नया नियम · मरकुस · अध्याय 15 / 16
मरकुस 15
1और भोर होते ही, तुरन्त मुख्य याजकों ने प्राचीनों, शास्त्रियों और सारी महासभा के साथ निर्णय किया, और यीशु को बाँधकर ले गए तथा उसे पिलातुस के हाथ सौंप दिया।
2पिलातुस ने उससे पूछा, “क्या तू यहूदियों का राजा है?” उसने उत्तर देते हुए उससे कहा, “तू स्वयं ही कह रहा है।”
3और मुख्य याजक उसपर बहुत बातों का दोष लगा रहे थे।
4पिलातुस ने उससे यह कहते हुए फिर पूछा, “क्या तू उत्तर नहीं देता? देख, वे तेरे विरुद्ध कितने दोष लगा रहे है।”
5परन्तु यीशु ने कोई और उत्तर नहीं दिया; इससे पिलातुस को आशचर्य हुआ।
6पर्व के समय वह उनके अनुरोध पर किसी एक कै़दी को छोड़ दिया करता था
7और उन विद्राहियों के साथ जिन्होंने विद्रोह के समय हत्या की थी, बरअब्बा नाम का एक मनुष्य भी कैद किया गया था।
8और भीड़ ऊपर जाकर उससे विनती करने लगी, कि जैसा तू करता आया है, वैसा ही हमारे लिए कर
9और पिलातुस ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या तुम चाहते हो कि मैं यहूदियों के राजा को तुम्हारे लिए छोड़ दूं?”
10क्योंकि वह जानता था कि मुख्य याजकों ने उसे ईर्ष्यावश पकड़वाया है।
11परन्तु मुख्य याजकों ने भीड़ को यह कहने के लिए उत्तेजित किया कि वह उनके लिए बदले में बरअब्बा को छोड़ दे।
12पिलातुस ने फिर उत्तर दिया, “ तब जिसे तुम यहूदियों का राजा कहते हो, उसका मैं क्या करूं?”
13वे फिर चिल्लाए, “उसे क्रूस पर चढ़ा!”
14पिलातुस ने उनसे कहा, “क्यों? उसने क्या बुरा किया है?” पर वे और भी जोर से चिल्लाए, “उसे क्रूस पर चढ़ा।”
15तब पिलातुस ने भीड़ को सन्तुष्ट करने की इच्छा से बरअब्बा को उनके लिए छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर क्रूस पर चढ़ाने के लिए सौंप दिया।
16सैनिक उसे किले के भीतर अर्थात् प्रीटोरियुम में ले गए, और वहां उन्होंने समस्त रोमी सेना को बुलाकर एकत्रित किया।
17उन्होेंने उसे बैंजनी वस्त्र पहनाया और कांटो का मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा।
18तब वे उसका अभिवादन करने लगेः “हे यहूदियों के राजा, तेरी जय हो!”
19वे उसके सिर पर सरकण्डे मारते और उसपर थूकते रहे, और घुटने टेककर उसे प्रणाम कर रहे थे।
20जब वे उसका ठट्ठा कर चुके तो बैंजनी वस्त्र उतारकर उन्होंने उसी के कपड़े उसे पहना दिए और वे उसे क्रूस पर चढ़ाने के लिए बाहर ले गए।
21और उन्होंने सिकन्दर और रूफुस के पिता शमौन कुरेनी को जो गांव से आ रहा था, बेगार में पकड़ा कि यीशु का क्रूस उठाकर ले चले।
22और वे उसे ‘गुलगुता’ नामक स्थान पर लाए, जिसका अर्थ है ‘खोपड़ी का स्थान’
23और उन्होंने उसे मुर्र मिला हुआ दाखरस देने का प्रयत्न किया; परन्तु उसने नहीं लिया
24और उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया और चिट्ठियां डालकर कि किसको क्या मिले, उसके कपड़ों को आपस में बांट लिया।
25जब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया तो सुबह के नौ बज चुके थे
26और उसके दोषपत्र पर यह लिखा था, “यहूदियों का राजा”।
27उन्होंने उसके साथ दो डाकुओं को भी क्रूस पर चढ़ाया, एक को दाहिनी ओर तथा दूसरे को बांई ओर।
28तब पवित्रशास्त्र का वह वचन पूरा हुआ जिसमें कहा गया है, “वह अपराधियों के साथ गिना गया।”ह्
29और वहां से आने-जाने वाले उसकी निन्दा करते हुए और सिर हिला-हिलाकर कहने लगे, “अरे! मन्दिर को ढाने वाले और तीन दिन में बनाने वाले,
30अपने आप को बचा और क्रूस से उतर आ!”
