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नया नियम · मत्ती · अध्याय 12 / 28

मत्ती 12

1तब यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर निकला; उसके चेलों को भूख लगी और वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2परन्तु जब फरीसियों ने यह देखा तो उससे कहा, “देख, तेरे चेले वह काम कर रहे हैं जो सब्त के दिन करना उचित नही।”

3इस पर उसने उनसे कहा, “क्या तुमने नही पढ़ा कि जब दाऊद और उसके साथियों को भूख लगी तो उसने क्या किया?

4उसने तो परमेश्वर के भवन में प्रवेश करके अर्पण की रोटियां खाईं, जिन्हें खाना न तो उसके लिए और न उसके साथियों के लिए, पर केवल याजकों के लिए उचित था।

5अथवा क्या तुमने व्यवस्था में नहीं पढ़ा कि याजक सब्त के दिन मन्दिर में सब्त की विधि को तोड़ते हैं, फिर भी निर्दोष ठहरते हैं?

6परन्तु मैं तुमसे कहता हूँ कि यहां वह है जो मन्दिर से भी बढ़कर है।

7यदि तुम इसका अर्थ समझते, ‘मैं दया चाहता हूँ, बलिदान नहीं,’ तो निर्दोष को दोषी न ठहराते।

8क्योंकि मनुष्य का पुत्र सब्त के दिन का भी प्रभु है।”

9वहां से निकलकर वह उनके आराधनालय में गया।

10देखो, वहां सूखे हाथ वाला एक मनुष्य था। उन्होंने यीशु पर दोष लगाने के अभिप्राय से यह कहते हुए प्रशन किया, “क्या सब्त के दिन चंगा करना उचित है?’’

11उसने उनसे कहा, “तुममें से ऐसा कौन है जिसकी एक भेड़ हो, और वह सब्त के दिन गड्हे में गिर जाए तो वह उसे पकड़कर बाहर न निकाले?

12तो एक मनुष्य का मूल्य भेड़ से कितना बढ़कर है! इसीलिए सब्त के दिन भलाई करना उचित है।”

13तब उसने उस मनुष्य से कहा, “अपना हाथ बढ़ा!” उसने बढ़ाया और वह दूसरे हाथ के समान अच्छा हो गया।

14तब फरीसी बाहर निकले और उन्होंने उसके विरोध में सम्मति की कि उसे किस प्रकार नाश करे।

15परन्तु यीशु यह जानकर वहां से निकल गया। बहुत-से लोग उसके पीछे चल पड़े, और उसने उन सब को चंगा किया,

16और उन्हें चेतावनी दी कि मुझे प्रकट न करना,

17जिससे कि यशायाह नबी द्वारा जो कहा गया था वह पूरा होः

18“देखो, मेरा सेवक जिसे मैंने चुना है, मेरा प्रिय जिससे मेरा मन अति प्रसन्न है। मैं उसपर अपना आत्मा डालूंगा और वह ग़ैरयहूदियों पर उचित न्याय की घोजणा करेगा।

19वह न तो विवाद करेगा और न चिल्लाएगा, और न कोई उसकी आवाज गलियों में सुनेगा।

20वह कुचले हुए सरकण्डे को न तोड़ेगा और टिमटिमाती हुए बत्ती को न बुझाएगा, जब तक कि वह न्याय केा विजयी न बनाए।

21और उसी के नाम में ग़ैरयहूदी आशा रखेंगे।”

22यीशु के पास एक दुष्टात्मा-ग्रस्त मनुष्य लाया गया जो अन्धा और गूंगा था, उसने उसे चंगा किया, और वह गूंगा मनुष्य बोलने और देखने लगा।

23इस पर सारा जनसमूह चकित होकर कहने लगा, “क्या यह मनुष्य दाऊद की सन्तान हो सकता है?”

24परन्तु जब फरीसियों ने यह सुना तो कहा, “यह मनुष्य दुष्टात्माओं को केवल उनके सरदार बालजबूल की सहायता से निकालता है।’’

25उनके विचार जानकर उसने कहा, “जिस राज्य में फूट पड़ जाए वह नष्ट हो जाता है, और जिस नगर या घर में फूट पड़े वह स्थिर नहीं रहेगा,

26और यदि शैतान ही शैतान को निकाले तो वह अपना ही विरोधी हो गया है-फिर उसका राज्य कैसे स्थिर रहेगा?

