नया नियम · मत्ती · अध्याय 11 / 28
मत्ती 11
1ऐसा हुआ कि जब यीशु अपने बारह चेलों को निर्देश दे चुका, तो वहां से वह उनके नगरों में शिक्षा देने और प्रचार करने चला गया।
2जब बन्दीगृह में यूहन्ना ने मसीह के कार्यों की चर्चा सुनी तो अपने चेलों को उसके पास यह पूछने भेजा,
3“क्या आनेवाला तू ही है, या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?”
4यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “जो कुछ तुम सुनते और देखते हो जाकर उसका समाचार यूहन्ना को दोः
5कि अन्धे दृष्टि पाते, लंगड़े चलते, कुष्ठ-रोगी शुद्ध किए जाते, बहरे सुनते, मुर्दे जिलाए जाते और कंगालों को सुसमाचार सुनाया जाता है।
6और धन्य है वह जो मेरे कारण ठोकर खाने से बचा रहता है।”
7उनके जाते समय यीशु भीड़ के लोगों से यूहन्ना के विषय में कहने लगा, “तुम जंगल में क्या देखने गए थे? हवा से हिलते हुए सरकण्डे को?
8फिर तुम क्या देखने गए थे? कोमल वस्त्र पहिने हुए मनुष्य को? देखो, कोमल वस्त्र पहिनने वाले राजभवनों में रहते है।
9फिर तुम क्यों गए थे? किसी नबी को देखने के लिए? हां, और मैं तुमसे कहता हूँ, नबी से भी बड़े व्यक्ति को।
10यह वही है जिसके विषय में लिखा है, ‘देख, मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूं जो तेरा मार्ग तेरे आगे तैयार करेगा।’
11मैं तुमसे सच कहता हूँ कि स्त्रियों से जन्म लेने वालों में यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले से बड़ा कोई भी नहीं हुआ, फिर भी जो स्वर्ग के राज्य में छोटे से छोटा है वह उससे बड़ा है।
12यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के दिनों से लेकर अब तक स्वर्ग के राज्य में बलपूर्वक प्रवेश होता जा रहा है और प्रबल मनुष्य उस पर बल-पूर्वक अधिकार कर लेते है।
13क्योंकि सब नबी और व्यवस्था यूहन्ना के आने तक भविष्यद्वाणी करते रहे।
14यदि तुम इस बात को मानना चाहो तो यही एलिय्याह है, जो आने वाला था।
15जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।
16मैं इस पीढ़ी की तुलना किस से करूं? ये लोग बाजार में बैठने वाले बच्चों के समान हैं, जो दूसरे बच्चों को पुकारते
17और कहते हैं, ‘हमने तुम्हारे लिए बांसुरी बजाई, पर तुम न नाचेः और हमने शोक-गीत गाया, पर तुमने विलाप न किया।’
18क्योंकि यूहन्ना न तो खाता और न पीता आया, पर वे कहते हैं, ‘उस में दुष्टात्मा है।’
19मनुष्य का पुत्र खाता-पीता आया और वे कहते हैं, ‘देखो, एक पेटू और पियक्कड़ चुंगी लेने वालों और पापियों का मित्र!’ फिर भी बुद्धि अपने कार्यों से प्रमाणित होती है।”
20तब वह उन नगरों को जिनमें अधिकांश आशचर्यकर्म किए गए थे, उलाहना देने लगा क्योंकि उन्होंने पश्चात्ताप नहीं किया था।
21“हे खुराजीन, तुझ पर हाय! हे बैतसैदा, तुझ पर हाय! क्योंकि जो आशचर्यकर्म तुममें किए गए, यदि वे सूर और सैदा में किए जाते तो वे बहुत पहले टाट ओढ़कर और राख पर बैठकर पश्चात्ताप कर लेते।
22फिर भी मैं तुमसे कहता हूँ कि न्याय के दिन सूर और सैदा की दशा तुम्हारी अपेक्षा अधिक सहनीय होगी।
23और हे कफरनहूम, क्या तू स्वर्ग तक ऊंचा उठाया जाएगा? तू अधोलोक तक उतरेगा, क्योंकि जो आशचर्यकर्म तुझ में किए गए, यदि वे सदोम में किए जाते तो वह आज तक बना रहता।
24फिर भी मैं तुझ से कहता हूँ कि न्याय के दिन तेरी दशा की अपेक्षा सदोम की दशा अधिक सहनीय होगी।”
25उसी समय यीशु ने कहा, “हे पिता, स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरी स्तुति करता हूँ कि तू ने ये बातें ज्ञानियों और बुद्धिमानों से छिपाकर रखीं और बच्चों पर प्रकट की है।
26हां, पिता, क्योंकि तुझे यही अच्छा लगा।
27मेरे पिता के द्वारा मुझे सब कुछ सौंपा गया है। पिता के अतिरिक्त पुत्र को कोई नहीं जानता, न पुत्र के अतिरिक्त पिता को कोई जानता है, या वही जिस पर पुत्र उसे प्रकट करना चाहता है।
28हे सब थके और बोझ से दबे लोगो, मेरे पास आओः मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।
29मेरा जुआ अपने ऊपर उठा लो और मुझसे सीखो, क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ, और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे।
30क्योंकि मेरा जुआ सहज और मेरा बोझ हल्का है।”
पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)