नया नियम · मरकुस · अध्याय 14 / 16
मरकुस 14
1फसह और अख़मीरी रोटी के पर्व के लिए दो दिन शेज रह गए थे, और महायाजक और शास्त्री इस बात की खोज में थे कि उसे कैसे चुपके से पकड़ें और मार डालें;
2परन्तु वे कह रहे थे, “पर्व के समय नहीं, कहीं ऐसा न हो कि लोगों में दंगा हो जाए।”
3जब वह बैतनिय्याह के शमौन नामक कुष्ठ-रोगी के घर में भोजन करने बैठा था, तो वहां एक स्त्री संगमरमर के पात्र में जटामासी का बहुमूल्य शुद्ध इत्र लेकर आई; और उसने पात्र को तोड़कर इत्र को उसके सिर पर उण्डेल दिया।
4परन्तु कुछ लोग क्रुद्ध होकर आपस में कहने लगे, “यह इत्र किस लिए नष्ट किया गया?
5क्योंकि यह इत्र तो तीन सौ दीनार से अधिक मूल्य में बेचा जाकर कंगालों को दिया जा सकता था।” और वे उसे झिड़कने लगे।
6परन्तु यीशु ने कहा,“उसे छोड़ दो, उसे क्यों तंग करते हो? उसने तो मेरे साथ भलाई की है।
7क्योंकि कंगाल तो सदैव तुम्हारे साथ रहते हैं, और जब तुम चाहो तब उनके साथ भलाई कर सकते हो, परन्तु मैं तुम्हारे साथ सदैव नहीं रहूँगा।
8जितना वह कर सकती थी, उसने किया, उसने मेरे गाड़े जाने के लिए पहले ही से मेरी देह पर इत्र मला है।
9मैं तुमसे सच कहता हूँ कि समस्त संसार में जहां कहीं सुसमाचार का प्रचार होगा, वहां इस स्त्री के इस कार्य का वर्णन भी इसकी स्मृति में किया जाएगा।”
10और यहूदा इस्करियोती जो बारहों में से एक था महायाजकों के पास गया कि उसे उनके हाथ पकड़वा दे
11और जब उन्होंने यह सुना तो प्रसन्न हुए, और उसे रुपए देने का वचन दिया। अतः वह अवसर ढूंढने लगा कि उसे किसी प्रकार पकड़वा दे।
12अख़मीरी रोटी के पर्व के पहले दिन, जब फसह के मेमने का बलिदान किया जाता था तो उसके चेलों ने उससे पूछा, “तू कहां चाहता है कि हम जाकर तेरे लिए फसह खाने की तैयारी करें?”
13उसने अपने चेलों में से दो को यह कहकर भेजा, “नगर में जाओ, और एक मनुष्य जल का घड़ा उठाकर लाते हुए तुम्हें मिलेगा; उसके पीछे हो लेना;
14और जहां वह प्रवेश करे, उस घर के स्वामी से कहना, ‘गुरु कहता है, “मेरा अतिथिकक्ष कहां है जिसमें मैं अपने चेलों के साथ फसह खाऊं?”
15वह स्वयं तुम्हें एक बड़ा, सुसज्जित ऊपरी कक्ष दिखाएगा; और वहां हमारे लिए तैयारी करना।”
16चेले गये और नगर में जाकर जैसा उसने कहा था वैसा ही पाया, और उन्होंने फसह की तैयारी की।
17जब संध्या हो गई तो वह बारहों के साथ आया
18और जब वे बैठकर भोजन कर रहे थे, तब यीशु ने कहा, “मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुममें से एककृजो मेरे साथ भोजन कर रहा हैकृ मुझे पकड़वाएगा।”
19वे उदास हुए और एक-एक करके उससे पूछने लगे, “क्या वह मैं हूँ?”
