Loading account

नया नियम · मत्ती · अध्याय 18 / 28

मत्ती 18

1उस समय चेले यीशु के पास आकर पूछने लगे, “स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?”

2तब उसने एक बच्चे को अपने पास बुलाया और बीच में खड़ा करके कहा,

3“मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जब तक तुम न फिरो और बच्चों के समान न बनो, तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने नहीं पाओगे।

4जो कोई अपनेआप को इस बच्चे के समान दीन बनाता है वहीं स्वर्ग के राज्य में सब से बड़ा है।

5और जो र्कोई मेरे नाम से ऐसे एक बच्चे को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है।

6परन्तु जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्वास रखते हैं, एक को भी ठोकर खिलाए तो उचित होता कि उसके गले में चक्की का भारी पाट लटकाकर उसे समुद्र की गहराई में डुबा दिया जाता।

7“ठोकरों के कारण संसार पर हाय! ठोकरों का आना तो अनिवार्य है, परन्तु हाय उस मनुष्य पर जिसके द्वारा ठोकर आती है!

8यदि तेरा हाथ या तेरा पैर तुझे ठोकर खिलाए तो उसे काटकर फेंक दे; क्योंकि तेरे लिए लूला या लंगड़ा होकर जीवन में प्रवेश करना इससे कहीं उत्तम है कि तू, दो हाथ या दो पैर होते हुए, अनन्त आग में डाला जाए।

9यदि तेरी आंख तुझे ठोकर खिलाए तो उसे निकालकर फेंक दे, क्योंकि तेरे लिए काना होकर जीवन में प्रवेश करना इससे कहीं उत्तम है कि तू दो आंख रखते हुए नरक की अग्नि में डाला जाए।

10“देखो, तुम इन छोटों में से किसी एक को भी तुच्छ न जानना, क्योंकि मैं तुमसे कहता हूँ कि स्वर्ग में उनके दूत मेरे स्वर्गीय पिता का मुंह सर्वदा देखते रहते है। (

11(11)

12तुम क्या सोचते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़े हों और उनमें से एक भटक जाए, जो क्या वह निन्यानवे को पहाड़ पर छोड़कर उस एक को ढूंढ़ने न जाएगा जो भटक रही है?

13और यदि ऐसा हो कि वह उसे पा ले तो मैं तुमसे सच कहता हूँ कि वह उसके लिए उन निन्यानवे की अपेक्षा जो नहीं खोई थीं अधिक आनन्द मनाता है।

14अतः तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है ऐसी इच्छा नहीं कि इन छोटों में से कोई एक भी नाश हो।

15“यदि तेरा भाई पाप करे तो जाकर उसे अकेले में समझा। यदि वह तेरी सुने तो तू ने अपने भाई को पा लिया है।

16परन्तु यदि वह तेरी न सुने तो अपने साथ एक या दो व्यक्ति और ले जा, जिससे कि दो या तीन गवाहों के मुंह से प्रत्येक तथ्य की पुष्टि हो जाए।

17यदि वह उनकी भी न सुने तो कलीसिया से कह। यदि वह कलीसिया की भी न सुने तो वह तेरे लिए अन्यजाति और कर वसूल करने वाले के समान ठहरे।

18मैं तुमसे कहता हूँ, जो कुछ तुम पृथ्वी पर बांधोगे, वह स्वर्ग में बँधेगा। और जो कुछ तुम पृथ्वी पर खोलोगे, वह स्वर्ग में खुलेगा।

19मैं तुमसे फिर कहता हूँ, यदि तुममें से दो जन पृथ्वी पर किसी विनती के लिए एकमत हों, तो वह मेरे स्वर्गीय पिता की ओर से उनके लिए पूरी हो जाएगी।

20क्योंकि जहां दो या तीन मेरे नाम में एकत्रित होते हैं, वहां मैं उनके बीच में हूँ।”

21तब पतरस ने आकर उससे कहा, “प्रभु, मेरा भाई कितनी बार मेरे विरुद्ध अपराध करता रहे कि मैं उसे क्षमा करूं? क्या सात बार तक?”

22यीशु ने उससे कहा, “मैं तुझसे यह नहीं कहता कि सात बार तक ही, वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।

23इसलिए स्वर्ग के राज्य की तुलना किसी ऐसे राजा से की जा सकती है जिसने अपने दासों से लेखा लेना चाहा।

24जब वह लेखा लेने लगा तो उसके सामने एक मनुष्य लाया गया जिस पर करोड़ों रुपए का ऋण था।

25पर जब उसके पास ऋण चुकाने को कुछ न था तो उसके स्वामी ने आज्ञा दी कि उसे और उसकी स्त्री, बच्चे, तथा जो कुछ उसके पास है, सब बेचकर ऋण चुका दिया जाए।

26इसपर दास ने गिरकर उसे दण्डवत् किया और कहा, ‘स्वामी, धैर्य रख। मैं सब कुछ चुका दूंगा।’

27तब उस दास के स्वामी ने तरस खाकर उसे छोड़ दिया और उसका ऋण भी क्षमा कर दिया।

28परन्तु वह दास बाहर निकला और उसकी भेंट संगी दासों में से एक से हुई जो उसका सौ रुपए का ऋणी था। उसने इसे पकड़ा और इसका गला दबाकर कहा, ‘मेरा ऋण चुका!’

29इसपर उसका संगी दास गिरकर अनुनय-विनय करने लगा, ‘धैर्य रख, मैं सब चुका दूंगा।’

30फिर भी वह न माना और उसे तब तक के लिए बन्दीगृह में डाल दिया जब तक कि वह ऋण न चुका दे।

31यह देखकर उसके संगी दास अत्यन्त दुःखी हुए और उन्होंने जाकर अपने स्वामी को यह घटना सुनाई।

32तब उसके स्वामी ने उसे बुलाकर कहा, ‘हे दुष्ट दास! इसलिए कि तूने मुझसे विनती की, मैने तेरा सारा ऋण क्षमा कर दिया था।

33तो फिर मैंने जिस प्रकार तुझपर दया की, क्या उसी प्रकार तुझे भी अपने संगी दास पर दया नहीं करनी चाहिए थी?’

34और उसके स्वामी ने क्रोध से भरकर उसे यातना देने वालों को सौंप दिया कि ऋण चुकाने तक उन्हीं के हाथों में रहे।

35इसी प्रकार यदि तुममें से प्रत्येक अपने भाई को हृदय से क्षमा न करे तो मेरा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे साथ वैसा ही करेगा।”

पवित्रशास्त्र का पाठ: Hindi Standard Version (HSV)