नया नियम · लूका · अध्याय 12 / 24
लूका 12
1ऐसी परिस्थिति में जब हज़ारों की भीड़ एकत्रित हो गई थी, यहाँ तक कि वे एक दूसरे पर गिरे जा रहे थे, तो सबसे पहले उसने अपने चेलों से कहना प्रारम्भ किया, “फरीसियों के ख़मीर से, जो उनका कपट है, सावधान रहना।
2कुछ भी ढँका नहीं जो खोला न जाएगा, और न कुछ छिपा है जो जाना न जाएगा।
3इसलिए जो कुछ तुमने अँधियारे में कहा, वह उजियाले में सुना जाएगा, और जो कुछ तुमने भीतर के कमराें में फुसफुसाकर कहा, वह छत से प्रचार किया जाएगा।
4हे! मेरे मित्रे, मैं तुमसे कहता हूँ, उनसे मत डरो जो शरीर को घात करते हैं पर इसके पश्चात् और कुछ नहीं कर सकते।
5मैं तुम्हें चेतावनी देकर कहता हूँ कि किस से डरना चाहिएः उसी से डरो जिसको मारने के पश्चात् यह अधिकार है कि नरक में डाले; हां, मैं कहता हूँ कि उसी से डरो!
6क्या दो पैसे में पांच गौरैय्यां नहीं बिकतीं? फिर भी परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी नहीं भूलता।
7वास्तव में तुम्हारे सिर के सारे बाल भी गिने हुए है। मत डरो। तुम बहुत-सी गौरैय्यों से भी बढ़कर मूल्यवान हो।
8मैं तुमसे कहता हूँ जो मनुष्यों के सामने मुझे स्वीकार करेगा, मनुष्य का पुत्र भी उसे परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने स्वीकार करेगा।
9परन्तु जो मनुष्यों के सामने मुझे अस्वीकार करता है, वह भी परमेश्वर के स्वर्गदूतों के सामने अस्वीकार किया जाएगा।
10प्रत्येक जो मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई शब्द कहे, वह क्षमा कर दिया जाएगा; परन्तु जो पवित्र आत्मा की निन्दा करता है, वह क्षमा नहीं किया जाएगा।
11जब वे तुम्हें आराधनालयों, शासकों और अधिकारियों के समक्ष ले जाएं तो इस बात की चिन्ता न करना कि अपने बचाव में तुम्हें कैसे और क्या कहना होगा
12क्योंकि पवित्र आत्मा तुम्हें उसी समय सिखाएगा कि क्या कहना चाहिए।”
13भीड़ में से किसी ने उससे कहा, “हे गुरु, मेरे भाई से कह कि पारिवारिक सम्पत्ति का मेरे साथ बँटवारा करे।”
14परन्तु उसने उससे कहा, “हे मनुष्य, किसने मुझे तुम्हारा न्यायी या बँटवारा करने वाला नियुक्त किया है?”
15उसने उनसे कहा, “सावधान, हर प्रकार के लोभ से सतर्क रहो; क्योंकि सम्पत्ति की अधिकता होने पर भी किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति पर निर्भर नहीं होता।”
16तब उसने उनसे एक दृष्टान्त कहाः “किसी धनवान मनुष्य की भूमि बहुत अधिक उपजाऊ थी
17वह अपने मन में यह विचार करने लगा, ‘मैं क्या करूं? क्योंकि मेरे पास अपनी उपज रखने के लिए स्थान नही।’
18तब उसने कहा, मैं ऐसा करूँगा कि कोज्ठागारों को तोड़कर बड़े कोज्ठागार बनाऊंगा और उन्हीं में अपना सारा अनाज और सम्पत्ति रखूंगा।
19तब मैं अपने प्राण से कहूँगा, “हे मेरे प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत-सी सम्पत्ति रखी है; चैन कर, खा-पी और आनन्द मना”।
20परन्तु परमेश्वर ने उससे कहा, ‘हे मूर्ख! आज ही रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा; तब जो कुछ तूने इकट्ठा किया है वह किसका होगा?’
21ऐसा ही है वह मनुष्य भी जो अपने लिए धन तो संचित करता है परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में धनी नही।”
22फिर उसने अपने चेलों से कहा, “इस कारण मैं तुमसे कहता हूँ, अपने जीवन के लिए यह कहकर चिन्ता न करो कि हम क्या खाएंगे; न अपने शरीर के लिए चिन्ता करो कि क्या पहनेंगे।
23क्योंकि जीवन भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर है।
24कौवों पर ध्यान दो, क्योंकि वे न बोते, न काटते हैं; और न उनके पास भण्डार-गृह, न कोज्ठागार हैं; फिर भी परमेश्वर उन्हें खिलाता है। तुम तो पक्षियों से कहीं अधिक मूल्यवान हो!
25तुममें कौन ऐसा है जो चिन्ता करके अपने जीवन की अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?
26अतः यदि तुम छोटे से छोटा कार्य भी नहीं कर सकते तो अन्य बातों की चिन्ता क्यों करते हो?
27सोसन के पौधों पर विचार करो कि वे कैसे बढ़ते हैं; वे न तो परिश्रम करते, न कातते हैं; परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि सुलैमान भी अपने सारे वैभव में इनमें से किसी एक के समान वस्त्र नहीं पहने था।
28अतः यदि परमेश्वर मैदान की घास को जो आज है और कल भट्ठी में झोंक दी जाएगी, इस प्रकार पहनाता है, तो हे अल्प-विश्वासियो, वह तुम्हें और भी क्यों न पहनाएगा!
