नया नियम · मरकुस · अध्याय 7 / 16
मरकुस 7
1तब फरीसी और कुछ शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे उसके चारों ओर एकत्रित हुए
2और उन्होंने उसके कुछ चेलों को अशुद्ध हाथों अर्थात् बिना हाथ धोए रोटी खाते देखा। (
3क्योंकि फरीसी और सब यहूदी तब तक नहीं खाते, जबतक कि वे भली-भांति हाथ न धो लें; और इस प्रकार वे पूर्वजों की परम्परा पर चलते हैं-
4जब वे बाजार से आते हैं, तो जब तक अपने को पानी से शुद्ध न कर लें, भोजन नहीं करते; और ऐसी बहुत-सी अन्य परम्पराएं भी उनको पालन करने के लिए मिली हैं, जैसे, कटोरों, घड़ों, तांबे के बर्तनों को धोना और मांजना।)
5फरीसियों और शास्त्रियों ने उससे पूछा, “ऐसा क्यों है कि तेरे चेले पूर्वजों की परम्परा के अनुसार नहीं चलते और अशुद्ध हाथों से रोटी खाते हैं?
6उसने उनसे कहा, “यशायाह ने तुम पाखंडियों के लिए ठीक ही भविष्यवाणी की थी, जैसा कि लिखा है, ‘ये लोग होंठों से तो मेरा आदर करते हैं, परन्तु इनका हृदय मुझसे दूर है।
7ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, और मनुष्यों की शिक्षाओं को धार्मिक सिद्धान्त के रूप में सिखाते है।’
8परमेश्वर की आज्ञा को टाल कर तुम मनुष्यों की परम्परा का पालन करते हो।”
9उसने उनसे यह भी कहा, “तुम अपनी परम्परा का पालन करने के लिए परमेश्वर की आज्ञा को कैसी अच्छी तरह टाल देते हो!
10क्योंकि मूसा ने कहा है, ‘अपने पिता और अपनी माता का आदर कर’; और, ‘जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, मार डाला जाए।’
11परन्तु तुम कहते हो, यदि कोई मनुष्य अपने पिता और अपनी माता से कहे, ‘मुझसे तुम्हें जो कुछ भी लाभ हो सकता था वह “कुर्बान” अर्थात् परमेश्वर को अर्पित है,’
12तो तुम ऐसे मनुष्य को उसके पिता या उसकी माता के लिए कुछ भी करने नहीं देते,
13इस प्रकार तुम परमेश्वर के वचन को अपनी परम्परा के द्वारा जो तुमने ठहराई है अमान्य करते हो। और तुम बहुत-से ऐसे ही काम करते हो।”
14और भीड़ को फिर अपने पास बुलाकर वह लोगों से कहने लगा, “तुम अब मेरी सुनो और समझोः
15ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुद्ध करे; परन्तु जो वस्तुएं मनुष्य में से बाहर निकलती हैं, वे ही हैं जो उसे अशुद्ध करती है।
16यदि किसी के सुनने के कान हों तो सुन ले।ह्”
17और जब भीड़ को छोड़कर उसने घर में प्रवेश किया, तो उसके चेलों ने इस दृष्टान्त के विषय में उससे पूछा।
18उसने उनसे कहा, “क्या तुम इतनी भी समझ नहीं रखते? क्या तुम नहीं देखते कि जो कुछ बाहर से मनुष्य के भीतर जाता है, वह उसे अशुद्ध नहीं कर सकता?
19क्योंकि वह उसके मन में नहीं परन्तु उसके पेट में जाता है और बाहर निकल जाता है”कृ इसप्रकार उसने सब भोजन-वस्तुओं को शुद्ध ठहराया-
20फिर उसने कहा, “जो मनुष्य में से निकलता है वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।
21क्योंकि भीतर से, अर्थात्, मनुष्यों के मन से कुविचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन,
22लोभ और दुष्टता के काम तथा छल, कामुकता, ईर्ष्या, निन्दा, अहंकार और मूर्खता निकलती है।
23ये सब बुराइयां भीतर से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती है।”
24और वहां से उठकर वह सूर-क्षेत्र में चला गया। और जब उसने एक घर में प्रवेश किया तो नहीं चाहता था कि कोई यह जाने; फिर भी वह छिप न सका।
25परन्तु उसके बारे में सुनकर एक स्त्री जिसकी छोटी बेटी में अशुद्ध आत्मा थी, तुरन्त आकर उसके पैरों पर गिर पड़ी।
26यह स्त्री सुरूफिनीकी जाति की गैर-यहूदी थी। और वह उससे बार-बार विनती करने लगी कि मेरी पुत्री में से दुष्टात्मा निकाल दे।
27उसने, उससे कहा, “पहले बच्चों को तृप्त होने दे, क्योंकि बच्चों की रोटी लेकर कुत्तों के आगे फेंकना उचित नही।”
28परन्तु उसने उत्तर दिया, “हाँ, प्रभु, परन्तु मेज के नीचे कुत्ते भी तो बच्चों के जूठन पर पलते है।”
29उसने उससे कहा, “इस उत्तर के कारण लौट जा, दुष्टात्मा तेरी बेटी में से निकल गई है।”
30और घर लौटकर उसने देखा कि लड़की बिस्तर पर लेटी हुई है और दुष्टात्मा उसमें से निकल चुकी है।
31तब वह फिर सूर के क्षेत्र से निकलकर सैदा होते हुए गलील सागर पर आया जो दिकापुलिस के क्षेत्र में है।
32और वे उसके पास एक मनुष्य को लाए जो बहरा था और कठिनाई से बोलता था, और उससे विनती की, कि वह उसपर अपना हाथ रखे।
33उसने उसे भीड़ से अलग एकान्त में लेजाकर अपनी उंगलियां उसके कानों में डालीं, और थूककर उसके जीभ को छुआ;
34और स्वर्ग की ओर आह भरकर देखते हुए उस मनुष्य से कहा, “इफ्रफथा!” अर्थात् “खुल जा!”
35उसके कान खुल गए, और उसकी जीभ की गांठ खुल गई, और वह स्पष्ट बोलने लगा।
36तब उसने उन्हें आदेश दिया कि किसी को न बताएं ; परन्तु जितना ही वह मना करता रहा, इससे भी अधिक वे उसका प्रचार करने लगे।
37वे अत्यन्त आशचर्यचकित होकर कहने लगे, “इसने जो कुछ किया अच्छा किया है; वह बहरों को भी सुनने की और गूंगों को बोलने की शक्ति देता है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)