20और उसने उनसे कहा, “वह बारह में से एक है जो मेरे साथ कटोरे में हाथ डालता है।
21क्योंकि मनुष्य का पुत्र, जैसा उसके विजय में लिखा है, जाता ही है; परन्तु हाय उस मनुष्य पर जिसके द्वारा मनुष्य का पुत्र पकड़वाया जाता है! उस मनुष्य के लिए अच्छा होता यदि उसका जन्म ही न हुआ होता।”
22जब वे भोजन कर रहे थे, उसने रोटी ली और आशीष मांगकर तोड़ी और उन्हें देकर कहा, “इसे लो; यह मेरी देह है।”
23फिर उसने प्याला लिया और धन्यवाद देकर उन्हें दिया और उन सबने उसमें से पीया।
24तब उसने उनसे कहा, “यह वाचा का मेरा वह लहू है जो बहुतों के लिए बहाया जाता है।
25मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैं दाख का रस उस दिन तक फिर कभी नहीं पीऊंगा, जब तक परमेश्वर के राज्य में नया न पीऊ।”
26तब भजन गाने के पश्चात् वे जैतून पर्वत पर चले गए।
27तब यीशु ने उनसे कहा, “तुम सब ठोकर खाओगे, क्योंकि यह लिखा है, ‘मैं चरवाहे को मारूंगा, और भेड़ें तितर-बितर हो जाएंगी।’
28परन्तु अपने जीवित होने के पश्चात् मैं तुमसे पहले गलील जाऊंगा।”
29पतरस ने उससे कहा, “चाहे सब छोड़ दें, मैं नहीं छोड़ूंगा।”
30तब यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझसे सच कहता हूँ: आज ही रात को मुर्गे के दो बार बांग देने से पहले तू स्वयं तीन बार मेरा इनकार करेगा।”
31परन्तु पतरस दृढ़ता से यही कहता रहा, “चाहे मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े, फिर भी मैं तेरा इनकार नहीं करुंगा!” और वे सब यही बात कह रहे थे।
32और वे गतसमनी नामक स्थान में आए; और उसने अपने चेलों से कहा, “तुम यहां बैठे रहो, जब तक मैं प्रार्थना करू।”
33और उसने अपने साथ पतरस, याकूब और यूहन्ना को लिया, और बहुत ही व्यथित और व्याकुल होने लगा।
34और उसने उनसे कहा, “मेरा मन बहुत उदास है, यहां तक कि मैं मरने पर हूँ। यहीं ठहरो और जागते रहो।”
35फिर वह उनसे थोड़ा आगे बढ़ा, और भूमि पर गिरकर प्रार्थना करने लगा कि यदि सम्भव हो, तो यह घड़ी टल जाए।
36और वह कहने लगा, “हे अब्बा! पिता! तेरे लिए सब कुछ सम्भव है। यह प्याला मुझसे हटा ले। फिर भी मेरी नहीं, परन्तु तेरी इच्छा पूरी हो।”
37और उसने आकर उन्हें सोते पाया और पतरस से कहा, “शमौन, तू सो रहा है? क्या तू एक घड़ी भी न जाग सका?
38जागते और प्रार्थना करते रहो कि परीक्षा में न पड़ो। आत्मा तो तैयार है, परन्तु देह दुर्बल है।”
39और उसने फिर जाकर इन्हीं शब्दों में प्रार्थना की।
40और उसने फिर आकर उन्हें सोते पाया क्योंकि उनकी आंखें नींद से बोझिल थीं, और वे नहीं जानते थे कि उसे क्या उत्तर दे।
41फिर उसने तीसरी बार आकर उनसे कहा, “क्या तुम अब तक सो रहे हो और विश्राम कर रहे हो? बहुत हो चुका! घड़ी आ पहुंची है। देखो, मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथों में पकड़वाया जाता है।
42उठो, चलें! देखो, मेरा पकड़वाने वाला निकट है!”
43जब वह यह कह ही रहा था तो यहूदा, जो बारहों में से एक था, तुरन्त आ पहुंचा, और उसके साथ तलवारें और लाठियां लिए हुए एक भीड़ थी जिसे मुख्य याजकों, शास्त्रियों और प्राचीनों ने भेजा था।
44उसके पकड़वाने वाले ने उन्हें यह कहकर संकेत दिया था, कि जिसे मेैं चूमूँ वही है; उसे पकड़कर सावधानी से ले जाना।
45वहां पहुंचकर और तुरन्त उसके पास जाकर, उसने कहा, “रब्बी!” और उसे चूमा।
46तब उन्होंने उसे पकड़कर गिरफ्ऱतार कर लिया।
47इसपर पास खड़े लोगों में से एक ने तलवार खींचकर महायाजक के दास पर चलाई और उसका कान उड़ा दिया।
48यीशु ने उत्तर देते हुए उनसे कहा, “क्या तुम तलवार और लाठियां लेकर मुझे बन्दी बनाने आए हो? क्या मैं कोई डाकू हूँ?
