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नया नियम · मरकुस · अध्याय 6 / 16

मरकुस 6

1और वहां से निकलकर वह अपने नगर में आया, और उसके चेले उसके पीछे चले।

2और जब सब्त का दिन आया तो वह आराधनालय में उपदेश देने लगा, और सब सुनने वाले चकित होकर कहने लगे, “इस मनुष्य को ये बातें कहां से आ गईं और यह कैसा ज्ञान है जो इसे दिया गया है, और इसके हाथों से कैसे-कैसे आशचर्यकर्म प्रकट होते हैं?

3क्या यह वही बढ़ई नहीं जो मरियम का पुत्र है और जो याकूब, योसेस, यहूदा, और शमौन का भाई है? क्या उसकी बहनें यहां हमारे बीच में नहीं हैं?” और लोगों ने उसके कारण ठोकर खाई।

4यीशु ने उनसे कहा, “नबी का अपने नगर, अपने कुटुम्ब, और अपने घर के अतिरिक्त और कहीं निरादर नहीं होता।”

5कुछ बीमारों पर हाथ रखकर उन्हें चंगा करने के अतिरिक्त वह वहां और कोई आशचर्यकर्म न कर सका।

6और उसे उनके अविश्वास पर बड़ा आशचर्य हुआ। फिर वह गांव-गांव उपदेश देता फिरा।

7बारहों को अपने पास बुलाकर वह उन्हें दो-दो करके भेजने और अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार देने लगा,

8तथा उन्हें निर्देश दिया कि अपनी यात्रा के लिए वे लाठी को छोड़ और कुछ न लें; न तो रोटी, न झोली और न कमरबन्द में पैसे,

9परन्तु चप्पल पहनें, और यह भी कहा, “दो-दो कुरते न पहनना।”

10उसने उनसे कहा, “जहां कहीं तुम किसी घर में प्रवेश करो तो नगर छोड़ने तक वहीं रहो।

11और जहां तुम्हें लोग स्वीकार न करें या तुम्हारी न सुनें, तो वहां से निकलते समय तुम अपने पैरों के तलवों की धूल झाड़ दो कि उनके विरुद्ध गवाही हो।”

12और उन्होंने जाकर प्रचार किया कि मन फिराओ।

13और वे बहुत-सी दुष्टात्माओं को निकालते तथा बहुत-से बीमारों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया करते थे।

14राजा हेरोदेस ने भी चर्चा सुनी, क्योंकि उसका नाम प्रसिद्ध हो चुका था; और लोग कह रहे थे, “यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला मरे हुओं में से जी उठा है, इसीलिए ये शक्तियां उसमें कार्य कर रही है।”

15परन्तु कुछ लोग कह रहे थे, “वह एलिय्याह है।” और अन्य कुछ कह रहे थे, “वह नबी है-प्राचीनकाल के नबियों के समान एक।”

16परन्तु जब हेरोदेस ने यह सुना तो कहता रहा, “यूहन्ना जिसका सिर मैंने कटवाया, जी उठा है।”

17हेरोदेस ने तो स्वयं लोगों को भेजकर यूहन्ना को पकड़वाया और जेल में डाल दिया था, क्योंकि हेरोदेस ने अपने भाई फिलिप्पुस की पत्नी हेरोदियास को ब्याह लिया था।

18यूहन्ना तो हेरोदेस से कहा करता था, “तुझे अपने भाई की पत्नी को रखना न्यायोचित नही।”

19अतः हेरोदियास उससे शत्रुता रखती थी और चाहती थी कि उसे मरवा डाले; और ऐसा न कर सकी;

20क्योंकि हेरोदेस यह जानकर कि यूहन्ना एक धर्मी और पवित्र व्यक्ति है, उससे डरता था और उसकी रक्षा करता था। और जब वह उसकी सुनता था तो बहुत ही घबरा जाता था, फिर भी वह प्रसन्नता से उसको सुना करता था।

21और उचित अवसर तब आया जब हेरोदेस ने अपने जन्म-दिवस पर प्रधानों, सेनापतियों और गलील के मुख्य पुरुषों को भोज में आमन्त्रित किया

22और जब स्वयं हेरोदियास की पु=ाी ने अन्दर आकर नृत्य किया और उसने हेरोदेस तथा उसके अतिथियों को प्रसन्न किया, तब राजा ने लड़की से कहा, “तू जो चाहे मुझसे मांग और मैं तुझे दूंगा।”

23तथा उसने शपथ खाकर उससे कहा, “तू मुझसे जो कुछ भी मांगे मैं तुझे दूंगा यहां तक कि अपना आधा राज्य भी।”

24उसने बाहर जाकर अपनी माता से पूछा, “मैं क्या मांगू?” और उसने कहा, “यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर!”

