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नया नियम · मरकुस · अध्याय 4 / 16

मरकुस 4

1वह फिर सागर के किनारे उपदेश देने लगा। और उसके पास इतना विशाल जनसमूह एकत्रित हो गया कि वह सागर में एक नाव पर चढ़कर बैठ गया, और सारा जनसमूह सागर के किनारे भूमि पर खड़ा रहा।

2वह दृष्टान्तों में उन्हें बहुत-सी बातें सिखाने लगा, और वह अपने उपदेश में उनसे कह रहा था,

3“‘सुनो! देखो, एक बीज बोने वाला बीज बोने निकला।

4जब वह बो रहा था तो कुछ बीज मार्ग के किनारे गिरे और चिड़ियों ने आकर उन्हें चुुग लिया।

5और कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे जहां उन्हें अधिक मिट्टी न मिली, और गहरी मिट्टी न मिलने के कारण वे शीघ्र उग आए,

6और जब सूर्य उदय हुआ तो झुलस गए और जड़ न पकड़ने के कारण सूख गए।

7कुछ बीज कँटीली झाड़ियों में गिरे और झाड़ियों ने बढ़कर उनको दबा दिया, और उनमें फसल न आई।

8परन्तु कुछ बीज अच्छी भूमि पर गिरे, और जब वे उग कर बढ़े तो वे फसल देने लगे- कोई तीस गुणा, कोई साठ गुणा और कोई सौ गुणा।”

9और वह कह रहा था, “जिसके पास सुनने के लिए कान हों, वह सुन ले।”

10जैसे ही वह अकेला रह गया, उसके अनुयायी तथा बारह चेले उससे दृष्टान्तों के सम्बन्ध में पूछने लगे।

11उसने उनसे कहा, “तुम पर तो परमेश्वर के राज्य का भेद प्रकट किया गया है, परन्तु बाहर वालों के लिए प्रत्येक बात दृष्टान्तों में कही जाती है,

12जिससे कि वे देखते हुए तो देखें पर उन्हें सूझ न पड़े, और सुनते हुए सुनें पर समझ न सकें, कही ऐसा न हो कि वे फिरें और क्षमा प्राप्त करे।”

13फिर उसने उनसे कहा, ‘‘क्या तुम यह दृष्टान्त नहीं समझते? तो फिर सब दृष्टान्तों को कैसे समझोगे?

14बोने वाला वचन बोता है।

15और ये वे हैं जो मार्ग के किनारे के हैं जहां वचन बोया जाता है, और जब वे सुनते हैं, तो शैतान तुरन्त आकर उनमें बोए गए वचन को उठा ले जाता है।

16उसी प्रकार ये लोग बीज बोई गई पथरीली भूमि के समान है। जब वे वचन को सुनते हैं तो तुरन्त उसे आनन्दपूर्वक ग्रहण कर लेते हैं,

17वे अपने आप में गहरी जड़ नहीं रखते और थोड़े ही समय के लिए रहते हैं, परन्तु जब वचन के कारण उनपर कष्ट या सताव आता है तो वे तुरन्त ठोकर खाते है।

18और कुछ वे हैं जो कँटीली झाड़ियों में बीज बोई गई भूमि के समान हैं जो वचन को सुनते तो हैं,

19पर संसार की चिन्ताएं और धन का धोखा और अन्य वस्तुओं का लोभ उनमें समाकर वचन को दबा देता है और वह निज्फल हो जाता है।

20और कुछ वे है। जो बोई गई अच्छी भूमि के समान हैं और वे वचन को सुनते तथा उसे ग्रहण करते हैं और तीस गुणा, साठ गुणा और सौ गुणा फल लाते है।

21“एक दीपक को इसलिए नहीं लाते कि उसे नपुए के नीचे रखा जाए, और न ही पलंग के नीचे, है न? बल्कि क्या इसलिए नहीं लाया जाता कि वह दीवट पर रखा जाए?

22क्योंकि कुछ भी छिपा नहीं जो प्रकट न किया जाए; न ही कुछ गुप्त है जो प्रकाश में न आए।

23यदि किसी के पास सुनने के कान हों तो वह सुन ले।”

24फिर यीशु ने उनसे कहा, “चौकस रहो कि क्या सुनते हो। जिस माप से तुम मापते हो उसी माप से तुम्हारे लिए मापा जाएगा; और इससे भी अधिक तुमको दिया जाएगा।

25क्योंकि जिसके पास है उसे और दिया जाएगा; और जिसके पास नहीं है, उससे जो कुछ उसके पास है वह भी ले लिया जाएगा।”

26उसने कहा, “परमेश्वर का राज्य ऐसा है जैसे कोई मनुष्य भूमि पर बीज डाले,

27और रात को सो जाए और दिन को जाग जाए और वह बीज अंकुरित होकर बढ़े- वह व्यक्ति स्वयं नहीं जानता कि यह कैसे होता है।

28भूमि अपने आप फसल उपजाती है-पहले अंकुर, तब बालें, और तब बालों में तैयार दाने।

29परन्तु जब फसल पक जाती है, तो वह तुरन्त हँसिया लगाता है, क्योंकि कटनी आ पहुँचती है।”

30और उसने कहा, “परमेश्वर के राज्य की उपमा हम किससे दें अथवा किस दृष्टान्त के द्वारा हम उसका वर्णन करें?

31वह एक राई के बीज के समान है। जब वह भूमि में बोया जाता हैकृयघपि भूमि के सब बीजों से छोटा होता है,

32फिर भी जब वह बोया जाता है तो उगकर भूमि के सब पौधों से बड़ा हो जाता है और उसमें बड़ी-बड़ी शाखाएं निकलती हैं, जिससे कि आकाश के पक्षी भी उसकी छाया में बसेरा कर सकते है।”

33वह उन्हें ऐसे कई दृष्टान्तों के द्वारा वचन सुनाता था जैसे वे सुनने के योग्य थे।

34और वह दृष्टान्त के बिना उनसे कुछ नहीं बोलता था, परन्तु एकान्त में अपने चेलों को सब कुछ समझाता था।

35उसी दिन जब संध्या हुई तो उसने उनसे कहा, “आओ, हम उसपार चले।

36और भीड़ को छोड़कर, जैसा वह था, उन्होंने उसे अपने साथ नाव में ले लिया। और वहां उसके साथ और भी नावें थी।

37तब एक भयानक आंधी आई और लहरें नाव से टकराने लगी। यहां तक कि पानी नाव में भरने लगा।

38और वह स्वयं नाव के पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था, और उन्होंने उसे जगाया और कहा, “हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हो रहे हैं?”

39तब जगाए जाने पर उसने आंधी को डांटा और सागर से कहा, “‘शान्त हो, थम जा!” और आंधी थम गई और सब कुछ शान्त हो गया।

40उसने उनसे कहा, “तुम इतने डरपोक क्यों हो? यह कैसी बात है कि तुममें विश्वास नहीं?

41और वे अत्यन्त भयभीत हुए और आपस में कहने लगे, आखिर यह है कौन कि अांधी और लहरें भी इसकी आज्ञा मानती हैं?”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)