29इस बात की खोज में मत रहो कि क्या खाएंगे और क्या पीएंगे; न इनकी चिन्ता में ही लगे रहो;
30क्योंकि पृथ्वी की जातियां तत्परता से इन सब बातों की खोज में रहती है। परन्तु तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें इन वस्तुओं की आवश्यकता है।
31अतः उसके राज्य की खोज करो और ये वस्तुएं भी तुम्हें दे दी जाएंगी।
32हे छोटे झुण्ड, मत डर! क्योंकि तुम्हारे पिता ने प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें राज्य देना चाहा है।
33अपनी सम्पत्ति बेचकर दान कर दो। अपने लिए ऐसे बटुए बनाओ जो फटते नहीं, अर्थात् समाप्त न होने वाला धन स्वर्ग में इकट्ठा करो, जहाँ न तो चोर उसके निकट आता है और न उसे कीड़ा बिगाड़ता है।
34क्योंकि जहाँ तुम्हारा धन है वहीं तुम्हारा मन भी लगा रहेगा!
35“तुम्हारी कमर कसी रहें और तुम्हारे दीपक जलते रहे।
36उन मनुष्यों के समान बनो जो अपने स्वामी की, जब वह ब्याह के भोज से लौटकर आता है, प्रतीक्षा करते रहते हैं कि जब आकर द्वार खटखटाएं तो तुरन्त खोल दे।
37धन्य हैं वे दास जिन्हें स्वामी आकर सतर्क पाए; मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि वह अपनी कमर कसकर उनकी सेवा करेगा और उन्हें भोजन करने बैठाएगा और स्वयं आकर परोसेगा।
38चाहे वह रात को बारह बजे या प्रातः तीन बजे आए पर उन्हें सतर्क पाए तो वे दास धन्य है।
39यह निश्चय जानो कि यदि गृह-स्वामी जानता कि चोर किस समय आएगा, तो वह अपने घर में सेंध न लगने देता।
40तुम भी तैयार रहो, क्योंकि मनुष्य का पुत्र उस घड़ी आ रहा है जिसके विजय में तुम सोचते भी नहीं हो।”
41तब पतरस ने कहा, “हे प्रभु, क्या तू यह दृष्टान्त केवल हमसे ही कह रहा है या सब लोगों से?”
42प्रभु ने कहा, “ ऐसा विश्वासयोग्य और समझदार भण्डारी कौन है जिसे उसका स्वामी अपने सेवकों के ऊपर अधिकारी नियुक्त करे कि वह उन्हें ठीक समय पर भोजन-सामग्री दे?
43धन्य है वह दास जिसे उसका स्वामी जब आए तो ऐसा ही करते पाए।
44मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ कि वह उसे अपनी समस्त सम्पत्ति पर अधिकारी नियुक्त करेगा।
45परन्तु यदि वह दास अपने मन में यह कहे, ‘मेरा स्वामी बड़ी देर से आएगा,’ और दास और दासियों को मारने-पीटने लगे और खाने-पीने में लगा रहकर नशे में चूर रहने लगे,
46तो उस दास का स्वामी उस दिन जब वह प्रतीक्षा नहीं करता हो और उस घड़ी जिसे वह नहीं जानता, आएगा और कठोर दण्ड देकर उसका स्थान अविश्वासियों के साथ ठहराएगा।
47परन्तु वह दास, जो अपने स्वामी की इच्छा को जानता तो था पर जिसने तैयार होकर उसकी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं किया, बहुत कोड़े खाएगा।
48परन्तु जो यह न जानकर कोड़े खाने के योग्य कार्य करे उसे कम मार पड़ेगी। प्रत्येक जिसे बहुत दिया गया है उससे बहुत मांगा जाएगा; और जिसे बहुत सौंपा गया है, उससे वे और भी अधिक मांगेंगे।
49“मैं पृथ्वी पर आग लगाने आया हूँ और मेरी बड़ी इच्छा है कि वह अभी सुलग जाती।
50परन्तु मुझे एक बपतिस्मा लेना है, और जब तक वह पूरा न हो जाए मैं कैसी दुविधा में पड़ा हूँ!
51क्या तुम सोचते हो कि मैं पृथ्वी पर मेल कराने आया हूँ? मैं तुमसे कहता हूँ, नहीं, वरन् फूट डालने आया हूँ।
52क्योंकि अब से जिस घर में पांच सदस्य हों उनमें परस्पर विरोध होगा; तीन, दो के विरुद्ध और दो, तीन के।
53वे एक दूसरे के विरुद्ध होंगे, पिता, पुत्र के और पुत्र, पिता के। माँ, बेटी के और बेटी, माँ के; सास, बहू के और बहू, सास के विरुद्ध होगी।”
54उसने भीड़ से यह भी कहा, “जब तुम पशिचम की ओर बादल उठते देखते हो तो शीघ्र कहते हो कि वर्षा होगी और ऐसा ही होता है।
55जब तुम दक्षिणी हवा चलते देखते हो तो कहते हो, ‘बड़ी गर्मी पड़ेगी,’ और ऐसा ही होता है।
56हे पाखण्डियो, तुम धरती और आकाश के स्वरूप की व्याख्या करना तो जानते हो, परन्तु इस वर्तमान युग की व्याख्या क्यों नहीं करते?
57और तुम स्वयं वह निर्णय क्यों नहीं करते कि उचित क्या है?
58जब तू अपने वादी के साथ न्यायाधीश के सामने उपस्थित होने जाए तो मार्ग में ही उसके साथ समझौता करने का प्रयत्न कर, ऐसा न हो कि वह तुझे न्यायाधीश के सम्मुख घसीटकर ले जाए और न्यायाधीश तुझे सिपाही के हाथ सौंपे और सिपाही तुझे बन्दीगृह में डाल दे।
59मैं तुझसे कहता हूँ कि जब तक तू पाई-पाई न चुका दे, वहाँ से छूटने न पाएगा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)