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नया नियम · मरकुस · अध्याय 5 / 16

मरकुस 5

1वे सागर के दूसरी ओर गिरासेनियों के प्रदेश में पहुंचे।

2और जब वह नाव पर से उतरा तो तुरन्त एक व्यक्ति जिसमें अशुद्ध आत्मा थी, कब्रों से निकलकर उससे मिला।

3वह कब्रों के मध्य रहता था, और अब कोई उसे जंजीरों से भी बांधकर नहीं रख सकता था,

4क्योंकि बेड़ियों और जंजीरों से तो वह प्रायः बांधा गया था, परन्तु वह जजीरों को तोड़ दिया करता और बेड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिया करता था, और कोई इतना शक्तिशाली नहीं था कि उसे वश में कर सके।

5वह लगातार रात-दिन कब्रों और पहाड़ों में चिल्लाता और पत्थरों से स्वयं को घायल करता रहता था।

6वह दूर से यीशु को देखकर दौड़ा, और झुककर उसे प्रणाम करने लगा।

7और जोर से चिल्लाकर उसने कहा, “परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र यीशु, मेरा तुझसे क्या काम? मैं तुझे परमेश्वर की शपथ देता हूँ कि मुझे यातना न दे!”

8क्योंकि वह उससे कह रहा था, ‘“हे अशुद्ध आत्मा, इस मनुष्य से निकल जा!”

9उसने उससे पूछा “‘तेरा क्या नाम है?” उसने उससे कहा, मेरा नाम ‘सेना’ है; क्योंकि हम बहुत है।”

10और उसने उससे गिड़गिड़ाकर विनती की हमें इस प्रदेश से बाहर न भेज।

11वहां पहाड़ पर सुअरों का एक बड़ा झुण्ड चर रहा था।

12और उन्होंने उससे विनती करते हुए कहा, “‘हमें उन सुअरों में भेज कि हम उनमें समा जाए।”

13उसने उन्हें अनुमति दे दी। अशुद्ध आत्माएं उसमें से निकलकर सुअरों में समा गईं। और सुअरों का झुण्ड जो लगभग दो हजार का था, ढलान पर से झपटा, और सागर में गिरकर डूब मरा।

14उनके चरवाहों ने भागकर नगर तथा गांवों में यह समाचार सुनाया, और जो कुछ हुआ था लोग उसे देखने को आए।

15फिर वे यीशु के पास आए, और उस मनुष्य को जो दुष्टात्मा-ग्रस्त था अर्थात् उसी को जिसमें ‘सेना’ समाई थी, कपड़े पहने तथा सचेत बैठे देखा और डर गए।

16जिन्होंने यह देखा था उन्होंने दुष्टात्मा-ग्रस्त मनुष्य तथा सुअरों के विषय में जो हुआ था, सब कुछ उन्हें बताया।

17वे उससे अपने क्षेत्र से चले जाने के लिए विनती करने लगे।

18और जब वह नाव में चढ़ने लगा तब वह मनुष्य जो पहले दुष्टात्मा-ग्रस्त था विनती करने लगा कि मुझे अपने साथ रहने दे।

19परन्तु उसने उसे आने न दिया और उससे कहा, “‘अपने लोगों के पास घर जा और उन्हें बता कि प्रभु ने तेरे लिए कैसे महान् कार्य किए हैं, और उसने तुझ पर कैसी दया की।

20वह चला गया औरदिकापुलिस में प्रचार करने लगा कि यीशु ने मेरे लिए कैसे महान् कार्य किए; और सब लोगों ने आशचर्य किया।

21जब यीशु नाव से फिर उस पार गया, तो एक विशाल जनसमूह उसके चारों और एकत्रित हो गया, और वह सागर के किनारे ठहर गया।

22फिर आराधनालय के अधिकारियों में याईर नामक एक व्यक्ति आया और उसे देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ा,

23और गिड़गिड़ाकर उससे विनती करके कहने लगा, “‘मेरी छोटी बेटी मरने को है। कृपया चलकर उसपर हाथ रख कि वह बच जाए और जीवित रहे।”

24वह उसके साथ चला, और एक विशाल जनसमूह भी उसके पीछे चल पड़ा, यहां तक कि लोग उस पर गिरे पड़ रहे थे।

25एक स्त्री थी जिसे बारह वर्ष से लहू बहने का रोग था,

26और जिसने बहुत से चिकित्सकों के हाथ से दुख उठाया था, और अपना सब कुछ व्यय करने पर भी उसे कुछ लाभ न हुआ था, परन्तु हालत और भी अधिक खराब हो गई थी।

27उसने यीशु के विषय में सुनकर, भीड़ में से उसके पीछे आकर उसके चोगे को स्पर्श किया।

28क्योंकि वह कहती थी, “यदि मैं उसके वस्त्र को ही छू लूंगी तो ठीक हो जाऊंगी।”

29और तुरन्त उसका लहू बहना बन्द हो गया, और उसने अपनी देह में अनुभव किया कि वह अपने रोग से चंगी हो गई है।

30उसी क्षण जब यीशु ने यह अनुभव किया कि उसमें से सामर्थ्य निकली है, उसने भीड़ में पीछे मुड़कर पूछा, “मेरे वस्त्रों को किसने छुआ?”

31उसके चेलों ने उससे कहा, “तू तो देख ही रहा है कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ रही है, और तू कहता है, ‘किसने मुझे छुआ’?

32तब उसने उस स्त्री को जिसने यह किया था देखने के लिए चारों और दृष्टि डाली।

33परन्तु वह स्त्री जो कुछ उसके साथ हुआ था उसे जानकर डरती और कांपती हुई आई और उसके सामने गिर पड़ी, और उसे सब कुछ सच-सच बता दिया।

34उसने उससे कहा, “बेटी, तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है। कुशल से जा और अपनी बीमारी से चंगी हो जा।”

35वह यह कह ही रहा था, तभी अराधनालय के अधिकारी के घर से लोगों ने आकर कहा, “अब गुरु को और कष्ट क्यों देता है-तेरी बेटी तो मर गई है?”

36परन्तु यीशु ने उस बात को सुन लिया और आराधनालय के अधिकारी से कहा, “मत डर, केवल विश्वास रख।”

37और उसने पतरस, याकूब और याकूब के भाई यूहन्ना को छोड़ अन्य किसी को अपने साथ आने न दिया।

38और वे आराधनालय के अधिकारी के घर आए, तो उसने लोगों को कोलाहल मचाते और जोर-जोर से रोते और विलाप करते देखा।

39तब उसने भीतर जाकर उनसे कहा, “क्यों रोते और हल्ला मचाते हो? बच्ची मरी नहीं, परन्तु सो रही है।

40और वे उसकी हँसी करने लगे। परन्तु सबको बाहर निकालकर बच्ची के माता-पिता और अपने साथियों को लेकर उसने उस कमरे में जहां बच्ची थी प्रवेश किया।

41और बच्ची का हाथ पकड़कर उसने उससे कहा, “तलीथा कूमी!” जिसका अर्थ है, हे लड़की, मैं तुझसे कहता हूँ, उठ!”

42और लड़की तुरन्त उठकर चलने-फिरने लगी, क्योंकि वह बारह वर्ष की थी। और तुरन्त वे अत्यन्त चकित हो गए।

43उसने उन्हें ढृढ़ आज्ञा दी कि इस बात को कोई जानने न पाए, और उसने कहा, “लड़की को कुछ खाने को दिया जाए।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)