27फिर यदि मैं बालजबूल की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता हूँ तो तुम्हारे पुत्र किसकी सहायता से निकालते हैं? इसलिए वे ही तुम्हारा न्याय करेंगे।

28परन्तु यदि मैं परमेश्वर के आत्मा के द्वारा दुष्टात्माओं को निकालता हूँ, तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे मध्य आ पहुंचा है।

29अथवा किसी बलवान मनुष्य के घर में घुसकर कोई उसकी सम्पत्ति कैसे उठा ले जा सकता है जब तक कि वह पहले उस बलवान को बांध न ले? और तब वह उसका घर लूटेगा।

30जो मेरे साथ नहीं, वह मेरे विरुद्ध है; और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।

31इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ, मनुष्य का हर पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी।

32और जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ बोलेगा, उसका यह अपराध न तो इस युग और न आने वाले युग में क्षमा किया जाएगा।

33“या तो पेड़ को अच्छा कहो और उसके फल को भी, या पेड़ को निकम्मा कहो और उसके फल को भी, क्योंकि पेड़ अपने फल ही से पहचाना जाता है।

34हे सांप के बच्चो, तुम दुष्ट होते हुए अच्छी बातें कैसे कह सकते हो? क्योंकि जो हृदय में भरा होता है, वहीं मुंह पर आता है।

35भला मनुष्य अपने भले भण्डार से भली बातें निकालता है; और बुरा मनुष्य अपने बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है।

36मैं तुमसे कहता हूँ कि जो भी निकम्मी बात मनुष्य बोलेंगे, न्याय के दिन वे उसका लेखा देंगे।

37क्योंकि अपने शब्दों के द्वारा तू निर्दोष, और अपने शब्दों ही के द्वारा तू दोषी ठहराया जाएगा।”

38तब कुछ शास्त्रियों और फरीसियों ने उससे कहा, “गुरु, हम तुझ से कोई चिह्न देखना चाहते है।”

39परन्तु उसने उत्तर दिया, “यह दुष्ट और व्यभिचारिणी पीढ़ी चिह्न देखने को इच्छुक रहती है, फिर भी योना नबी के चिह्न को छोड़ और कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा,

40क्योंकि जैसे योना तीन दिन और तीन रात विशाल मच्छ के पेट में रहा, उसी प्रकार मनुष्य का पुत्र भी तीन दिन और तीन रात पृथ्वी के गर्भ में रहेगा।

41न्याय के दिन नीनवे के लोग इस पीढ़ी के लोगों के साथ उठ खड़े होंगे और उन्हें दोषी ठहराएंगे, क्योंकि उन्होंने योना का प्रचार सुनकर पश्चात्ताप किया; और देखो, यहां वह है जो योना से भी बढ़कर है।

42न्याय के दिन दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के लोगों के साथ उठ खड़ी होगी और इन्हें दोषी ठहराएगी, क्योंकि वह सुलैमान का ज्ञान सुनने को पृथ्वी के छोर से आई। देखो, यहां वह है जो सुलैमान से भी बढ़कर है।

43“जब अशुद्ध आत्मा किसी मनुष्य में से निकलती है, तो विश्राम की खोज में निर्जल स्थानों में भटकती फिरती है, पर नहीं पाती।

44तब वह कहती है, ‘जिस घर से मैं आई थी अपने उसी घर को लौट जाऊंगी,’ और जब वह लौटकर आती है तो उसे खाली, झाड़ा-बुहारा और सजाढाया पाती है।

45तब वह जाकर अपने से अधिक दुष्ट, अन्य सात आत्माओं को ले आती है और वे प्रवेश करके वहां रहने लगती हैं; और उस मनुष्य की पिछली दशा पहले से भी बुरी हो जाती है। इस दुष्ट पीढ़ी के लोगों के साथ भी ऐसा ही होगा।”

46जब कि वह जनसमूह से बातें कर ही रहा था, तो देखो, उसकी माता और भाई बाहर खड़े थे और उससे बातें करना चाहते थे।

47और किसी ने यीशु से कहा, “देख, तेरी माता और तेरे भाई बाहर खड़े हैं और तुझ से बातें करना चाहते है।”

48परन्तु उस कहने वाले को उत्तर देते उसने कहा, “कौन है मेरी माता और कौन हैं मेरे भाई?”

49और अपने चेलों की ओर हाथ बढ़ाकर उसने कहा, “देखो, मेरी माता और मेरे भाई!

50क्योंकि जो कोई मेरे पिता की जो स्वर्ग में है इच्छा पूरी करता है, वही मेरा भाई, मेरी बहन और मेरी माता है।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)