाने चलते है।”

45तब व्यवस्थाविदों में से एक ने उत्तर दिया, “हे गुरु, ऐसा कहकर तू हमारा भी अपमान करता है।”

46परन्तु उसने कहा, “तुम व्यवस्थाविदों पर भी हाय! क्योंकि तुम मनुष्यों को ऐसे बोझ से दबाते हो जिन्हें उठाना कठिन है, जबकि तुम स्वयं उन बोझों को एक उंगली से भी छूना नहीं चाहते।

47तुमपर हाय! क्योंकि तुम उन नबियों की क़ब्रें बनाते हो जिन्हें तुम्हारे ही बाप-दादों ने मार डाला था।

48फलस्वरूप तुम ही साक्षी हो और अपने बाप-दादों के कार्यों से सहमत हो, क्योंकि उन्होंने तो उन्हें मार डाला था और तुमने उनकी कब्रें बनाईं।

49इसी कारण परमेश्वर की बुद्धि ने भी कहा, “मैं उनके पास नबियों और प्रेरितों को भेजूंगी, उनमें से कुछ को तो वे मार डालेंगे और कुछ को सताएंगे,

50जिससे कि सृष्टि के आरम्भ से जितने नबियों का लहू बहाया गया है, उसका लेखा इस पीढ़ी के लोगों से लिया जाए,

51अर्थात् हाबिल के लहू से लेकर जकरयाह के लहू तक का लेखा जिसकी हत्या परमेश्वर के भवन और वेदी के मध्य में की गई थी। हाँ, मैं कहता हूँ कि इसी पीढ़ी के लोगों से लेखा लिया जाएगा।

52हे व्यवस्थाविदो, तुमपर हाय! क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी छीन ली है; तुमने स्वयं भी प्रवेश नहीं किया, और जो प्रवेश कर रहे थे उन्हें भी रोका।”

53जब वह वहां से चला तो फरीसी और शास्त्री कड़ा विरोध करते हुए बहुत से विजयों पर उससे सूक्ष्मरूप से प्रशन करने लगे,

54और उसके विरोध में षडयंत्र रचने लगे कि उसके मुंह की कोई बात से उसे फँसाए।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)