25उसने तुरन्त राजा के पास दौड़ते हुए अन्दर आकर विनती की, “मैं चाहती हूँ कि तू यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर एक थाल में रखकर अभी मुझे दे दे”

26यघपि राजा बहुत उदास हुआ, फिर भी अपनी शपथ और भोज पर आमंत्रित अतिथियों के कारण वह उसकी विनती को अस्वीकार करना न चाहा।

27राजा ने तुरन्त एक जल्लाद को भेजा और आज्ञा दी कि उसका सिर ले आए। उसने जाकर जेल में उसका सिर काटा,

28तथा उसे थाल में रखकर और लाकर लड़की को दिया, और लड़की ने अपनी मां को।

29जब उसके चेलों ने यह सुना तो आकर उसके शव को ले गए और उसे एक कब्र में रखा।

30प्रेरित, यीशु के पास आकर एकत्रित हुए तथा जो कुछ उन्होंने किया और सिखाया था, सबका वर्णन किया।

31उसने उनसे कहा, “आओ, अलग एकान्त में चलकर कुछ देर विश्राम करो।”-क्याेंकि वहां बहुत-से लोग आ-जा रहे थे, यहां तक कि उनको भोजन करने का भी अवसर नहीं मिलता था-

32अतः वे अकेले नाव पर चढ़कर एकान्त में चले गए।

33और लोगों ने उन्हें जाते देखा और बहुतों ने उन्हें पहचान लिया, और सब नगरों से लोग पैदल दौड़कर उनसे पहले ही उस स्थान पर जा पहुंचे।

34और नाव से उतरकर उसने विशाल जनसमूह को देखा और उनपर उसे तरस आया क्योंकि वे ऐसी भेड़ों के समान थे जिनका कोई रखवाला न हो; और वह उन्हें बहुत-सी बातें सिखाने लगा।

35जब दिन बहुत ढल गया तो उसके चेले उसके पास आए और कहने लगे, “यह स्थान सुनसान है और दिन बहुत ढल चुका है;

36उन्हें जाने दे कि वे आसपास की बस्तियों और गांवों में जाकर अपने खाने के लिए कुछ मोल ले सके।”

37परन्तु उसने उत्तर देते हुए कहा, “तुम ही उन्हें कुछ खाने को दो!” उन्होंने उससे कहा, “क्या हम जाकर दो-सौ दीनार की रोटियां मोल लाएं और उन्हें खाने को दें?”

38उसने उनसे कहा, “तुम्हारे पास कितनी रोटियां हैं? जाकर देखो।” उन्होंने मालूम करके कहा, “पांच-और दो मछलिया।”

39और उसने सबको आज्ञा दी कि भोजन करने पंक्तियों में हरी घास पर बैठ जाए।

40और लोग पचास-पचास और सौ-सौ की पंक्तियों में बैठ गए।

41उसने पांच रोटियों और दो मछलियों को लिया और स्वर्ग की ओर देखते हुए भोजन पर आशीष मांगी और रोटियां तोड़ीं और उन्हें चेलों को देता गया कि वे उनमें बांटे। और उसने दो मछलियों को भी उन सब में बांट दिया।

42और उन सबने खाया और तृप्त हुए।

43उन्होंने रोटी के टुकड़ों और मछलियों से भरी हुई बारह टोकरियां उठाईं।

44और रोटी खाने वाले पुरुषों की संख्या पांच हजार थी।

45तब उसने तुरन्त चेलों को नाव पर चढ़ने और अपने से पहले बैतसैदा की दूसरी ओर जाने के लिए कहा जबकि वह स्वयं भीड़ को विदा करने लगा।

46और जब उन्हें विदा कर चुका तो वह पर्वत पर प्रार्थना करने को चला गया।

47जब संध्या हुई तो नाव सागर के बीच में थी, और वह किनारे पर अकेला था।

48जब उसने उन्हें बड़ी कठिनाई के साथ नाव खेते देखा, क्योंकि हवा विपरीत थी, तो रात्रि लगभगतीन बजे वह उनके पास सागर पर चलते हुए आया और उनसे आगे निकल जाना चाहा।

49परन्तु जब उन्होंने उसे सागर पर चलते देखा तो समझा कि भूत है और चिल्ला उठे;

50क्योंकि वे सभी उसे देखकर डर गए थे। परन्तु उसने तुरन्त उनसे बातें कीं और कहा, “साहस रखो; मैं हूँ, डरो मत।”

51तब वह उनके साथ नाव पर चढ़ गया तथा आंधी थम गई; और वे अत्यधिक आशचर्यचकित हुए,

52क्योंकि रोटियों की घटना से उन्होंने कोई अन्तदृष्टि प्राप्त नहीं की थी, परन्तु उनके मन कठोर हो गए थे।

53जब वे पार होकर गन्नेसरत के तट पर पहुंचे तो उन्होंने नाव किनारे पर लगाई।

54और जब वे नाव से उतरे, तो लोगों ने तुरन्त उसेे पहचान लिया,

55और सारे क्षेत्र में चारों ओर जहां भी लोग सुने कि वह है, उन-उन स्थानों पर भाग-भाग कर रोगियों को खाटों पर लिए फिरे।

56और गांवों, नगरों या बस्तियों में जहां कहीं वह प्रवेश करता था, लोग रोगियों को बाजारों में रखकर उससे विनती करते थे कि वह उन्हें अपने वस्त्र के छोर को ही स्पर्श कर लेने दे; और जितने भी उसे स्पर्श करते थे, वे चंगे हो जाते थे।

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)