पुराना नियम · मलाकी · अध्याय 1 / 4
मलाकी 1
1मलाकी के द्वारा इस्राएल के लिए यहोवा की वाणी अर्थात् उसका वचन
2यहोवा कहता है, “मैंने तुमसे प्रेम किया है।” परन्तु तुम कहते हो, “तूने किस बात में हमसे प्रेम किया है?” यहोवा की यह वाणी है, “क्या एसाव याकूब का भाई न था? फिर भी मैंने याकूब से प्रेम किया;
3परन्तु मैंने एसाव से बैर रखा है और उसके पहाड़ों को उजाड़ दिया और उसके निज भाग को जंगल के गीदड़ों का स्थान बना दिया।
4यघपि एदोम कहता है कि हम उजड़ तो गए हैं, फिर भी हम लौटकर खंडहरों का पुनर्निर्माण करेंगे, परन्तु सेनाओं का यहोवा यों कहता है, वे निर्माण करें फिर भी मैं ढा दूंगा, और वे दुष्टता का गढ़, और ऐसे लोग कहलाएंगे जिन पर यहोवा का कोप सदा भड़का रहता है।”
5तुम्हारी आंखें इसे देखेंगी और तुम कहोगे, ‘यहोवा का प्रताप इस्राएल की सीमा के आगे भी बढ़ता जाए।’
6“पुत्र अपने पिता का, और दास अपने स्वामी का आदर करता है। फिर यदि मैं पिता हूं तो मेरा आदर कहां है? और यदि मैं स्वामी हूं, तो मेरा भय मानना कहां है? सेनाओं का यहोवा तुम याजकों से जो मेरे नाम को तुच्छ जानते हो, यही बात पूछता है। परन्तु तुम कहते हो, ‘हमने किस बात में तेरे नाम को तुच्छ जाना है?’
7तुम मेरी वेदी पर अशुद्ध भोजन चढ़ाते हो और तुम कहते हो, ‘हमने किस बात में तेरे नाम को अपवित्र ठहराया है? इस बात में कि तुम जो कहते हो, ‘यहोवा की मेज तुच्छ है।’
8“फिर जब तुम अंधे पशु की बलि चढ़ाते हो तो क्या यह बुरा नहीं? और जब तुम लंगड़े और रोगी पशु की बलि चढ़ाते हो तो क्या यह बुरा नहीं? यही भेंट अपने शासक के पास क्यों नहीं ले जाते? क्या वह तुमसे प्रसन्न होगा? तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करेगा?” सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।
9“परन्तु अब क्या तुम परमेश्वर से विनती नहीं करोगे कि वह हम लोगों पर अनुग्रह करे? तुम्हारी ओर से चढ़ाई गई ऐसी भेंट के कारण क्या वह तुममें से किसी को प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करेगा?” सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।
10“भला होता कि तुममें से कोई मन्दिर के फाटकों को बन्द कर देता, कि तुम मेरी वेदी पर व्यर्थ आग जलाने न पाते। मैं तुमसे प्रसन्न नहीं हूं”। सेनाओं के यहोवा का यही वचन है, “और न मैं तुम्हारी हाथ की भेंट ग्रहण करूंगा।
11क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् होगा और प्रत्येक स्थान में मेरे नाम पर धूप जलाई जाएगी और शुद्ध अन्नबलि चढ़ाई जाएगी; क्योंकि जाति-जाति में मेरा नाम महान् होगा,” सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।
12“परन्तु तुम लोग यह कह कर उसको अपवित्र ठहराते हो, कि यहोवा की मेज तो अशुद्ध हैं, और उस पर से जो भोजन वस्तु मिलती है वह भी तुच्छ है।
13तुम यह भी कहते हो, ‘ओह! यह कैसा बोझ है।’ और उस भोजन वस्तु के प्रति नाक-भौं सिकोड़ते हो, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है, “और तुम लूटे हुए और लंगड़े और रोगी पशु की भेंट लाते हो; ऐसी ही भेंट तुम लाया करते हो! क्या मैं ऐसी भेंट तुम्हारे हाथ से ग्रहण करूं?” यहोवा का यही वचन है।
14“परन्तु जिस छली के झुंड में नर पशु हो और वह जिसकी मन्नत मानकर भी दोषपूर्ण पशु की बलि प्रभु के लिए चढ़ाए, वह शापित हो। क्योंकि मैं तो महाराजा हूं” सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है, “और मेरा नाम अन्य जातियों में भययोग्य है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)