31इसी प्रकार मुख्य याजक भी शास्त्रियों के साथ मिलकर आपस में उसका ठट्ठा करके यह कह रहे थे, “इसने दूसरों को बचाया; पर अपने आप को नहीं बचा सकता।
32अब यह मसीह-इस्राएल का राजाकृक्रूस पर से नीचे उतर आए कि हम देख सकें और विश्वास करें!” और वे भी जो उसके साथ क्रूस पर चढ़ाए गए थे, इसी प्रकार उसकी निन्दा कर रहे थे।
33जब दोपहर के बारह बज गए तो सारे देश में अन्धकार छा गया और तीन बजे दिन तक छाया रहा
34और तीन बजने पर यीशु ने बहुत ऊंचे स्वर में चिल्लाकर कहा, “इलोई, इलोई, लमा शबक्तनी?” जिसका अर्थ है, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?”
35तब जो निकट खड़े थे उनमें से कुछ यह सुनकर कहने लगे, “देखो, वह एलिय्याह को पुकार रहा है।”
36और किसी ने दौड़कर स्पंज को सिरके में डुबोया, और उसे सरकण्डे पर रखकर उसे चुसाया और कहने लगा, “देखें, एलिय्याह उसे नीचे उतारने के लिए आता है कि नही।”
37तब यीशु ने बड़े ऊंचे स्वर में चिल्लाकर प्राण त्याग दिया
38और मन्दिर का पर्दा ऊपर से नीचे तक फटकर दो टुकड़े हो गया।
39जब सूबेदार ने जो वहां सामने खड़ा था उसे इस तरह प्राण त्यागते देखा, तो कहा, “निःसन्देह यह मनुष्य परमेश्वर का पुत्र था!”
40कुछ स्त्रियां भी थीं जो दूर से देख रही थीं उनमें मरियम मगदलीनी, छोटे याकूब और योसेस की माता मरियम, तथा सलोमी थी।
41जब वह गलील में था तो ये उसके पीछे-पीछे चला करतीं और उसकी सेवा-टहल किया करती थीं; और अन्य बहुत-सी स्त्रियां भी थीं जो उसके साथ यरूशलेम आई थी।
42जब संध्या हो गई, तब तैयारी का दिन होने के कारण, अर्थात् सब्त से एक दिन पहले,
43अरिमतिया-निवासी यूसुफ आया, जो महासभा का एक प्रतिज्ठित सदस्य था, वह स्वयं ही परमेश्वर के राज्य की प्रतीक्षा कर रहा था। उसने साहस करके पिलातुस के समक्ष जाकर यीशु का शव मांगा।
44पिलातुस को आशचर्य हुआ कि उसकी मृत्यु इतनी शीघ्र हो गई, और उसने सूबेदार को बुलाकर पूछा, “क्या वह मर चुका है?”
45फिर उसने सूबेदार से इसकी पुष्टि करके शव युसुफ को दे दिया।
46तब यूसुफ ने मलमल का कपड़ा मोल लिया और शव को उतारकर उसमें लपेटा, तथा एक कब्र में जो चट्टान में खोदी गई थी रख दिया, और कब्र के द्वार पर एक पत्थर लुढ़का कर लगा दिया।
47मरियम मगदलीनी और योसेस की माता मरियम देख रही थीं कि उसे कहां रखा गया है।
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)