49मैं तो तुम्हारे साथ प्रतिदिन मन्दिर में उपदेश दिया करता था और तुमने मुझे नहीं पकड़ा, परन्तु यह इसलिए हुआ कि पवित्रशास्त्र का लेख पूरा हो।”
50इस पर सबने उसे त्याग दिया और छोड़कर भाग गए।
51एक नवयुवक उसके पीछे चल रहा था। वह अपने नंगे शरीर पर केवल मलमल की चादर ओढ़े हुए था। उन्होंने उसे पकड़ा,
52परन्तु वह मलमल की चादर छोड़कर नंगा ही भाग निकला।
53वे यीशु को महायाजक के पास ले गए; और सब मुख्य याजक, प्राचीन और शास्त्री इकट्ठे हो गए।
54पतरस तो दूर ही दूर से महायाजक के आंगन तक उसके पीछे-पीछे चला गया था। वह पहरेदारों के साथ बैठकर वहां आग तापने लगा।
55मुख्य याजक और सारी महासभा यीशु को मार डालने के लिए उसके विरुद्ध साक्षी ढूंढने का प्रयास करते रहे, परन्तु उन्हें एक भी साक्षी न मिली।
56क्योंकि बहुत-से लोग उसके विरुद्ध झूठी साक्षी दे रहे थे, परन्तु उनकी साक्षी एक दूसरे से मिलती न थी।
57तब कुछ लोग खड़े होकर उसके विरुद्ध यह साक्षी देने लगे,
58“हमने इसे यह कहते सुना है, ‘मैं हाथों से बनाए गए इस मन्दिर को ध्वस्त कर दूंगा और तीन दिन में दूसरा खड़ा कर दूंगा जो हाथों से बनाया हुआ न होगा’।”
59इस पर भी उनकी साक्षी एक समान न थी।
60फिर महायाजक उठा और उसने आगे आकर यीशु से पूछा, “जो साक्षी ये लोग तेरे विरुद्ध दे रहे हैं क्या तू उसका उत्तर नहीं देता?”
61परन्तु वह चुप रहा और उसने कोई उत्तर न दिया। महायाजक ने फिर उससे यह कहते हुए पूछा, “क्या तू उस परमधन्य का पुत्र मसीह है?”
62यीशु ने कहा, “मैं हूँ! और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी ओर बैठा हुआ और स्वर्ग के बादलों के साथ आता हुआ देखोगे।”
63इस पर महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा, “अब हमें और साक्षियों की क्या आवश्यकता है?
64तुम यह निन्दा सुन चुके हो। इसपर तुम्हारा क्या मत है?” और उन सबने उसे प्राण-दण्ड के योग्य दोषी ठहराया।
65तब कुछ उसपर थूकने लगे, और उसकी आंखों पर पट्टी बाँधकर घूंसे मारने लगे और उससे कहने लगे, “भविष्यद्वाणी कर!” और पहरेदारों ने पकड़कर उसके मुंह पर थप्पड़ मारे।
66जब पतरस नीचे आंगन में था, तो महायाजक की दासियों में से एक वहां आई,
67और पतरस को आग तापते देखा और उसपर दृष्टि गड़ाकर कहने लगी, “तूभी तो यीशु नासरी के साथ था,”
68परन्तु उसने इनकार करते हुए कहा, “मैं न तो जानता और न ही समझता हूँ कि तू क्या कह रही है।”और वह बाहर बरामदे में चला गया।
69उसे देखकर पास खड़े हुए लोगों से वह दासी फिर कहने लगी, “यह तो उनमें से एक है!”
70परन्तु उसने फिर इनकार किया। थोड़ी देर बाद जो पास खड़े थे उन्होंने फिर पतरस से कहा, “निश्चय ही तू उनमें से एक है, क्योंकि तूभी गलीली है!”
71परन्तु वह धिक्कारने और शपथ खाने लगा, “मैं इस मनुष्य को जिसकी तुम चर्चा कर रहे हो नहीं जानता!”
72और तुरन्त मुर्गे ने दूसरी बार बांग दी। तब पतरस को वह बात जो यीशु ने उससे कही थी, स्मरण हो आई, “मुर्गे के दो बार बांग देने से पहले तू तीन बार मेरा इनकार करेगा।” और वह रोने लगा।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)